राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने पहुंच और लाभ साझाकरण व्यवस्था के तहत 29 राज्य जैव विविधता बोर्डों और एक केंद्र शासित प्रदेश की जैव विविधता परिषद को कुल 1.19 करोड़ रुपये की राशि बांटी है। प्राधिकरण के अनुसार, यह रकम उन कंपनियों से मिली है जिन्होंने खेती से जुड़े जैविक संसाधनों का इस्तेमाल रिसर्च और अपने व्यावसायिक मुनाफे के लिए किया था। इस पैसे का उपयोग जैविक संसाधनों को बचाने, उनके सही इस्तेमाल और स्थानीय लोगों के कल्याण के लिए किया जाएगा।
खेती के रकबे के आधार पर किया गया पैसे का बंटवारा
यह जैविक संसाधन सीधे किसानों के बजाय बाजार या व्यापारियों से खरीदे गए थे, इसलिए उन लोगों की पहचान करना मुश्किल था जिन्हें सीधे इसका लाभ मिलना चाहिए था। इसी वजह से प्राधिकरण की विशेषज्ञ समिति ने पैसे बांटने का एक खास तरीका अपनाया। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के आधार पर जिस राज्य में इन फसलों की जितनी खेती होती है, उसी अनुपात में यह पैसा राज्यों को दिया गया है। इस बंटवारे में महाराष्ट्र को सबसे ज्यादा 19 लाख 46 हजार रुपये से अधिक मिले हैं। इसके बाद राजस्थान को 13 लाख 97 हजार, मध्य प्रदेश को 13 लाख 32 हजार, कर्नाटक को 10 लाख 49 हजार और तेलंगाना को 9 लाख 55 हजार रुपये दिए गए हैं। इनके अलावा गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों व केंद्र शासित प्रदेश को भी उनकी हिस्सेदारी के अनुसार रकम दी गई है।
मक्का, धान और कपास के इस्तेमाल से मिला यह पैसा
प्राधिकरण के अनुसार, यह पैसा मुख्य रूप से मक्का, धान, बाजरा और कपास जैसे कृषि संसाधनों के इस्तेमाल के बदले कंपनियों द्वारा दिया गया है। कॉर्टेवा क्रॉप इंडिया, पायनियर ओवरसीज, पायनियर हाई-ब्रेड, लिमाग्रेन इंडिया, लिमाग्रेन थाईलैंड, लिमाग्रेन ब्रासील और सिंजेंटा इंडिया जैसी बड़ी कंपनियों ने मक्का और स्वीट कॉर्न की किस्मों के इस्तेमाल के लिए यह राशि दी है। इसके अलावा धान, बाजरे और कपास की अलग-अलग किस्मों की रिसर्च और व्यावसायिक उपयोग के लिए भी क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड सहित अन्य कंपनियों ने अपना योगदान दिया है।
गांवों के विकास और पर्यावरण पर खर्च होगी यह राशि
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश को दी गई इस राशि का इस्तेमाल जैविक विविधता अधिनियम 2002 की धारा 32(2) के तहत तय किए गए कामों के लिए ही किया जाएगा। प्राधिकरण के अनुसार, इस पैसे से स्थानीय स्तर पर जैव विविधता से जुड़ी जानकारी जुटाने, पर्यावरण को बचाने, स्थानीय शासन को मजबूत करने, रिसर्च करने और लोगों के लिए आजीविका के साधन बढ़ाने जैसे जरूरी काम किए जाएंगे।
कृषि क्षेत्र से अब तक बांटे जा चुके हैं 86 करोड़ रुपये
भारत में कृषि क्षेत्र अब लाभ साझाकरण का एक बड़ा जरिया बनकर उभर रहा है। अब तक प्राधिकरण कृषि क्षेत्र से हासिल किए गए 86 करोड़ रुपये अलग-अलग लाभार्थियों को बांट चुका है, जबकि कुल मिलाकर यह आंकड़ा 203 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। आर्मेनिया के येरेवान में 19 से 30 अक्टूबर 2026 तक होने वाले 'कॉप 17' सम्मेलन से ठीक पहले, यह पहल दिखाती है कि देश अपनी जैविक संपदा को बचाने और उसका फायदा आम लोगों तक पहुंचाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।