विज्ञापन
Home› Khabar Junction› Union Minister Jitendra Singh Formalises Commercial Launch Of Bio Based Biodegradable Plastic Under Bioe3

BioE3 की नई पहल : गन्ने से बनेगा प्लास्टिक, कचरे से कमाई का रास्ता... यूपी में शुरू होगा पायलट प्रोजेक्ट

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Fri, 25 Sep 2026 06:00 PM IST
सार

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने पॉलीलैक्टिक एसिड (पीएलए) आधारित जैव-आधारित जैव-अपघटनीय प्लास्टिक के व्यावसायिक उपयोग की शुरुआत की है। यह पहल उत्तर प्रदेश के कुम्भी स्थित बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड (बीसीएमएल) के एकीकृत परिसर से जुड़ी है। सरकार की बायोई3 योजना के तहत इस परियोजना को जैव प्रौद्योगिकी विभाग से जुड़ी संस्था बीआईआरएसी की ओर से 75 करोड़ रुपये का अनुदान मिला है। इसके तहत हर साल 100 टन तक पीएलए और उससे जुड़े सह-पॉलिमर पर शोध एवं विकास के लिए पायलट सुविधा तैयार की जाएगी।
 

बायोई3 के तहत जैव-अपघटनीय प्लास्टिक का व्यावसायिक शुभारंभ
बायोई3 के तहत जैव-अपघटनीय प्लास्टिक का व्यावसायिक शुभारंभ - फोटो : सोशल मीडिया
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

गन्ने जैसे कृषि संसाधनों से अब सिर्फ चीनी और इथनॉल ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल प्लास्टिक भी बनाया जा सकेगा। पॉलीलैक्टिक एसिड (पीएलए) आधारित जैव-अपघटनीय प्लास्टिक के व्यावसायिक उपयोग की दिशा में भारत ने अहम कदम बढ़ाया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने नई दिल्ली में इस पहल का औपचारिक शुभारंभ किया।

यह परियोजना सरकार की बायोई3 योजना (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी) के तहत बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड (बीसीएमएल) शुरू कर रही है। इसके तहत उत्तर प्रदेश के कुम्भी स्थित बीसीएमएल के एकीकृत विनिर्माण परिसर में 100 टन प्रति वर्ष क्षमता वाली पायलट स्तर की अनुसंधान एवं विकास सुविधा स्थापित की जाएगी।

गन्ने से प्लास्टिक तक कैसे पहुंचेगी कहानी?
पीएलए एक ऐसा पदार्थ है जिसे पौधों से मिलने वाले शर्करा आधारित कच्चे माल से बनाया जा सकता है। गन्ने जैसे संसाधनों से पहले शर्करा प्राप्त होती है। इसके बाद जैव प्रौद्योगिकी की मदद से उससे लैक्टिक एसिड और आगे चलकर पीएलए जैसे बायोपॉलिमर बनाए जा सकते हैं। यानी खेत में पैदा होने वाला संसाधन सिर्फ चीनी तक सीमित नहीं रहेगा। उसका इस्तेमाल ऐसी सामग्री बनाने में भी हो सकता है, जिसकी जरूरत पैकेजिंग और दूसरे औद्योगिक क्षेत्रों में है।

इसी सोच को सरकार 'अपशिष्ट से संपदा' के नजरिये से देख रही है। इसका मतलब है कि जिन कृषि अवशेषों या जैविक संसाधनों को कम उपयोगी समझा जाता है, उनमें छिपी आर्थिक संभावनाओं को तकनीक के जरिये सामने लाया जाए।

क्या है PLA और क्यों हो रही है इसकी चर्चा?
पीएलए यानी पॉलीलैक्टिक एसिड एक जैव-आधारित पॉलिमर है। इसे नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त कच्चे माल के इस्तेमाल से तैयार किया जा सकता है। इसके कुछ ग्रेड और परिस्थितियों में यह जैव-अपघटनीय भी हो सकता है। पारंपरिक प्लास्टिक मुख्य रूप से पेट्रोलियम आधारित होता है और पर्यावरण में लंबे समय तक बना रह सकता है। इसके मुकाबले पीएलए जैसे बायोप्लास्टिक नवीकरणीय संसाधनों पर आधारित सामग्री विकसित करने का रास्ता देते हैं।

हालांकि, पीएलए को पूरी तरह खत्म होने में कितना समय लगेगा, यह उसके ग्रेड और निपटान की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए इसे हर स्थिति में पारंपरिक प्लास्टिक का सीधा विकल्प मानना सही नहीं होगा।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने 'अपशिष्ट से संपदा' की अवधारणा पर जोर दिया।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने 'अपशिष्ट से संपदा' की अवधारणा पर जोर दिया। - फोटो : सोशल मीडिया
75 करोड़ रुपये की मदद
पीएलए और सह-पॉलिमर के विकास के लिए इस परियोजना को जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के तहत जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी) से 75 करोड़ रुपये का अनुदान मिला है। इसका उद्देश्य नई जैव-आधारित सामग्री विकसित करना और उन्हें प्रयोगशाला से निकालकर व्यावसायिक उत्पादन तक पहुंचाना है।

पीएलए एक जैव-आधारित और जैव-अपघटनीय प्लास्टिक है। इसे नवीकरणीय संसाधनों, जैसे चीनी आधारित कच्चे माल, से तैयार किया जा सकता है। परियोजना के जरिए ऐसे पीएलए और सह-पॉलिमर विकसित किए जाएंगे, जिनका इस्तेमाल अधिक मूल्य वाले उत्पादों में किया जा सके।

गन्ने से नई मूल्य श्रृंखला बनाने पर जोर
कार्यक्रम में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह पहल भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को प्रयोगशाला अनुसंधान से आगे ले जाकर व्यावसायिक उत्पादों, टिकाऊ विनिर्माण और रोजगार से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि भारत की जैव-अर्थव्यवस्था वर्ष 2014 में करीब 10 अरब डॉलर की थी, जो अब बढ़कर करीब 195 अरब डॉलर हो गई है।

अब वैज्ञानिक क्षमताओं को व्यावसायिक रूप से उपयोगी उत्पादों और तकनीकों में बदलने पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। मंत्री ने कहा कि गन्ने जैसे कृषि संसाधनों का उपयोग भोजन और एथनॉल के अलावा टिकाऊ सामग्री बनाने में भी किया जा सकता है। इससे कृषि संसाधनों के लिए नई मूल्य श्रृंखला विकसित करने के अवसर पैदा हो सकते हैं।

'कचरे में भी छिपी है उपयोगी चीज'
डॉ. जितेंद्र सिंह ने 'अपशिष्ट से संपदा' की अवधारणा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरह का जैविक कचरा और बायोमास उपलब्ध होता है। विज्ञान और तकनीक की मदद से इन्हें उपयोगी उत्पादों में बदला जा सकता है।

उन्होंने कहा, "अपशिष्ट जैसी कोई चीज नहीं होती।" जिन चीजों को हम कचरा समझते हैं, उनमें भी उपयोगी मूल्य हो सकता है। जैविक संसाधनों, पुनर्चक्रण और बायोमास के बेहतर इस्तेमाल से नए उद्योग और रोजगार के अवसर बनाए जा सकते हैं।

100 टन सालाना क्षमता की सुविधा
कुम्भी में बनने वाली पायलट सुविधा की क्षमता 100 टन प्रति वर्ष होगी। इसमें विशेष उपयोग के लिए अलग-अलग पीएलए ग्रेड और उन्नत पीएलए सह-पॉलिमर विकसित किए जाएंगे। यह सुविधा नई पीएलए तकनीक के विकास और परीक्षण में मदद करेगी। उत्पादन प्रक्रिया से जुड़े तकनीकी और आर्थिक आंकड़े तैयार करेगी। नए उत्पादों के विकास और ग्राहकों के स्तर पर परीक्षण में सहयोग करेगी। पीएलए तकनीक के स्वदेशीकरण को बढ़ावा देगी। भविष्य में बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए जरूरी तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराएगी। उद्योग, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाएगी।

प्रयोगशाला से बाजार तक पहुंचेगी तकनीक
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान का व्यावसायिक उपयोग शुरुआती चरण से ही शुरू होना चाहिए। इसके लिए पायलट प्लांट, तकनीकी परीक्षण, प्रशिक्षित मानव संसाधन और उद्योग की भागीदारी जरूरी है। उन्होंने कहा कि पीएलए परियोजना वैज्ञानिकों और उद्योग के बीच ऐसा मंच तैयार कर सकती है, जहां नई तकनीकों को विकसित करने के साथ उनका व्यावसायिक इस्तेमाल भी किया जा सके।
 
भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा
भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा - फोटो : सोशल मीडिया
स्थानीय संसाधनों से वैश्विक बाजार तक
मंत्री ने इस पहल को 'लोकल और ग्लोबल के लिए वोकल' दृष्टिकोण से जोड़ते हुए कहा कि भारत को अपनी तकनीक और उत्पादन क्षमता विकसित करनी चाहिए। स्थानीय स्तर पर सफल तकनीकों को आगे चलकर वैश्विक बाजार तक पहुंचाया जा सकता है।

उन्होंने जैव प्रौद्योगिकी को आम लोगों तक आसान भाषा में पहुंचाने के लिए जन-जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत भी बताई। उन्होंने कहा कि लोगों को यह समझाना जरूरी है कि गन्ने जैसे रोजमर्रा के कृषि संसाधनों से भोजन के अलावा टिकाऊ सामग्री समेत कई दूसरे उत्पाद बनाए जा सकते हैं।

चीनी से आगे नई कमाई का रास्ता
बीसीएमएल का पीएलए उद्यम नवीकरणीय चीनी आधारित कच्चे माल को पीएलए और बायोप्लास्टिक में बदलने पर आधारित है। इससे कृषि संसाधनों से टिकाऊ सामग्री तैयार करने का नया रास्ता विकसित हो सकता है।

डीबीटी के सचिव, बीआरआईसी के महानिदेशक और बीआईआरएसी के अध्यक्ष डॉ. राजेश सुधीर गोखले ने कहा कि यह पहल जैव प्रौद्योगिकी को प्रयोगशाला तक सीमित रखने के बजाय विनिर्माण से जोड़ती है। इसमें प्रमाणित उत्पादन प्रक्रिया, पायलट सुविधा, कौशल विकास और व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन को एक साथ आगे बढ़ाया जाएगा।

उन्होंने कहा कि चीनी और अन्य जैविक संसाधनों से लैक्टिक एसिड और उच्च मूल्य वाले बायोपॉलिमर तैयार करके एथनॉल से आगे नई मूल्य श्रृंखला बनाई जा सकती है। इससे टिकाऊ उत्पादन के साथ रोजगार और क्षेत्रीय विकास के अवसर भी बढ़ सकते हैं।

भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा
बायोई3 के तहत शुरू की गई इस पहल से उन्नत जैव-आधारित सामग्री के विकास और उनके व्यावसायीकरण को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। साथ ही इससे भारत की स्वदेशी जैव-विनिर्माण क्षमता मजबूत करने और टिकाऊ तथा रोजगार पैदा करने वाली जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।

कार्यक्रम में सचिव, डीबीटी, महानिदेशक, ब्रिक और अध्यक्ष, बीआईआरएसी, डॉ. राजेश सुधीर गोखले उपस्थित थे; डॉ. धनंजय के. तिवारी, वैज्ञानिक-एच, डीबीटी और प्रबंध निदेशक, बीआईआरएसी; सुश्री एकता विश्नोई, संयुक्त सचिव, डीबीटी; डॉ. कलाईवानी गणेशन, डीबीटी; डॉ. शिल्पी गुप्ता, बीआईआरएसी; और सुश्री अवंतिका सरावगी, कार्यकारी निदेशक, बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड, अन्य मौजूद रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन