भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के इंदौर स्थित राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान ने 9 अक्टूबर 2026 को सोयाबीन कटाई दिवस का आयोजन किया। इस दौरान संस्थान की ओर से तैयार सोयाबीन की दो किस्मों एनआरसी 268 और एनआरसी 270 की पैदावार का आकलन किया गया। दोनों किस्मों को एक-एक एकड़ खेत में बोया गया था। शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, खराब मौसम के बावजूद इन किस्मों से करीब 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलने के संकेत हैं। देश में सोयाबीन की औसत पैदावार फिलहाल 10 से 11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
उन्नत बीजों से 25 क्विंटल तक हो सकती है पैदावार
राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान और अखिल भारतीय समन्वित सोयाबीन अनुसंधान परियोजना के तहत देशभर में परीक्षण किए जा रहे हैं। इन परीक्षणों के अनुसार, उन्नत बीजों और खेती के वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर किसान 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक सोयाबीन पैदा कर सकते हैं। मौसम और दूसरी परिस्थितियां अनुकूल रहने पर पैदावार 22 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है।
कटाई दिवस का उद्देश्य सोयाबीन की नई किस्मों से मिलने वाले उत्पादन का आकलन करना और पैदावार बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक जानकारी जुटाना था।
खराब मौसम में भी मिला 20 क्विंटल उत्पादन का संकेत
कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव और आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने शुरुआती आंकड़ों की सराहना की। उनके अनुसार, सोयाबीन की पैदावार बढ़ाने में उन्नत बीजों और वैज्ञानिक खेती के तरीकों की अहम भूमिका है। महानिदेशक ने बताया कि इस साल खराब मौसम के बावजूद एनआरसी 268 और एनआरसी 270 से करीब 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलने के संकेत मिले हैं। इन आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने से भविष्य में सोयाबीन की पैदावार बढ़ाने की योजना बनाने में मदद मिलेगी।
कई साल तक जुटाए जाएंगे पैदावार के आंकड़े
राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर के निदेशक के अनुसार, कटाई दिवस पर जुटाए गए आंकड़ों का इस्तेमाल सिर्फ एक साल के उत्पादन का आकलन करने के लिए नहीं होगा। कई वर्षों तक आंकड़े जुटाकर उनका विश्लेषण किया जाएगा। इससे पता चलेगा कि अलग-अलग क्षेत्रों, मौसम और सोयाबीन की किस्मों का पैदावार पर क्या असर पड़ता है।
इस अध्ययन से भविष्य में सोयाबीन के उत्पादन का बेहतर आकलन करने में मदद मिलेगी। सरकार और संस्थान का लक्ष्य उन्नत बीजों की पैदावार क्षमता को परखना और वैज्ञानिक खेती की जानकारी किसानों तक पहुंचाना है। इससे कृषि अनुसंधान में मिली जानकारी को किसानों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।