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जलवायु की मार से आदिवासी खेती पर संकट : अब पारंपरिक ज्ञान और विज्ञान से तलाशेंगे समाधान

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 18 Oct 2026 04:44 PM IST
सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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जलवायु परिवर्तन, फसलों की घटती पैदावार और खेती का रकबा कम होने से आदिवासी किसानों की आजीविका पर असर पड़ रहा है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए पारंपरिक खेती के ज्ञान को आधुनिक कृषि विज्ञान से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। इसी उद्देश्य से केरल के वायनाड में शनिवार, 17 अक्टूबर 2026 को ‘गोत्रज्योति’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें 300 से अधिक किसान, कृषि वैज्ञानिक, सरकारी अधिकारी, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि और नीति-निर्माता शामिल हुए।

यह कार्यक्रम एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (एमएसएसआरएफ) ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान (सीटीसीआरआई) और भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान (आईआईएसआर) के सहयोग से आयोजित किया। कार्यक्रम का उद्घाटन केरल के कृषि मंत्री टी. सिद्दीकी ने किया।

खेती की चुनौतियों पर हुई चर्चा
कार्यक्रम में किसानों और वैज्ञानिकों ने खेती से जुड़ी कई समस्याओं पर चर्चा की। इनमें फसलों की घटती पैदावार, खेती का कम होता रकबा, जलवायु परिवर्तन का असर, युवाओं की खेती में घटती रुचि और मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रमुख रहे।

एमएसएसआरएफ केरलम के क्षेत्रीय निदेशक सी. थंबन ने कहा कि इन समस्याओं से निपटने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान और आदिवासी किसानों के पारंपरिक ज्ञान को साथ लेकर चलना जरूरी है। इससे खेती को बेहतर बनाने और किसानों की आजीविका सुरक्षित करने में मदद मिल सकती है।

कंद वाली फसलों और मसालों की खेती का प्रशिक्षण
कार्यक्रम के दौरान आईसीएआर-सीटीसीआरआई और आईसीएआर-आईआईएसआर की जनजातीय उपयोजना के तहत तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें किसानों को कंद वाली फसलों और मसालों की खेती के तरीकों में सुधार करने की जानकारी दी गई।

आदिवासी किसानों को कृषि उपकरण, जैविक कृषि इनपुट और पौधरोपण सामग्री भी वितरित की गई। इसका उद्देश्य किसानों को खेती की बेहतर तकनीक अपनाने और फसल उत्पादन सुधारने में मदद करना था।

खेती से जुड़ी नई पुस्तकों का विमोचन
कार्यक्रम में आईसीएआर-आईआईएसआर की ओर से इलायची की खेती पर और एमएसएसआरएफ की ओर से काली मिर्च की खेती, मानव-वन्यजीव संघर्ष तथा बीज उत्सवों पर तैयार किए गए नए प्रकाशनों का विमोचन किया गया।

इसके अलावा, दोनों संस्थानों ने मसालों के अनुसंधान और विकास में मिलकर काम करने के लिए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। इस सहयोग से किसानों तक वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाने और खेती से जुड़ी समस्याओं के समाधान तलाशने में मदद मिलने की उम्मीद है।
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