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तेलंगाना : धान छोड़ने की सलाह, लेकिन दूसरी फसलों का खरीदार कौन? किसानों ने उठाए सवाल

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Wed, 28 Oct 2026 05:38 PM IST
सार

अल नीनो की आशंका के बीच धान छोड़कर दूसरी फसलें उगाने में किसान हिचक रहे हैं। बंदरों का आतंक, बिजली की कमी, मजदूरों की समस्या और खरीद की गारंटी न होना बड़ी बाधाएं हैं।

धान की खेती
धान की खेती - फोटो : AI Image
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विस्तार
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अल नीनो की आशंका के बीच सरकार किसानों को धान की जगह दूसरी फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। लेकिन बंदरों और जंगली सूअरों का खतरा, बिजली की अनियमित आपूर्ति, मजदूरों की कमी और फसल बेचने की गारंटी न होने से किसान परेशान हैं। किसानों का कहना है कि जब तक वैकल्पिक फसलों के लिए उचित दाम और खरीद की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक धान की खेती छोड़ना आसान नहीं है।

तेलंगाना के किसानों के सामने इस समय बड़ा सवाल है कि धान की जगह कौन-सी फसल उगाई जाए और उसे बेचेंगे कहां। कई किसानों को पहले दूसरी फसलों में नुकसान उठाना पड़ा है। ऐसे में वे नई फसल लगाने से पहले उसकी लागत, सिंचाई और बाजार की संभावनाओं को लेकर चिंतित हैं।

पशुओं के चारे की चिंता, धान पूरी तरह छोड़ना मुश्किल
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जनगांव जिले के लिंगाला घनपुर मंडल के एनाबावी गांव के किसान पी. सिद्धुलु का कहना है कि किसान पूरी तरह धान की खेती नहीं छोड़ सकते। एनाबावी राज्य का पहला घोषित जैविक गांव है।

सिद्धुलु के मुताबिक, पिछले सीजन में धान का पुआल पशुओं के चारे के रूप में 200 रुपये प्रति गट्ठर तक बिका था। इस साल इसकी कीमत और बढ़ने की आशंका है। उनका कहना है कि जिन खेतों में हरी घास होनी चाहिए थी, वे सूख चुके हैं। ऐसे में सरकार को पशुओं को बचाने के लिए घास खरीदकर किसानों तक पहुंचाने पर विचार करना पड़ सकता है।

बंदरों का आतंक और मजदूरों की कमी भी फसल बदलने में बड़ी बाधा हैं। सिद्धुलु बताते हैं कि गांव में जैविक सब्जियों की खेती पर विचार हो रहा है। खाद की बढ़ती कीमतें और खाद से जुड़ी मोबाइल ऐप इस्तेमाल करने में आने वाली दिक्कतें भी किसानों को जैविक खेती की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

कपास, सब्जियों और मिर्च की खेती में नुकसान
रंगारेड्डी जिले के अरुतला गांव के किसान के. शेखर रेड्डी के पास 11 एकड़ जमीन है, लेकिन वह अभी तय नहीं कर पाए हैं कि अगली फसल कौन-सी लगाएं। जंगली सूअरों और मोरों से फसलों को नुकसान पहुंचने का खतरा बना रहता है। रेड्डी बताते हैं कि उन्होंने दो एकड़ में कपास की खेती पर 40 हजार रुपये लगाए थे, लेकिन फसल सूखने से उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। पिछले सीजन में सब्जियों और मिर्च की खेती में भी उन्हें घाटा हुआ।

उनके मुताबिक, दूसरी फसलों में मजदूर ज्यादा लगाने पड़ते हैं और उपज खरीदने वाले भी तय नहीं होते। बिजली की अनियमित आपूर्ति एक अलग समस्या है। कम वोल्टेज के कारण ट्रांसफॉर्मर खराब हो रहे हैं। उनका आरोप है कि ट्रांसफॉर्मर ठीक कराने के लिए कर्मचारियों को रिश्वत देनी पड़ती है। स्थानीय कर्मचारी और इंजीनियर भी आगे बिजली की कमी की आशंका जता रहे हैं।

रेड्डी के पास ड्रिप सिंचाई के जरिए कम से कम दो एकड़ में दूसरी फसल उगाने के लिए पानी उपलब्ध है, फिर भी वह फसल बदलने को लेकर असमंजस में हैं। बिजली की समस्या के कारण उन्हें अपनी ढाई एकड़ धान की फसल बचाने में भी परेशानी हो रही है।

बंदरों से सुरक्षा मिले तो किसान बदल सकते हैं फसल
सिद्दीपेट जिले के चेरीयाला मंडल के नागपुरी गांव के किसान जक्कुला तिरुपति का मानना है कि खेतों में सोलर फेंसिंग यानी सौर ऊर्जा से चलने वाली बाड़ लगाई जाए, तो बंदरों से फसलों को बचाया जा सकता है। इससे किसानों को धान के बजाय दूसरी फसलें उगाने का भरोसा मिलेगा।

उनका कहना है कि रबी सीजन में अगर आसपास के खेतों में धान कम उगाया जाए, तो दूसरी फसलों को पड़ोसी खेतों से आने वाले पानी के रिसाव की समस्या भी कम हो सकती है। हालांकि, किसान धान की खेती इसलिए भी पसंद करते हैं, क्योंकि इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय है।

वैकल्पिक फसलों का भी तय हो समर्थन मूल्य
अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव बोंथु राम बाबू का कहना है कि किसानों को धान से दूसरी फसलों की ओर ले जाने के लिए सरकार को वैकल्पिक फसलों के लिए भी उचित समर्थन मूल्य और खरीद की गारंटी देनी चाहिए।

उन्होंने बताया कि हरे चने (मूंग) के किसानों को अपनी उपज 8,800 रुपये प्रति क्विंटल के घोषित एमएसपी के मुकाबले करीब 6,000 रुपये प्रति क्विंटल पर बेचनी पड़ रही है। ऐसे में किसान दूसरी फसल उगाने से पहले उसके बाजार को लेकर चिंतित रहते हैं।

राम बाबू के अनुसार, किस इलाके में कौन-सी फसल उगाई जाए, इसका फैसला कृषि विस्तार अधिकारियों को किसानों के साथ मिलकर करना चाहिए। इस दौरान मिट्टी की स्थिति और पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखना जरूरी है। उन्होंने किसानों को मुफ्त बीज उपलब्ध कराने और बाजार में घटिया गुणवत्ता वाले बीजों की बिक्री रोकने की भी मांग की। उन्होंने यह भी कहा कि बंदरों की बढ़ती आबादी पर नियंत्रण के लिए पिछली सरकार ने जो प्रयास शुरू किए थे, उन्हें बीच में ही छोड़ दिया गया।

कम समय में तैयार होने वाली फसलों का विकल्प
प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाना राज्य कृषि विश्वविद्यालय में कृषि अर्थशास्त्र विभाग की वरिष्ठ प्रोफेसर और प्रमुख डॉ. के. सुहासिनी का कहना है कि किसानों को ज्वार, बाजरा, कंगनी और कुटकी जैसी कम अवधि में तैयार होने वाली फसलों के विकल्पों पर विचार करना चाहिए।

हालांकि, कौन-सी फसल उपयुक्त होगी, यह बीजों की उपलब्धता, मिट्टी की स्थिति और सिंचाई की सुविधा पर निर्भर करेगा। उन्होंने जोर दिया कि किसानों को दूसरी फसलों की ओर प्रोत्साहित करने के लिए उनकी उपज खरीदने की पक्की व्यवस्था जरूरी है।

धान के खेतों में दूसरी फसल उगाना भी आसान नहीं
सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के कार्यकारी निदेशक जी.वी. रामानंजनेयुलु के मुताबिक, धान के खेतों को दूसरी फसलों के लिए तैयार करना भी एक चुनौती है। धान की खेती में पानी को मिट्टी में नीचे जाने से रोकने के लिए खेत में मिट्टी को गीला करके दबाया जाता है। इस प्रक्रिया को पडलिंग कहते हैं। इससे मिट्टी सख्त हो जाती है और सब्जियों की जड़ों को गहराई तक जाने में परेशानी हो सकती है।

इसलिए धान से दूसरी फसलों की ओर बदलाव के लिए सिर्फ किसानों को सलाह देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें फसल चुनने, खेत तैयार करने, बीज उपलब्ध कराने, सिंचाई और उपज बेचने तक जरूरी मदद की जरूरत होगी।
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