मध्य प्रदेश सरकार ने खरीफ सोयाबीन के लिए केंद्र सरकार की भावांतर को अपनी मंजूरी दे दी है। इस कदम से यह तय करना है कि सरकारी एजेंसियों को अनाज की भौतिक रूप से खरीद किए बिना ही किसानों को तिलहन के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का सीधा लाभ मिल सके। कृषि मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, सरकारी एजेंसियों द्वारा सीधे खरीद से बाजार का संतुलन बिगड़ने और भंडारण में होने वाले नुकसान की आशंका रहती है। इसी से बचने के लिए कर्नाटक सरकार ने भी इस सीजन में पहली बार इस योजना को लागू करने में दिलचस्पी दिखाई है।
एमएसपी के 15 प्रतिशत तक का भुगतान करेगा केंद्र
मध्य प्रदेश पूरे देश में एकमात्र ऐसा राज्य है जिसने पीडीपीएस को लागू किया है। इसके तहत जब भी मंडियों में फसल की कीमत तय मानक से नीचे जाती है, तो केंद्र सरकार किसानों को एमएसपी के 15 प्रतिशत तक का भुगतान करती है। योजना में अधिसूचित तिलहन फसलों के अनुमानित उत्पादन का 25 प्रतिशत तक कवर किया जाता है, जबकि राज्य सरकारें अपने खर्च पर इस कवरेज को और भी बढ़ा सकती हैं।
सोयाबीन की कीमत एमएसपी से काफी ज्यादा
मध्य प्रदेश के किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के सचिव निशांत वरवड़े के अनुसार, साल 2025 के खरीफ सीजन में भावांतर के तहत 7.2 लाख किसानों को 1500 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। वहीं रबी सीजन के दौरान सरसों की कीमतें एमएसपी से काफी ऊपर थीं। सरकार के अनुसार, विपणन वर्ष 2026-27 के लिए सोयाबीन का एमएसपी 5708 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि वर्तमान में मंडियों में इसकी कीमत 6700 से 6800 रुपये प्रति क्विंटल के बीच बनी हुई है। अधिकारियों का मानना है कि कीमतें एमएसपी से ऊपर रहने की संभावना के चलते इस सीजन में शायद भावांतर योजना के तहत भुगतान की आवश्यकता न पड़े।
24 अक्तूबर तक कराएं पंजीकरण
मध्य प्रदेश के किसानों के लिए भावांतर योजना के पोर्टल पर पंजीकरण कराने की अंतिम तिथि 24 अक्टूबर 2026 तय की गई है। योजना का लाभ उठाने के लिए अधिसूचित मंडियों में फसल बेचने की मान्य अवधि 22 अक्टूबर 2026 से 15 जनवरी 2027 के बीच निर्धारित की गई है। इसके लिए राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश मंडी बोर्ड को एक वर्ष की क्रेडिट लिमिट के तौर पर 1500 करोड़ रुपये भी आवंटित किए हैं।
मंडियों में फसल के रेट तय करने के लिए शुरुआती 14 दिनों का मॉडल रेट राज्य की अधिसूचित मंडियों के भारित औसत पर तय किया जाएगा। इसके बाद हर दिन का रेट पिछले 14 दिनों के औसत के आधार पर ई-मंडी पोर्टल पर प्रदर्शित होगा। सरकार के अनुसार, इस योजना में किसी भी तरह की हेराफेरी को रोकने के लिए 'एग्री-स्टैक' जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जा रहा है। इसके जरिए किसानों को डिजिटल आईडी दी गई है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत जानकारी, जमीन का ब्यौरा और फसल का पैटर्न दर्ज रहता है।
बाजार के जोखिम से बचाव और 2017 का अनुभव
कृषि मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, यह योजना बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव के खतरे को एक प्रबंधनीय और बीमित जोखिम में बदल देती है। किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि मंत्रालय ने राज्यों को यह अनुमति दी है कि वे बाजार हस्तक्षेप कार्यक्रम (MIS) और वास्तविक बिक्री मूल्य के बीच 25 प्रतिशत तक के घाटे का भुगतान कर सकते हैं। इस घाटे को केंद्र और राज्य सरकार द्वारा आधा-आधा साझा किया जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, मध्य प्रदेश ने इससे पहले साल 2017 में भी सोयाबीन, मूंगफली और दलहन (अरहर आदि) सहित आठ फसलों के लिए 'भावांतर भुगतान योजना' शुरू की थी, जिसे बाद में सरकार ने बंद कर दिया था। विशेषज्ञों का मानना है कि वह पुरानी योजना व्यापारियों की हेराफेरी, किसानों को भुगतान में होने वाली देरी और फसल बेचने के लिए सीमित समय मिलने के कारण विफल हो गई थी, जिसके चलते बाजार में अचानक से आपूर्ति बहुत ज्यादा बढ़ गई थी।