नए गन्ना पेराई सीजन (2026-27) के शुभारंभ में सुस्ती देखने को मिली है। गुरुवार को सूत्रों के हवाले से बताया गया कि महाराष्ट्र की 55 चीनी मिलों में से अब तक केवल 15 मिलो में ही गन्ने की पेराई का काम शुरू हो पाया है, जबकि कर्नाटक में नियमित पेराई का काम अभी शुरू भी नहीं हो सका है।
इस सुस्ती के पीछे प्रमुख उत्पादक इलाकों में किसानों के प्रदर्शन को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। दूसरी तरफ किसानों की समस्याओं को सुलझाने के लिए सरकार की ओर से एक समिति बनाए जाने के बाद भी आंदोलन शांत नहीं हुआ है। महाराष्ट्र देश का दूसरा और कर्नाटक तीसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य है, ऐसे में मिलों के बंद रहने से पेराई का काम काफी पिछड़ रहा है।
मिलों में पूजा हुई, लेकिन पूरी तरह काम शुरू नहीं
जानकारों के अनुसार, महाराष्ट्र में 40 मिलों ने अक्टूबर में पेराई सत्र शुरू करने से पहले होने वाली पारंपरिक पूजा तो कर ली है, लेकिन किसानों के आंदोलन के कारण वे पूरी तरह परिचालन (कामकाज) शुरू नहीं कर पाई हैं।
प्रदेश में केवल 15 चीनी मिलें ही 8 अक्टूबर से चालू हो सकी हैं। सूत्रों का कहना है कि इन 15 मिलों से तैयार होने वाली चीनी से बाजार में चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
दूसरी ओर, कर्नाटक में विरोध प्रदर्शनों के कारण आम सत्र की एक भी मिल में कामकाज शुरू नहीं हो पाया है। जानकारोंने बताया कि राज्य की कुल 28 मिलों में से इस समय केवल 8 मिलें ही चल रही हैं, जहां विशेष सत्र (स्पेशल सीजन) के दौरान उगाए गए गन्ने की पेराई की जा रही है।
दाम बढ़ाने की मांग और दिल्ली में हुई बातचीत
दोनों राज्यों के किसान गन्ने के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी और चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) को बढ़ाकर ₹60 प्रति किलोग्राम करने की मांग कर रहे हैं।
किसानों द्वारा राष्ट्रीय राजमार्गों को जाम करने की चेतावनी दिए जाने के बाद, केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रल्हाद जोशी और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्रीय राजधानी में प्रमुख किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी। इस बैठक में किसानों की मांगों और चिंताओं की जांच करने के लिए नीति आयोग के पूर्व सदस्य रमेश चंद की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने का निर्णय लिया गया था।
कमेटी की समय-सीमा तय न होने से किसानों में नाराजगी
सूत्रों के अनुसार, किसान संगठनों ने समिति गठित करने के इस कदम को नामंजूर कर दिया है और अपना आंदोलन जारी रखने का फैसला किया है।
किसानों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि सरकार ने कमेटी की अधिसूचना तो जारी कर दी है, लेकिन समिति को अपनी रिपोर्ट सौंपने या सिफारिशों को लागू करने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की है। किसानों का मानना है कि इससे उनकी मांगों पर तुरंत कोई फैसला नहीं हो सकेगा और समाधान में देरी होगी।