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National Workshop: 5 साल में 3 करोड़ टन मछली उत्पादन का लक्ष्य, छोटे मछुआरों की कमाई बढ़ाने पर जोर

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Fri, 23 Oct 2026 06:13 PM IST
सार

भारत ने अगले पांच वर्षों में मछली उत्पादन 3 करोड़ टन करने और समुद्री खाद्य निर्यात 1.25 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। जानें छोटे मछुआरों के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय कार्ययोजना की खास बातें।

भोपाल में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला
भोपाल में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारत में छोटे स्तर पर अंतर्देशीय मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए अलग राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार की जा रही है। इसका उद्देश्य मछुआरों की आजीविका में सुधार, मीठे पानी के संसाधनों का बेहतर प्रबंधन और मछली पालन को टिकाऊ बनाना है। केंद्रीय मत्स्य विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने शुक्रवार को इस कार्ययोजना को तैयार करने की प्रक्रिया की शुरुआत की। यह योजना संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के ढांचे के तहत बनाई जा रही है।

इस पहल का नेतृत्व केंद्रीय मत्स्य विभाग, बंगाल की खाड़ी कार्यक्रम अंतर-सरकारी संगठन (बीओबीपी-आईजीओ) के सहयोग से कर रहा है। भोपाल में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में योजना की प्राथमिकताओं पर चर्चा की गई। इसमें मछुआरा समुदायों और अन्य संबंधित पक्षों से बातचीत कर उनकी जरूरतों को योजना में शामिल करने पर जोर दिया गया।

पांच साल में 3 करोड़ टन मछली उत्पादन का लक्ष्य
डॉ. अभिलक्ष लिखी ने कहा कि भारत ने अगले पांच वर्षों में मछली उत्पादन बढ़ाकर 3 करोड़ टन करने का लक्ष्य रखा है। इसी अवधि में समुद्री खाद्य उत्पादों का निर्यात बढ़ाकर 1.25 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने की उम्मीद है। उनके मुताबिक, देश में अभी सालाना 1.97 करोड़ टन मछली का उत्पादन हो रहा है। इसमें करीब तीन-चौथाई योगदान अंतर्देशीय मत्स्य पालन का है। वहीं, समुद्री खाद्य उत्पादों का निर्यात 70 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है।

उन्होंने कहा कि मछली उत्पादन और निर्यात बढ़ाने के साथ छोटे मछुआरों की आजीविका सुरक्षित रखना भी जरूरी है। कार्ययोजना का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि योजनाओं का लाभ मछुआरा समुदायों तक पहुंचे और उनकी आमदनी में वास्तविक सुधार हो।

जलवायु परिवर्तन और पानी की गुणवत्ता बड़ी चुनौती
मत्स्य विभाग के सचिव ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और जलाशयों में पानी की गिरती गुणवत्ता अंतर्देशीय मत्स्य पालन के लिए बड़ी चुनौतियां हैं। कई जल निकायों में पानी में ऑक्सीजन का स्तर घटने जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। ऐसे में कार्ययोजना में जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने और मछली पालन को अधिक टिकाऊ बनाने के उपाय शामिल किए जाएंगे।

उन्होंने कहा कि मछुआरा समुदायों के अनुभवों का इस्तेमाल भी योजना तैयार करने में किया जाना चाहिए, क्योंकि वे इन चुनौतियों का सीधे सामना करते हैं। योजना का मकसद केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मछुआरों की आय और रोजगार के अवसरों को बेहतर बनाना भी है।

नदियों से लेकर झीलों और जलाशयों तक पर रहेगा ध्यान
प्रस्तावित कार्ययोजना में नदियों, नहरों, जलाशयों, झीलों, बाढ़ के मैदानों में बनने वाली आर्द्रभूमियों, तालाबों और ठंडे पानी वाले क्षेत्रों में होने वाले मत्स्य पालन को शामिल किया जाएगा। भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में मछली पालन की परिस्थितियां और मछुआरों की समस्याएं अलग हैं। इसलिए स्थानीय जरूरतों के अनुसार उपाय तैयार करने पर जोर दिया जाएगा।

बीओबीपी-आईजीओ के निदेशक डॉ. पी. कृष्णन ने बताया कि योजना में मछली पकड़ने के अधिकार, संसाधनों का प्रबंधन, रोजगार, बेहतर कार्य परिस्थितियां, लैंगिक समानता, मछली की बिक्री और कटाई के बाद उसके प्रबंधन जैसे विषयों पर भी ध्यान दिया जाएगा। आपदाओं और जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों को भी इसमें शामिल किया जाएगा।

मछुआरा समुदायों से बातचीत के बाद बनेगी योजना
भोपाल में हुई कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों ने योजना तैयार करने के लिए जरूरी गतिविधियों का खाका बनाया। अब मछुआरा समुदायों और अन्य हितधारकों से परामर्श किया जाएगा। इसके बाद कार्ययोजना को अंतिम रूप देकर अगले महीने सार्वजनिक रूप से जारी करने की योजना है। फिर इसे लागू किया जाएगा।

डॉ. लिखी ने कहा कि राष्ट्रीय कार्ययोजना केवल सरकारी दस्तावेज बनकर न रह जाए, बल्कि इससे मछुआरों की आजीविका में व्यावहारिक सुधार होना चाहिए। इसके लिए देशभर के मछुआरा समुदायों तक पहुंच बनाने और योजना को जमीनी स्तर पर लागू करने पर जोर दिया गया है।
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