झारखंड के दुमका जिले में रेशम उत्पादन ग्रामीण किसानों की आय और आत्मनिर्भरता का मजबूत जरिया बन गया है। जिले के काठीकुंड, शिकारीपाड़ा और गोपीकांदर के किसान पीढ़ियों से चले आ रहे इस काम को पूरी मेहनत से कर रहे हैं। गांव में ही रोजगार मिलने की वजह से ग्रामीणों का दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए होने वाला पलायन काफी हद तक कम हो गया है।
सरकारी और सहकारी संस्थाओं के अनुसार, क्षेत्र में रेशम उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों के बीच लगभग 2.87 लाख से 2.88 लाख डीएफएल बांटे गए हैं। इनमें केंद्रीय रेशम बोर्ड (काठीकुंड) ने करीब 60-65 किसानों को 10,150, झारखंड अग्र परियोजना केंद्र ने 130 किसानों को 27-28 हजार और एभेन तसर कॉपरेटिव लिमिटेड ने लगभग 1,500 तसर पालकों को ढाई लाख डीएफएल दिए हैं।
पेड़ों पर कीड़ों की देखरेख और मुनाफा
रेशम कीटों को पालन के लिए किसान आसन और अर्जुन के पेड़ों की डालियों पर तसर के कीड़े चढ़ाते हैं। ये कीड़े पेड़ों की पत्तियां खाकर बड़े होते हैं। किसान मौसम और कीड़ों के स्वास्थ्य पर कड़ी नजर रखते हैं। लगभग 45 से 60 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद कोसे तैयार होते हैं। अनुकूल मौसम और बाजार का भाव अच्छा रहने पर किसान एक ही फसल में हजारों से लाखों रुपये तक का मुनाफा कमा लेते हैं।
स्थानीय रोजगार से मजबूत हो रही अर्थव्यवस्था
साल 2002 से रेशम उत्पादन में लगे बजरीसोल गांव के किसान रविलाल मुर्मू और शहरीटोला के मीरु हेंब्रम के अनुसार, इस व्यवसाय से होने वाली कमाई से घर की जरूरतें पूरी होती हैं और बच्चों की पढ़ाई का खर्च आसानी से निकल जाता है। किसानों का मानना है कि इस काम में बहुत मेहनत और नियमित निगरानी लगती है, लेकिन 45-60 दिन बाद मिलने वाले फल से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति काफी सुधर रही है।