बिहार के सहरसा जिले में जीविका दीदियों की आमदनी बढ़ाने के लिए सरकार ने सूरजमुखी की खेती के साथ मधुमक्खी पालन का एकीकृत मॉडल लागू करने का फैसला लिया है। कृषि और उद्यान विभाग के अनुसार, इस पहल से स्थानीय महिलाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा। यह मॉडल महिलाओं को सूरजमुखी के बेहतर उत्पादन के साथ शहद से कमाई बढ़ाने का मौका दे सकता है।
सूरजमुखी की सूर्या और मॉर्डन किस्मों को मिलेगा बढ़ावा
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, कोसी क्षेत्र की मिट्टी और वहां की जलवायु सूरजमुखी की खेती के लिए बहुत ही अनुकूल है। इसी को ध्यान में रखते हुए, विभाग द्वारा क्षेत्र में सूरजमुखी की सूर्या और मॉर्डन किस्मों की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि ये दोनों ही किस्में कम समय में अधिक उपज देने में सक्षम हैं और यह फसल लगभग 90 से 100 दिनों में पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है।
मधुमक्खी पालन के गुर सीखेंगी महिलाएं
योजना को सफल बनाने के लिए जीविका दीदियों को आधुनिक खेती और मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस प्रशिक्षण में विशेषज्ञ महिलाओं को मधुमक्खी के बक्से रखने, उनकी सही तरीके से देखभाल करने और सही समय पर शहद निकालने के तरीके सिखाएंगे।
ज्यादा फसलों की पैदावार और अच्छी गुणवत्ता का शहद
जानकारों के अनुसार, सूरजमुखी एक पर-परागण वाली फसल है। इसमें बेहतर बीज और अधिक पैदावार के लिए परागण की प्रक्रिया बहुत जरूरी मानी जाती है। सूरजमुखी के फूलों से मधुमक्खियों को काफी मात्रा में मकरंद और पराग मिलता है। जब मधुमक्खियां फूलों पर बैठती हैं, तो वे परागण में बहुत मददगार साबित होती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि सूरजमुखी के बीजों का आकार बढ़ता है और उनमें से तेल की मात्रा भी ज्यादा निकलती है। दूसरी तरफ, फूलों से मिलने वाले भरपूर मकरंद के कारण महिलाओं को बहुत ही अच्छी गुणवत्ता वाला शहद प्राप्त होगा। इस तरह यह संयुक्त तरीका महिलाओं को खेती और शहद उत्पादन, दोनों रूपों में फायदा पहुंचाएगा।
आर्थिक सहायता और बाजार में बिक्री की व्यवस्था
सरकार की निर्धारित योजनाओं के तहत, कृषि विभाग की ओर से जीविका दीदियों को मधुमक्खी पालन के लिए जरूरी संसाधन, तकनीकी जानकारी और आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। जीविका के जिला परियोजना प्रबंधक श्लोक कुमार के अनुसार, इस एकीकृत पहल से जीविका दीदियों को बहुत लाभ होगा।
उन्होंने बताया कि जब क्षेत्र में शहद का उत्पादन अधिक मात्रा में होगा, तो इसे बिक्री के लिए अन्य बाजारों और दूरदराज के स्थानों पर भी भेजा जाएगा। इस पूरी व्यवस्था का लक्ष्य यह है कि महिलाओं को अपनी उपज और मेहनत का सही मूल्य मिल सके, जिससे उनकी कमाई में निरंतर वृद्धि होती रहे।