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Survey: शहरी खर्च घटा, गांवों ने संभाली खपत की रफ्तार, शहरी FMCG खर्च 4% गिरा, ग्रामीण परिवारों का खर्च बढ़ा

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Fri, 02 Oct 2026 02:52 PM IST
सार

  • शहरों में एफएमसीजी खर्च 4 फीसदी घटा
  • ग्रामीण परिवारों का खर्च 15 फीसदी बढ़ा
  • ग्रामीण खपत ने FMCG कंपनियों को सहारा दिया है
  • शहरों में ईंधन, खाद्य महंगाई से जुड़ी चिंता और गैर-जरूरी उत्पादों की खरीदारी में गिरावट की बात सामने आई है।

अप्रैल से जून महीने के दौरान ग्रामीण भारत ने दिया FMCG सेक्टर की रफ्तार को सहारा।
अप्रैल से जून महीने के दौरान ग्रामीण भारत ने दिया FMCG सेक्टर की रफ्तार को सहारा। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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चालू  वित्त वर्ष (2026-27) के पहले तीन महीनों (अप्रैल से जून) में रोजमर्रा के उपभोक्ता सामानों (FMCG) पर होने वाले खर्च की रफ्तार में सुस्ती देखने को मिली। यह जानकारी रिसर्च संस्था वर्ल्डपैनल की रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, ईंधन और खाद्य उत्पादों की कीमतों को लेकर बढञती चिंताओं और गैर-जरूरी उत्पादों पर खर्च घटने के कारण मुख्य रूप से शहरी इलाकों में यह सुस्ती देखने को मिली है।

शहरों में खर्च घटा, ग्रामीण इलाकों में दर्ज हुई 15 प्रतिशत की मजबूत बढ़त
रिपोर्ट के अनुसार, पहली तिमाही के दौरान शहरी परिवारों के तिमाही खर्च में साल-दर-साल आधार पर 4 प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि पिछले साल इसी समय में 14 प्रतिशत की जोरदार वृद्धि दर्ज की गई थी। शहरों में औसतन 81,759 रुपये खर्च करने वाले संपन्न परिवारों और 49,832 रुपये खर्च करने वाले कम संपन्न परिवारों- दोनों ही वर्गों के खर्च में 4 प्रतिशत की कमी देखी गई।इ

इसके उलट, ग्रामीण भारत में घरेलू खर्च 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 53,760 रुपये पर पहुंच गया। रिपोर्ट में साफ किया गया है कि देश का औसत तिमाही खर्च 13 प्रतिशत बढ़कर 59,857 रुपये रहा, और इस पूरी वृद्धि का श्रेय ग्रामीण परिवारों को जाता है क्योंकि शहरी खर्च में संकुचन देखा गया है।

राशन का हिस्सा घटा, जीएसटी बदलावों से टिकाऊ सामान की मांग बढ़ी
अध्ययन के मुताबिक, कुल घरेलू बजट में किराने के सामान (राशन) की हिस्सेदारी पिछले साल के 23.5 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत रह गई है। वहीं दूसरी ओर, टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं (कंज्यूमर ड्यूरेबल्स) की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से भी कम से बढ़कर लगभग 6 प्रतिशत हो गई है। अध्ययन में इसका मुख्य कारण जीएसटी ढांचे में किए गए अनुकूल बदलावों को बताया गया है।

अप्रैल 2026 में किया गया यह सर्वे शहरी और ग्रामीण भारत के करीब 6 हजार घरों की राय पर के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें खासतौर से महिलाओं से बात की गई थी। इस बार के अध्ययन में घरेलू बजट के बंटवारे और खरीदारी के व्यवहार के साथ-साथ एलपीजी संकट और पश्चिम एशिया में युद्ध के प्रभाव से जुड़ा नया खंड भी जोड़ा गया था।

तय बजट पर खरीदारी कर रहे उपभोक्ता, ईंधन की कीमतों ने बढ़ाई चिंता
सर्वेक्षण के अनुसार, दिसंबर 2025 में दिखे मामूली सुधार के बाद उपभोक्ताओं का भरोसा फिर कमजोर हुआ है। करीब 56 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि हालात पहले से कठिन हैं लेकिन संभलने लायक हैं, जबकि 16 प्रतिशत ने कहा कि उन पर कोई असर नहीं पड़ा है। वहीं, 18 प्रतिशत लोगों को लगता है कि अगले तीन महीनों में उनकी स्थिति और बिगड़ सकती है, जो आंकड़ा दिसंबर में 9 प्रतिशत था।

रिपोर्ट के अनुसार, 86 प्रतिशत खरीदारों का कहना है कि वे राशन खरीदते समय केवल बहुत जरूरी सामान ही लेते हैं, और 74 प्रतिशत लोग तय बजट के अनुसार ही खरीदारी कर रहे हैं, जो पिछले साल 69 प्रतिशत था। लगभग 59 प्रतिशत परिवारों के लिए ईंधन और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव सबसे बड़ी वैश्विक चिंता बना हुआ है। इसी चिंता के चलते करीब 64 प्रतिशत लोगों की खरीदारी की आदतें बदल गई हैं और लगभग 50 प्रतिशत उपभोक्ता गैर-जरूरी चीजों की खरीदारी में कटौती कर रहे हैं।


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