जमीन की गुणवत्ता और उत्पादकता में गिरावट को सुधारना ग्रामीण आय में बढ़ोतरी का एक सफल तरीका बन सकता है। यह बात डब्लूआरआई इंडिया की कार्यकारी कार्यक्रम निदेशक (खाद्य, भूमि और जल) रुचिका सिंह के हवाले से सामने आई है। उनके अनुसार, इस पहल में स्थानीय समुदाय को प्राकृतिक संसाधनों के सही इस्तेमाल और आजीविका बढ़ाने के लिए योजना बनानी चाहिए।
पारंपरिक खेती का नुकसान, मिट्टी की सेहत खराब
रुचिका सिंह के अनुसार, रासायनिक खादों के ज्यादा इस्तेमाल, एक ही तरह की फसल उगाने और मिट्टी के कटाव के कारण भारत की लगभग आधी खेतिहर जमीन की सेहत खराब हो चुकी है। इसमें जैविक कार्बन की कमी हो गई है, जिसका सीधा असर फसल की पैदावार पर पड़ रहा है।
मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में जमीन सुधारने की पहल
डब्लूआरआई इंडिया मध्य प्रदेश के सीधी जिले में प्रशासन और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर खेतों और जंगलों में पानी और हरियाली वापस लाने का काम कर रहा है। वहीं, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के कोरची ब्लॉक में आदिवासी गांवों के साथ मिलकर जंगलों, खेतों और पानी के स्रोतों को सुधारने की योजना पर काम हो रहा है।
रुचिका सिंह के अनुसार, गढ़चिरौली में मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर खेती होती है। वहां खाली पड़े धान के खेतों में दोबारा खेती करने, पौष्टिक बगीचे (न्यूट्रि गार्डन) लगाने, पानी बचाने वाली धान की खेती और पेड़ों से जुड़े उपाय करने से पैदावार बढ़ सकती है। इससे लोगों को खाने और पोषण की सुरक्षा मिलेगी। उन्होंने कहा कि हर जगह एक ही योजना लागू नहीं की जा सकती, इसे वहां के पर्यावरण, उपलब्ध संसाधनों और स्थानीय लोगों की जरूरतों के हिसाब से तय करना होगा।
सीधी में 13,000 परिवारों को मिला रोजगार
रुचिका सिंह ने बताया कि बंजर जमीन सुधारने के कामों से गांवों में रोजगार पैदा होता है। सीधी जिले में इस पहल के तहत पूर्व महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से 13,000 से ज्यादा परिवारों को मजदूरी का काम मिला।
किसानों की एक कंपनी गोपदबनास ने बांस का व्यापार शुरू किया। सीधे ओरिएंट पेपर मिल्स से जुड़ने के कारण किसानों की बिचौलियों पर निर्भरता कम हुई और उन्हें अच्छी कीमत मिली। सीधी में किए गए एक आकलन के अनुसार, ऐसे कामों से भविष्य में 3,000 से ज्यादा छोटे उद्योग बनाए जा सकते हैं, जिनसे 30,000 लोगों को रोजगार मिल सकता है।
महुआ से महिलाओं ने कमाए लाखों रुपये
आजीविका अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान के नेतृत्व में महिला उत्पादक समूह महुआ को लेकर एक बेहतरीन काम कर रहे हैं। महिलाओं को महुआ सुरक्षित तरीके से इकट्ठा करने की ट्रेनिंग दी गई है। इन महिलाओं ने 10 टन से ज्यादा अच्छी क्वालिटी का महुआ 'महुआ बैंक' में जमा किया है।
इस महुआ से महिलाओं ने लड्डू, कुकीज और चाय जैसे उत्पाद बनाए। लगभग 2,300 किलो महुआ के लड्डू और कुकीज बेचकर इन महिलाओं ने 9.98 लाख रुपये की शानदार कमाई की है। इसके अलावा कटहल और आंवले जैसे उत्पादों पर भी काम किया जा रहा है।
ग्राम पंचायतों की भूमिका और भविष्य की जरूरतें
रुचिका सिंह के अनुसार, जमीन सुधारने के इस काम को ग्राम पंचायत की विकास योजनाओं का हिस्सा बनाया जाना चाहिए और इसे ग्राम सभाओं, सरकारी योजनाओं और निजी निवेश का समर्थन मिलना चाहिए। अगले पांच सालों में इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य हिस्सा बनाने के लिए सरकारी फंड के साथ-साथ निजी निवेश की भी जरूरत होगी। बाजार मजबूत होने पर जमीन सुधार का यह काम रोजगार और स्थायी विकास का एक बड़ा जरिया बन सकता है।