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Rajasthan: 'महीनों का इंतजार नहीं, अब हर हफ्ते कमाई', गेहूं-सरसों के चक्र से निकले किसान, अपनाई गेंदे की खेती

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Tue, 20 Oct 2026 09:16 AM IST
सार

  • राजस्थान के बुरावई गांव में फूलों की खेती से बनी नई पहचान
  • तीन साल में 100 बीघा से ज्यादा जमीन पर फैली खेती
  • गेहूं-सरसों की जगह गेंदे और दूसरे फूलों की खेती को प्राथमिकता
  • फूलों की बिक्री से किसानों को नियमित आमदनी
  • तुड़ाई और विपणन से गांव में रोजगार के नए अवसर

बुरावई गांव के किसानों ने गेहूं-सरसों के चक्र से निकलकर गेंदे को अपनाया।
बुरावई गांव के किसानों ने गेहूं-सरसों के चक्र से निकलकर गेंदे को अपनाया। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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राजस्थान के भरतपुर जिले का बुरावई गांव अब पारंपरिक खेती को छोड़कर गेंदे और अन्य किस्मों के फूलों की खेती की वजह से 'फूलों वाले गांव' के रूप में नई पहचान बना रहा है। गेहूं और सरसों के स्थान पर फूलों की खेती को प्राथमिकता देने के कारण पिछले तीन साल के भीतर गांव के किसानों ने 100 बीघा से अधिक जमीन पर इसका विस्तार कर लिया है। पारंपरिक खेती में बढ़ती लागत और घटते मुनाफे की चुनौतियों से जूझ रहे किसानों के लिए यह विकल्प कमाई का एक बेहतर जरिया साबित हो रहा है।

गेहूं-सरसों के चक्र से बाहर निकले किसान
भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से गेहूं और सरसों की खेती मुख्य रूप से की जाती रही है, लेकिन कृषि लागत बढ़ने और तैयार फसलों का सही मूल्य न मिलने के कारण किसानों को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। बुरावई गांव के किसानों ने लगभग तीन साल पहले गेंदे और अन्य किस्मों के फूल उगाने की शुरुआत की थी।

स्थानीय किसान कमल सिंह के अनुसार, पहले ग्रामीण पूरी तरह गेहूं और सरसों उगाने पर निर्भर थे, जिसमें मौसम की मार और कम मूल्य के कारण उचित लाभ नहीं मिल पाता था। शुरुआती दौर में सीमित भूमि पर किया गया फूलों की खेती का प्रयोग सफल रहा और बाजार में बेहतर मांग के कारण किसानों को पारंपरिक फसलों की तुलना में अधिक लाभ मिला। गेंदे के फूलों से हुई अच्छी कमाई को देखकर अन्य किसानों की रुचि भी इस ओर बढ़ी और देखते-ही-देखते 100 बीघा से अधिक भूमि पर फूलों की पैदावार ली जाने लगी।

तीन साल में बदली खेती की तस्वीर
पिछले तीन वर्षों में बुरावई गांव में खेती की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब खेत गेहूं और सरसों के साथ-साथ गेंदे के फूलों से भी लहलहाते नजर आते हैं। फूलों की खेती से मिलने वाली नियमित आमदनी ने किसानों की वित्तीय निर्भरता को कम किया है। पहले जहां फसल कटने तक महीनों इंतजार करना पड़ता था, वहीं अब फूलों की बिक्री से नियमित रूप से नकदी मिल रही है।

इस बदलाव से न केवल परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है, बल्कि गांव में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं। फूलों की देखभाल, तुड़ाई और विपणन में स्थानीय स्तर पर श्रम की मांग बढ़ने से यह गांव आसपास के क्षेत्रों के लिए कृषि विविधीकरण का एक प्रमुख उदाहरण बन गया है।

आर्थिक मजबूती आई, दूसरे गांवों तक असर
बुरावई गांव के किसानों की यह सफलता आसपास के अन्य गांवों के किसानों को भी प्रेरित कर रही है। पड़ोसी क्षेत्रों के किसान भी अब यहां आकर फूलों की खेती की तकनीक, लागत और विपणन से जुड़ी जानकारियां ले रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि बाजार में फूलों की लगातार मांग बनी रहती है और किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलता है, तो इस क्षेत्र में फूलों की खेती का दायरा और अधिक बढ़ेगा, जिससे बुरावई गांव की पहचान एक प्रमुख पुष्प उत्पादक केंद्र के रूप में और अधिक मजबूत होगी।


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