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बुंदेलखंड विश्वविद्यालय का शोध: बुंदेलखंड में जल जीवन मिशन स्वास्थ्य-शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर लाया बदलाव

गांव जंक्शन डेस्क, लखनऊ Published by: Devesh Saraswat Updated Sun, 25 May 2025 03:24 PM IST
सार

जल जीवन मिशन के तहत बुंदेलखंड में आए बदलावों को जानने के लिए बुंदेलखंड विश्वविद्यालय ने एक अध्ययन किया है। इस अध्ययन में बुंदेलखंड के सातों जनपदों के 10-10 गांवों में सर्वे किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इन गांवों के हर परिवारों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो रहा है,जिससे लोगों के स्वास्थ्य में सुधार आया है। जल जनित बीमारियों से छुटकारा और पाचन क्रिया में भी सुधार हुआ। जानिए विस्तार से...

बुंदेलखंड में जल जीवन मिशन स्वास्थ्य-शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर लाया बदलाव
बुंदेलखंड में जल जीवन मिशन स्वास्थ्य-शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर लाया बदलाव - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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जल जीवन मिशन के तहत बुंदेलखंड में आए बदलावों को जानने के लिए बुंदेलखंड विश्वविद्यालय ने एक अध्ययन किया है। इस अध्ययन में बुंदेलखंड के सातों जनपदों के 10-10 गांवों में सर्वे किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इन गांवों के हर परिवारों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो रहा है,जिससे लोगों के स्वास्थ्य में सुधार आया है। जल जनित बीमारियों से छुटकारा और पाचन क्रिया में भी सुधार हुआ। पेट संबंधी समस्याएं भी कम हुई हैं। स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता से मानसिक मोर्चे पर सुधार आया है, जिससे कार्य क्षमता में वृद्धि हुई। 

विश्वविद्यालय ने योजना लागू होने के बाद आए बदलावों का किया जिक्र 
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के समाज कार्य विभाग ने जल जीवन मिशन योजना के लागू होने के बाद आमजन के जीवन में आए बदलावों का जिक्र किया।  यह रिपोर्ट स्वास्थ्य सुधार, शिक्षा पर प्रभाव,आर्थिक व सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक सामंजस्य व दृष्टिकोण, रोजगार समेत पांच पहलुओं को लेकर की गई है। 

शिक्षा पर क्या हुआ प्रभाव 
जल जीवन मिशन के माध्यम से विद्यालयों को पूरी तरह कवर किया गया है। स्कूलों में बच्चों (खासतौर पर बालिकाओं) का नामांकन बढ़ा है। ड्राप आउट कम हुआ है। इस योजना के कारण स्वच्छता में भी सुधार आया। विद्यालय में रखी टंकी में अब जल संग्रह होता है। शौचालय की व्यवस्था होने से बालिकाओं के नामांकन की दर में वृद्धि हुई है। 

मातृ मुत्यु दर में गिरावट 
अध्ययन की रिपोर्ट में सामने आया कि इन गांवों मातृ मुत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आई है। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं के स्वास्थ्य में सुधार हआ। दूर से जल लाने के कारण होने वाले गर्दन और कमर दर्द से भी ग्रामीणों को निजात मिली है। दूषित जल के कारण हड्डियां कमजोर होती थीं। लेकिन अब इस समस्या में कमी आई है। वहीं, इलाज पर होने वाले खर्च में काफी बचत हुई।  

आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर कितना परिवर्तन
शुद्ध पेयजल की उपलब्धता से सामाजिक भेदभाव में कमी और रहन-सहन के स्तर में बदलाव आया है। महिलाएं कृषि, पशुपालन व अन्य उत्पादक गतिविधियों में अधिक सक्रिय होकर भाग ले रही हैं। शौचालय बने और जल की उपलब्धता से महिलाओं के सम्मान-सुरक्षा में वृद्धि हुई है। महिलाओं के रोजगार का भी सृजन हुआ है। वहीं, 95 फीसदी लोगों के चिकित्सा खर्च में बचत हुई है। 

जातिगत भेदभाव समाप्त
गांवों में पानी की पहुंच से जातिगत भेदभाव समाप्त हुआ है। सामुदायिक संबंध मजबूत हुए है। वहीं, लोगों के बीच सहयोगात्मक व्यवहार में बढ़ोतरी हुई है। जल संकट के समाधान से सामाजिक तनाव में कमी दर्ज की गई है। महिलाओं का आत्मबल मजबूत हुआ है। ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था में सुदृढ़ता आई है। वहीं, बाल-विवाह में और दहेज प्रथा में 93 फीसदी की कमी आई है। 

स्वरोजगार की नींव 
अध्ययन के दौरान पलायन कर रहे व्यक्तियों ने बताया कि अब गांव में ही स्वरोजगार से लाभ मिल रहा है। कृषि के लिए उपलब्ध जमीन उपजाऊ है, जिससे फसलों का उत्पादन किया जा रहा है। मनरेगा में युवाओं द्वारा काम की मांग भी बढ़ी है। युवाओं का पलायन रुका है। रोजगार परक,कृषि व पशुपालन कार्यों में भागीदारी बढ़ी है। वहीं, मुर्गी-मछली पालन, डेयरी, मोबाइल और किराना की दुकान आदि रोजगार के कार्यों के प्रति युवा आकर्षित होकर काम कर रहे हैं। जल की उपलब्धता से पशुपालन के अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं। स्वरोजगार के कारण 92 फीसदी युवाओं ने गांव में रहने को प्राथमिकता दी है। 

सर्वे के सुझाव
इस सर्वे के माध्यम से बुंदेलखंड विश्वविद्यालय ने स्वास्थ्य, शिक्षा-आर्थिक मानकों व सामाजिक दृष्टिकोण में आए बदलावों को सामने रखा है। वहीं कई सरकार के कई विभागों इस संबंध में सुझाव भी दिए हैं:
  • पेयजल के उपभोग के प्रति अपव्यय रोकने के लिए जागरूकता पर जोर। 
  • स्वच्छ पेयजल की उपयोगिता व उपादेयता के प्रति जागरूक करना। 
  • सामाजिक कार्यकर्ताओं और एनजीओ के साथ मिलकर समाज को जल संरक्षण तकनीकी के बारे में शिक्षित करना।
  • पंचायत सदस्यों और फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं की भूमिका को बढ़ावा देना। 
  • घऱ के नल के पानी के उपयोग के लाभों को समझाने और दैनिक उपभोग के लिए अपनाने के लिए प्रेरित करना। 
  • जल सहेलियों का सहयोग लेने से पहले उन्हें प्रशिक्षित करना। 
  • स्वच्छ पेयजल के सदुपयोग पर विशेष जोर।
  • जलापूर्ति को लेकर विद्यालयों के चौकीदारों को भी जागरूक करना सुझावों में शामिल हैं। 
बुंदेलखंड के इन जनपदों के 10-10 गांवों में हुआ सर्वे 
बांदाः
नारायणपुर, मझिवा सानी, जखनी, गोरेमऊ कलां, डाडामऊ, नरी, सहूरपुर,गरौली शुक्ल, थरथुआ व बड़ांखर खुर्द 
चित्रकूटः देउंधा,चहटा, नोनमई, बुधवल, बरहट, रामटेकवा, बसावनपुर, मानिकपुर, सरहट व हनुवा
हमीरपुरः हरौलीपुर, पचखुरा, बिलौटा, रिऊआ, हसऊपुर सैंसा, धरकपुर, जरिया टीला, करगवा, टिकुर व अतरा
झांसीः गुवावली, बैजपुर, सिया, सुल्तानपुरा, पुरवा, घाटकोटरा, पारीक्षा, तिलैथा, गैरहा व चिरकना 
जालौनः हथेरी, चमारी, रायपुरा, रवा, रूरा सिरसा, सला (जम्होरी खुर्द), झगुई खुर्द, मषई एट (घमसेनी), जौसारी खुर्द व गिरथान 
महोबाः बरी, बघवा खेड़ा, गड़हरी, रिहुनिया, इमली खेड़ा, बमनेथा, काशीपुरा, लिलवा, धनावन व कुरौरा डांग
ललितपुरः रामपुर, बदनपुर, पिपरट, बम्हौरी, कचनौदा, गुगखारा, कल्याणपुरा, गदयाना, इक्कलगुवा व थनरावा 

केसे हुआ अध्ययन
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में असोसिएट प्रोफेसर डॉ. यतीन्द्र मिश्र के अनुसार, ढाई महीने में बुंदेलखंड के सात जनपदों के 70 गांव में टीम ने अध्ययन किया गया। टीम में शोधार्थी और 4 फैकल्टी मेम्बर शामिल रहे। हमने यह पाया कि हर घर जल की वजह से आमजन के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ है। हर परिवार के पास पानी पहुंच गया है। पीने के पानी के कारण लोगों का स्वास्थ्य काफी अच्छा रहा है। इसके साथ ही यह भी महसूस किया गया कि पानी के संरक्षण पर भी जागरूकता की आवश्यकता है।  बता दें कि अध्ययनमहिलाओं, युवाओं, आशा-आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, विद्यार्थियों आदि से बातचीत के आधार पर किया गया। 
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