सेब और केसर की खेती के लिए मशहूर जम्मू-कश्मीर में अब जल्द बिहार का प्रसिद्ध मखाना भी उगता दिखेगा। इसके लिए दरभंगा स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र और शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के बीच समझौता पक्का हुआ है। इस साझेदारी के तहत कश्मीर के किसानों को मखाना उत्पादन की नई तकनीक सिखाई जाएगी। इससे इलाके में खेती के नए विकल्प तैयार होंगे और किसानों की कमाई के साधन बढ़ेंगे।
इस पहल का मकसद मखाना, कमल और सिंघाड़ा जैसी पानी में होने वाली फसलों की पैदावार और इनकी प्रोसेसिंग को बढ़ावा देना है।
वैज्ञानिकों की टीम कश्मीर जाकर देगी ट्रेनिंग
योजना को जमीन पर उतारने के लिए दरभंगा अनुसंधान केंद्र के वरीय (सीनियर) वैज्ञानिक डॉ. आइएस सिंह ने बांडीपोरा-वन में बने कृषि विज्ञान केंद्र का दौरा किया और स्थानीय वैज्ञानिकों के साथ तकनीकी बातों पर चर्चा की। इसके बाद, जम्मू-कश्मीर कृषि विभाग के विशेष अनुरोध पर वरीय वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार की अगुवाई में चार सदस्यों की एक विशेषज्ञ टीम नवंबर या दिसंबर में राज्य का दौरा करेगी। यह टीम वहां के किसानों और कृषि अधिकारियों को मिट्टी, पानी, रोपाई के तरीके और फसल की देखभाल की पूरी ट्रेनिंग देगी।
स्वर्ण वैदेही किस्म का होगा परीक्षण
जम्मू-कश्मीर के मौसम और जलवायु में मखाने की उन्नत किस्म 'स्वर्ण वैदेही' का परीक्षण किया जाएगा। यह विशेष किस्म दरभंगा अनुसंधान केंद्र ने विकसित की है। यह ठहरे हुए पानी, दलदली जमीन और जलभराव वाले इलाकों के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, कश्मीर की मिट्टी, पानी और तापमान के आधार पर इसकी सफलता को परखा जाएगा। अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो पहाड़ी इलाकों में भी मखाने की व्यावसायिक खेती के नए रास्ते खुल जाएंगे।
10 राज्यों में किया जा रहा विस्तार
वर्तमान में दरभंगा का अनुसंधान केंद्र देश के 10 राज्यों में मखाने की खेती को फैलाने का काम कर रहा है। इसके तहत हाल ही में असम, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड के किसानों को भी उन्नत ट्रेनिंग दी गई है।
इसके साथ ही, बिहार के मुख्य उत्पादक जिलों- मधुबनी, पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, सुपौल, अररिया, मधेपुरा और सीतामढ़ी के किसानों को भी लगातार अच्छे बीज और प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर देश में मौजूद जल संसाधनों का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो आने वाले 10 सालों में मखाने की खेती का दायरा बढ़कर चार लाख हेक्टेयर तक पहुंच सकता है।