सूखे की मार का सामना करने की क्षमता मात्र किसान की जोत के आकार पर निर्भर नहीं करता। बदलते मौसम की चुनौती से निपटने के लिए किसानों ेक पास आर्थिक संसाधन, कमाई के अन्य जरिए, सही जानकारी और सरकारी मदद तक पहुंच होना बहुत जरूरी है। यह बात बिट्स पिलानी के शोध में सामने आई है। शोधकर्ताओं ने 162 सूखे और अर्ध-सूखे जिलों के किसानों पर एक अहम अध्ययन सामने रखा है। बता दें कि इस मानसूनी सीजन में कम बारिश ने किसान आय पर दबाव आने की संभावना को जन्म दिया है, खासतौर से महाराष्ट्र-कर्नाटक जैसे राज्यों की कृषि अर्थव्यवस्था पर सबसे बड़ी मार पड़ी है।
घटते खेत और छोटे किसानों की चुनौतियां
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां अधिकतर किसान छोटी जोत पर खेती करते हैं। अध्ययन के मुताबिक, छोटे किसानों के सामने सीमित जमीन पर पैदावार बढ़ाने, सिंचाई का इंतजाम करने और नई तकनीक अपनाने के लिए पैसा जुटाने की बहुत बड़ी चुनौती होती है। जब मौसम खराब होता है और फसल को नुकसान पहुंचता है, तो सीधे तौर पर परिवार की आमदनी पर बुरा असर पड़ता है।
कमाई के दूसरे माध्यम से मिलता है सहारा
खेती में होने वाले आर्थिक जोखिम को कम करने के लिए किसानों को आय के दूसरे विकल्प भी तलाशने पड़ रहे हैं। अध्ययन के अनुसार, कई किसान अब खेती संग पशुपालन से अपनी कमाई कर रहे हैं। वहीं, कुछ किसान अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए मजदूरी या छोटे-मोटे कारोबार का सहारा ले रहे हैं। जब किसानों के पास कमाई के एक से ज्यादा साधन होते हैं, तो फसल खराब होने पर भी उन्हें आर्थिक मोर्चे पर सहारा मिल जाता है और जोखिम कम हो जाता है।
बीमा, कर्ज और सरकारी योजनाओं की भूमिका
मौसम की मार और संकट से निपटने में फसल बीमा, बैंक का कर्ज और सरकारी रोजगार योजनाएं बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं। अध्ययन में बताया गया है कि इन सुविधाओं के जरिए किसानों को मुसीबत के समय आर्थिक मदद मिलती है। लेकिन, इस राहत का पूरा फायदा उठाने के लिए किसानों की इन योजनाओं तक पहुंच होना बेहद जरूरी है।
अध्ययन के अनुसार, छोटे किसानों को मजबूत बनाने के लिए उनकी निर्भरता केवल खेती पर सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें आर्थिक संसाधनों के साथ-साथ रोजगार के अन्य विकल्प, सही जानकारी और सरकारी सहायता उपलब्ध कराना बहुत आवश्यक है।