केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खाद्य तेलों पर आयात शुल्क घटाने और कुछ मामलों में खत्म करने के सरकार के फैसले का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसा संतुलन बनाना होगा, जिससे देश में खाद्य तेल की पर्याप्त उपलब्धता रहे और किसानों के हित भी सुरक्षित रहें।
उन्होंने बताया कि किसानों को मंडियों में एमएसपी से कम कीमत मिलने पर तुरंत सरकारी खरीद शुरू हो सके, इसके लिए केंद्र की नोडल एजेंसियां नेफेड (NAFED) और एनसीसीएफ (NCCF) अब राज्यों के अनुरोध का इंतजार किए बिना अपने स्तर पर तिलहन और दलहन की खरीद कर सकेंगी।
खाद्य तेल की कीमतों पर नियंत्रण के लिए घटाया आयात शुल्क
सरकार ने इस महीने की शुरुआत में पाम ऑयल और सोयाबीन तेल पर आयात शुल्क आधा कर दिया था। वहीं, कच्चे सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क खत्म कर दिया गया। भारत अपनी खाद्य तेल की करीब 55 फीसदी जरूरत आयात से पूरी करता है।
वित्त मंत्रालय की 23 सितंबर की अधिसूचना के अनुसार, कच्चे सोयाबीन और पाम तेल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी गई है। वहीं, रिफाइंड सोयाबीन और पाम तेल पर यह शुल्क 32.5 फीसदी से घटकर 27.5 फीसदी हो गया है। कच्चे सूरजमुखी तेल पर पहले 10 फीसदी आयात शुल्क था, जिसे खत्म कर दिया गया है। वहीं, रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर शुल्क 32.5 फीसदी से घटाकर 22.5 फीसदी किया गया है।
महंगा हो रहा खाद्य तेल, बढ़ी महंगाई की चिंता
खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में कटौती ऐसे समय की गई है, जब खाद्य महंगाई बढ़ रही है। अगस्त में अखिल भारतीय उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (CFPI) 5.95 फीसदी रहा, जो जुलाई के 5.52 फीसदी से अधिक है। खाद्य टोकरी में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले रिफाइंड तेल की खुदरा महंगाई भी लगातार बढ़ी है। अप्रैल में यह 10.25 फीसदी पहुंच गई थी और अगस्त में बढ़कर 14.24 फीसदी हो गई।
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार का उद्देश्य पर्याप्त मात्रा में खाद्य तेल उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से खाद्य तेलों के लिए आयात पर निर्भर रहा है, इसलिए आयात कोई नया कदम नहीं है।
एमएसपी से नीचे भाव आते ही खरीद शुरू कर सकेंगी नेफेड-एनसीसीएफ
पीएम-आशा योजना के तहत तिलहन और दलहन की एमएसपी पर सरकारी खरीद में होने वाली देरी को कम करने के लिए नियमों में बदलाव किया गया है। कृषि मंत्री ने बताया कि कई बार राज्यों से औपचारिक अनुरोध आने और मंजूरी मिलने में समय लग जाता है। इस दौरान मंडी में फसल के दाम एमएसपी से नीचे चले जाते हैं और किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है।
अब नेफेड और एनसीसीएफ जैसी अधिकृत एजेंसियां मंडी भाव एमएसपी से नीचे आते ही खरीद शुरू कर सकेंगी। बाद में राज्य की ओर से औपचारिक मंजूरी मिलने पर खरीदी गई मात्रा को समायोजित किया जाएगा।
राजस्थान में एमएसपी से नीचे बिक रही मूंग
राजस्थान में इस बदलाव की जरूरत मूंग की खरीद के मामले में साफ दिखाई देती है। राजस्थान खरीफ सीजन में मूंग का प्रमुख उत्पादक राज्य है। 1 सितंबर से अब तक करीब 63,000 टन मूंग मंडियों में पहुंच चुकी है, जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में करीब 10 गुना ज्यादा है।
इसके बावजूद किसानों को मूंग का औसत भाव करीब ₹7,452 प्रति क्विंटल मिल रहा है, जबकि इसकी एमएसपी ₹8,780 प्रति क्विंटल है। यानी किसानों को एमएसपी से करीब 15 फीसदी कम कीमत मिल रही है। सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था से ऐसे मामलों में सरकारी खरीद जल्दी शुरू हो सकेगी और किसानों को एमएसपी के नीचे फसल बेचने की मजबूरी कम होगी।
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