जलवायु परिवर्तन के इस दौर में गन्ने की खेती को मौसम के अनुकूल बनाने के लिे दो बड़े कृषि अनुसंधान संस्थान हाथ मिलाने की तैयारी में है। रिपोर्ट के अनुसार, कोयंबटूर स्थित आईसीएआर-गन्ना प्रजनन संस्थान और हैदराबाद स्थित इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (ICRISAT) आधुनिक प्रजनन तकनीकों के जरिए गन्ने की नई किस्में तैयार करने पर विचार कर रहे हैं।
आधुनिक तकनीक और एआई का लिया जाएगा सहारा
आईसीएआर-एसबीआई के स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए इक्रीसैट के महानिदेशक हिमांशु पाठक ने बताया कि दोनों संस्थान उन्नत जीनोमिक तकनीकों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सटीक फेनोटाइपिंग और जलवायु-सहनशील प्रजनन के क्षेत्रों में मिलकर काम करेंगे। इस सहयोग का मुख्य उद्देश्य ऐसी किस्में तैयार करना है जो मौसम के उतार-चढ़ाव और उत्पादन की नई चुनौतियों का मजबूती से सामना कर सकें।
देश के 80% से अधिक रकबे में को किस्मों का दबदबा
गन्ना क्षेत्र में संस्थान के योगदान की सराहना करते हुए हिमांशु पाठक ने कहा कि भारत के 80 प्रतिशत से अधिक गन्ना क्षेत्र में आईसीएआर-एसबीआई द्वारा विकसित ‘Co’ किस्मों की ही खेती की जाती है। उन्होंने कहा कि देश की चीनी सुरक्षा को मजबूत बनाने में इस संस्थान की बहुत बड़ी भूमिका रही है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अब कृषि अनुसंधान का माहौल काफी बदल चुका है और वैज्ञानिकों से उम्मीद की जा रही है कि वे खेती की उभरती समस्याओं के लिए नए और व्यावहारिक समाधान निकालें।
समारोह के दौरान हिमांशु पाठक ने गन्ना कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट थीसिस और शोध कार्य करने वाले छात्रों को सर टी. एस. वेंकटरमन पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया। कार्यक्रम के दौरान आईसीएआर-एसबीआई के निदेशक पी. गोविंदराज ने जानकारी दी कि संस्थान ने बीते साल विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों की जरूरतों के अनुसार गन्ने की तीन नई किस्में जारी की थीं।
नई किस्मों की खासियत और क्षेत्रीय उपयोग
संस्थान के निदेशक के अनुसार, इन नई किस्मों में प्रायद्वीपीय भारत के लिए उच्च गुणवत्ता वाली Co 18003, तमिलनाडु के लिए अधिक पैदावार देने वाली Co 21003 और देश के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के लिए मध्यम से देरी से पकने वाली 'Co 18022' किस्म शामिल है। जानकारों के मुताबिक, इक्रीसैट के साथ प्रस्तावित सहयोग से आधुनिक प्रजनन तकनीकों का इस्तेमाल और बढ़ेगा, जिससे बदलती जलवायु और खेती की नई चुनौतियों के बीच किसानों के लिए अधिक अनुकूल किस्में तैयार करने में मदद मिलेगी।