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भारत में प्रोटीन की मांग में 3 गुना उछाल का अनुमान : दालों से लेकर डेयरी और पशुपालन तक बदलेंगे कृषि के समीकरण

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Thu, 10 Sep 2026 08:42 AM IST
सार

  • 2070 तक प्रोटीन की खपत 30 किलो सालाना हो सकती है।
  • दालें बनेंगी प्रोटीन का दूसरा बड़ा स्रोत।
  • दालों से मिलने वाला प्रोटीन 9.3 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान।
  • चारे की कमी पशुपालन के लिए बड़ी चुनौती।
  • कम कार्बन वाली खेती और घरेलू प्रोसेसिंग पर जोर।

प्रोटीन की ओर बढ़ते भारतीय।
प्रोटीन की ओर बढ़ते भारतीय। - फोटो : सोशल मीडिया
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एशिया रिसर्च एंड एंगेजमेंट (ARE) और फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) की एक संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, 2070 तक भारत में प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक प्रोटीन की खपत तीन गुना से अधिक होने का अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह खपत 2025 के लगभग 9.5 किलोग्राम से बढ़कर 2070 तक 30 किलोग्राम हो जाएगी। इसका सीधा असर देश की खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादन, प्राकृतिक संसाधनों और निवेश पर पड़ेगा।

दालें बनेंगी प्रोटीन का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत
चार्टिंग इंडियाज प्रोटीन ट्रांजिशन (Charting India’s Protein Transition) नाम की इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में दालों के क्षेत्र में विकास के बड़े अवसर मौजूद हैं। अनुमान है कि दालों से मिलने वाले प्रोटीन की खपत 2025 के 3.5 मिलियन टन से बढ़कर 2070 तक 9.3 मिलियन टन हो जाएगी। इसके साथ ही, डेयरी (दूध उत्पादों) के बाद दालें देश का दूसरा सबसे बड़ा प्रोटीन स्रोत बन जाएंगी।

रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्तमान में भारत अपने 'प्रोसेस्ड प्लांट प्रोटीन आइसोलेट्स' का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा आयात (दूसरे देशों से खरीदता) करता है। ऐसे में घरेलू स्तर पर इसका उत्पादन और प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) बढ़ाने का एक बड़ा अवसर है, जिससे किसानों को अधिक मुनाफा मिल सकेगा।

पशुचारे की कमी और छोटे किसानों की भूमिका
रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, देश में इस समय हरे चारे की 35.6 प्रतिशत, सूखे चारे की 10.5 प्रतिशत और 'कंसन्ट्रेट फीड' (पशुओं के विशेष दाने) की 44 प्रतिशत कमी है। मौसम में बदलाव के कारण चारे की उपलब्धता और उत्पादन लागत पर भी बुरा असर पड़ने की आशंका है।

रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत के कुल दूध उत्पादन में 72 प्रतिशत हिस्सा छोटे किसानों का है। इसके अलावा, मुर्गी पालन और मछली पालन भी छोटे उत्पादकों और व्यापारों पर निर्भर है। दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग में भारत की भूमिका अहम होती जा रही है। 2033 तक वैश्विक कृषि और मछली खपत में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया का हिस्सा 31 प्रतिशत होने का अनुमान है। इसलिए, किसानों और उत्पादकों को विशेष वित्तीय सहायता और तकनीकी मदद की आवश्यकता होगी।

कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरण की चिंताएं
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर उत्पादन का तरीका यही रहा, तो 2070 तक प्रोटीन से जुड़ा वार्षिक कार्बन उत्सर्जन 1.92 गीगा टन (Gt CO₂e) तक पहुंच सकता है। यह जलवायु के लिए सुरक्षित माने जाने वाले 0.25 गीगा टन के स्तर से लगभग आठ गुना ज्यादा है। कुल अतिरिक्त उत्सर्जन 44 गीगा टन से अधिक हो सकता है।

हालांकि, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि मीथेन गैस, चारे, वनों की कटाई और भोजन की बर्बादी को रोककर इस उत्सर्जन को 0.73 गीगा टन तक लाया जा सकता है। वहीं, प्रोटीन के अन्य विकल्पों को अपनाकर और मिली-जुली योजना लागू करके इसे 0.30 गीगा टन तक घटाया जा सकता है।

नीतियों में बदलाव की आवश्यकता
फिक्की (FICCI) की महानिदेशक ज्योति विज के अनुसार, भारत का बदलता प्रोटीन परिदृश्य उद्योगों के लिए निवेश करने और 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत घरेलू खाद्य श्रृंखला को मजबूत करने का एक बड़ा अवसर है।

वहीं, ARE के निदेशक रितुज साहू का कहना है कि भारत अपनी भविष्य की प्रोटीन प्रणाली के बेहद अहम मोड़ पर है। इसके लिए सरकार, नीति निर्माताओं और बैंकों को मिलकर काम करना होगा ताकि खाद्य और कृषि व्यवसाय में सुधार लाया जा सके।


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