तेलंगाना सरकार ने पानी और बिजली की कमी को देखते हुए किसानों से यासांगी सीजन में धान की खेती से बचने और दूसरी फसलें उगाने की अपील की है। लेकिन किसान संगठनों का कहना है कि सिर्फ अपील करने से किसान फसल बदलने के लिए तैयार नहीं होंगे। इसके लिए सरकार को आर्थिक मदद भी देनी चाहिए। संगठनों ने मांग की है कि अच्छी गुणवत्ता वाले धान पर मिलने वाले 500 रुपये प्रति क्विंटल बोनस की सुविधा दलहन, सब्जियों, चारा और दूसरी वैकल्पिक फसलों की खेती करने वाले किसानों को भी दी जाए।
सात किस्मों के धान पर ही मिल रहा बोनस
फिलहाल तेलंगाना सरकार अच्छी गुणवत्ता वाले धान की कुछ किस्मों पर किसानों को 500 रुपये प्रति क्विंटल बोनस देती है। हालांकि, पिछले सीजन में सरकार ने इस योजना का लाभ धान की केवल सात किस्मों तक सीमित कर दिया था।
सरकार के अनुसार, पिछले साल 4.41 लाख किसानों को बोनस के रूप में 1,199 करोड़ रुपये दिए गए थे। वहीं, वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में धान बोनस योजना के लिए 3,500 करोड़ रुपये रखे गए हैं। किसान संगठनों का मानना है कि धान की सात किस्मों तक बोनस सीमित होने से इस योजना पर होने वाला खर्च घट सकता है। ऐसे में बची हुई राशि का इस्तेमाल दूसरी फसलें उगाने वाले किसानों को प्रोत्साहन देने में किया जाना चाहिए।
फसल बदलने के लिए आर्थिक मदद जरूरी
किसान संगठनों का कहना है कि धान की खेती में अधिक पानी की जरूरत होती है। इसके मुकाबले दलहन, सब्जियों और चारा फसलों की खेती कुछ क्षेत्रों में पानी की कम खपत के साथ की जा सकती है। इसलिए सरकार को इन फसलों के लिए भी प्रोत्साहन राशि तय करनी चाहिए।
रैतु स्वराज्य वेदिका के संयोजक बी. कोंडल रेड्डी ने कहा कि किसानों से धान की जगह दूसरी फसलें उगाने की अपील करना काफी नहीं है। सरकार को दलहन, सब्जियों और कम पानी वाली दूसरी फसलों की खेती के लिए आर्थिक प्रोत्साहन बढ़ाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि विकाराबाद में बड़े पैमाने पर अरहर, आदिलाबाद में कपास और पुराने खम्मम व वारंगल जिलों में मिर्च की खेती होती है। वहीं, पुराने महबूबनगर जिले में मूंगफली प्रमुख फसल है। सरकार को इन इलाकों की फसल के हिसाब से किसानों को प्रोत्साहन देना चाहिए।
सब्जियों की जरूरत का बड़ा हिस्सा दूसरे राज्यों से
कोंडल रेड्डी ने तेलंगाना में सब्जियों की कमी का मुद्दा भी उठाया। उनके मुताबिक, राज्य में हर साल करीब 3.47 करोड़ मीट्रिक टन सब्जियों की जरूरत होती है, जबकि उत्पादन केवल 1.11 करोड़ मीट्रिक टन है। बाकी जरूरत दूसरे राज्यों से आने वाली सब्जियों से पूरी की जाती है।
किसान संगठनों का मानना है कि अगर सरकार सब्जियों और बागवानी फसलों की खेती पर बोनस देती है, तो किसान इनकी पैदावार बढ़ाने के लिए आगे आ सकते हैं। इससे राज्य की दूसरे राज्यों पर निर्भरता भी कम हो सकती है।
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