भारतीय बीज उद्योग ने सरकार से मांग की है कि देश के कृषि अनुसंधान में 'जीन एडिटिंग' (GE) तकनीक को अपनाया जाए और इस तकनीक से विकसित फसल की किस्मों को व्यावसायिक खेती के लिए मंजूरी दी जाए। 'फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया' की वार्षिक आम बैठक के बाद उद्योग प्रतिनिधियों ने कहा कि पूरी दुनिया इस तकनीक की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है और भारत में भी फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए इसे जल्द अनुमति दी जानी चाहिए।
चीन का उदाहरण और किसानों तक तकनीक पहुंचाने की जरूरत
उद्योग प्रतिनिधियों ने इस बात पर जोर दिया कि चीन इस तकनीक को जल्दी अपनाने के कारण काफी आगे निकल चुका है। चीन ने जीन एडिटिंग की मदद से धान की ऐसी किस्में तैयार की हैं, जिनकी पैदावार 10 टन प्रति हेक्टेयर से भी अधिक है।
हैदराबाद स्थित साथगुरु मैनेजमेंट कंसल्टेंट्स के चेयरमैन और सीईओ के. विजयराघवन के अनुसार, बीज उद्योग चाहता है कि नई तकनीकों का विकास हो और उन्हें सरकारी मंजूरी मिले ताकि वे सीधे किसानों तक पहुंच सकें। उन्होंने स्पष्ट किया कि आनुवंशिक (जेनेटिक) तकनीकें बीज के अंदर ही समाहित होती हैं, इसलिए इन्हें किसानों तक सिर्फ बीज के माध्यम से ही पहुंचाया जा सकता है।
प्रस्तावित नए बीज विधेयक के संदर्भ में विजयराघवन ने कहा कि इस कानून में तकनीक का अलग से जिक्र नहीं है। उन्होंने बताया कि यह नया कानून मुख्य रूप से बीज की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करेगा, जबकि तकनीकों के नियमन के लिए अन्य नियम पहले से मौजूद हैं।
ड्राफ्ट बिल में ट्रांसजेनिक शब्द के इस्तेमाल पर भारतीय किसान संघ द्वारा जताई गई आपत्ति के सवाल पर उन्होंने स्थिति साफ की। विजयराघवन के अनुसार, देश का मौजूदा बीज कानून काफी पुराना है और उस समय ट्रांसजेनिक तकनीक नहीं थी। सरकार ने नए विधेयक में इसे इसलिए शामिल करने का फैसला किया है ताकि सामान्य बीजों की तरह ही ट्रांसजेनिक किस्मों की भी जांच और पंजीकरण ठीक उसी प्रकार किया जा सके।
कपास में निर्यातक से आयातक बना भारत, आधुनिक तकनीकों की पैरवी
उद्योग के रुख को साझा करते हुए विजयराघवन ने बताया कि बीज क्षेत्र जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) और जीन एडिटिंग (GE), दोनों ही नई तकनीकों के विकास, मंजूरी और उपयोग के पक्ष में है। उनके अनुसार, देश में पैदावार बढ़ाने के लिए ये तकनीकें बेहद महत्वपूर्ण हैं, विशेषकर उन प्रमुख फसलों में जहां भारत वर्तमान में आत्मनिर्भर नहीं है।
उन्होंने कपास का उदाहरण देते हुए कहा कि दस साल पहले भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास निर्यातक देश था, लेकिन आज हालात ऐसे हो गए हैं कि हमें कपास का आयात करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसी फसलों में फिर से आत्मनिर्भर बनने और उत्पादकता में सुधार लाने के लिए आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाना बेहद जरूरी है।