विज्ञापन
Home› Khabar Junction› Report The Villain Of Delhi S Pollution Is Not Stubble The Air Of The Capital Is Becoming More Poisonous Due

Report: दिल्ली के प्रदूषण का विलेन पराली नहीं, स्थानीय कारणों से ज्यादा जहरीली हो रही राजधानी की हवा...

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Thu, 29 Oct 2026 12:39 PM IST
सार

  • दिल्ली के वायु प्रदूषण पर पराली जलाने का कम असर, क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण में दावा
  • खुद राजधानी और गैर कृषि स्रोतों ने वायु की गुणवत्ता खराब करने में बड़ी भूमिका
  • गौर करने वाली बात यह है कि इस विश्लेषण में पराली जलाने के मामलों और AQI के बीच तालमेल बैठता नजर नहीं आया
  • इस साल सितंबर-अक्टूबर में मौसम की वजह से प्रदूषण और ज्यादा खराब नहीं हुआ, कारण क्या है?
  • पराली प्रबंधन अपनाने वाले किसानों को पूरा प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है
  • एक अध्ययन के अनुसार, किसानों का एक छोटा हिस्सा ही पराली जलाता है

दिल्ली के वायु प्रदूषण में पराली नहीं, खुद दिल्ली और गैर कृषि स्रोत बड़ा कारक।
दिल्ली के वायु प्रदूषण में पराली नहीं, खुद दिल्ली और गैर कृषि स्रोत बड़ा कारक। - फोटो : सोशल मीडिया
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सर्दी के शुरुआती महीनों में  दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण गंभीर चुनौती का रूप ले लेता है। बीते सालों में इस सफेद धुंध की चादर के पीछे पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों में पराली जलाने के मामलों को बड़ा जिम्मेदार ठहराते हैं। हालांकि एक विश्लेषण का कहना है कि सितंबर और अक्तूबर महीनों में पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से दिल्ली की हवा की गुणवत्ता पर बहुत कम असर पड़ा है। क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण में हुआ खुलासा; वहीं एक दूसरे अध्ययन के अनुसार, हरियाणा में पराली की गांठ बनाने वाले सिर्फ 7 प्रतिशत किसानों को ही मिल रहा है खरीदारों से पैसा।

हवा की गुणवत्ता खराब करने में खुद दिल्ली और गैर कृषि स्रोत बड़े कारक
 ऐसे मे ंसवाल उठता है कि सर्दी के दौरन लुढ़कने वाली हवा की गुणवत्ता के पीछे अहम कारण क्या हैं। क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट राजधानी में वायु  प्रदूषण के स्तर को तय करने में स्थानीय और गैर कृषि स्रोतों की बड़ी भूमिका का जिक्र करती है।  रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के सालों में दिल्ली के औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक में दिखने वाला सुधार असलियत को छुपाता है, क्योंकि यहां के एक आम दिन की हवा वास्तव में पहले से ज्यादा खराब हुई है।

औसत और सामान्य दिनों के प्रदूषण में अंतर
आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 और 2026 के बीच दिल्ली का औसत एक्यूआई 169.3 से घटकर 142.6 रह गया, जो 15.8 प्रतिशत का सुधार दिखाता है। लेकिन सामान्य दिन की हवा को दिखाने वाला'मीडियन एक्यूआई 135 से बढ़कर 154 हो गया, यानी इसमें 14.1 प्रतिशत की खराबी आई है। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि मीडियन एक्यूआई आम दिन की हवा को बेहतर तरीके से मापता है, क्योंकि इस पर एक-दो दिन के अत्यधिक प्रदूषण का असर नहीं पड़ता।

पराली की घटनाओं और एक्यूआई का तालमेल नहीं
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 और 2026 के दौरान पंजाब और हरियाणा में पराली में आग लगने की घटनाओं में खास बदलाव नहीं हुआ और यह केवल 4 प्रतिशत कम हुईं, फिर भी दिल्ली का एक्यूआई 15.8 प्रतिशत सुधर गया। इसके उलट, साल 2024 और 2025 के बीच पराली जलने के मामलों में 88 प्रतिशत की भारी कमी आई थी, लेकिन तब दिल्ली के एक्यूआई में केवल 3.9 प्रतिशत का ही सुधार हुआ था।

अत्यधिक प्रदूषण वाले दिनों में आई कमी
विश्लेषण में बताया गया है कि यह सुधार केवल बहुत ज्यादा खराब दिनों के लगभग खत्म होने की वजह से दिखाई दे रहा है। 200 से अधिक एक्यूआई वाले दिन 10 से घटकर केवल 3 रह गए, और इस दौरान एक्यूआई 300 के पार बिल्कुल नहीं गया, जबकि पिछले साल यह अधिकतम 353 तक पहुंच गया था। रिपोर्ट के अनुसार, यह बेहद खराब दिनों में कमी को दिखाता है, न कि पूरे सितंबर-अक्टूबर के दौरान हवा के पूरी तरह साफ होने को।

इस बार ज्यादा खराब नहीं हुई हवा की सेहत 
रिपोर्ट के अनुसार, इस साल सितंबर-अक्टूबर में प्रदूषण और ज्यादा खराब नहीं हुआ, जबकि इस दौरान अल-नीनो मजबूत हो रहा था और 2025 की तुलना में बारिश में 78.2 प्रतिशत की भारी कमी आई थी। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह स्थिति दर्शाती है कि सुधार का कारण मौसम या खेत नहीं, बल्कि दिल्ली के अपने स्थानीय प्रदूषण उत्सर्जन में आया कोई बदलाव है।

पराली न जलाने वाले किसानों को पूरा प्रोत्साहन नहीं
दूसरी ओर, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर के एक अध्ययन में सामने आया है कि पराली जलाने का विकल्प चुनने वाले किसानों को पूरा प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। इस साल जनवरी से मार्च के बीच हरियाणा के 12 जिलों के 144 गांवों के 1,588 किसानों के बीच किए गए सर्वे में पाया गया कि पराली की गांठ बनाने वाले केवल 7 प्रतिशत किसानों को ही खरीदारों से भुगतान मिल पाता है।

काफी कम किसान ही पराली जलाते हैं
सीईईडब्ल्यू के सर्वे के अनुसार, किसान धान की पराली के निपटारे के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। लगभग 39 प्रतिशत किसान पराली का उपयोग चारे के रूप में करते हैं, 38 प्रतिशत किसान इसकी गांठें बनाते हैं और 32 प्रतिशत किसान सुपर सीडर जैसी मशीनों की मदद से इसे मिट्टी में मिला देते हैं। अध्ययन में केवल 6 प्रतिशत किसानों ने ही पराली जलाने की बात मानी, हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि यह आंकड़ा वास्तविकता से कम दर्ज हो सकता है, क्योंकि 26 प्रतिशत किसानों ने माना कि उनके गांवों में पराली जलाई गई थी।


विज्ञापन
विज्ञापन