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रबी फसलों की MSP पर बढ़ोतरी: शिवराज बोले- दलहन-तिलहन का उत्पादन बढ़ाना जरूरी, कम पानी वाले क्षेत्रों पर भी जोर

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Wed, 30 Sep 2026 05:27 PM IST
सार

  • कुसुम की MSP में सबसे ज्यादा 675 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी
  • रेपसीड-सरसों 413 और मसूर 390 रुपये प्रति क्विंटल महंगी
  • जौ की MSP 136 और चने की 83 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ी
  • गेहूं की MSP में 25 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी

शिवराज सिंह चौहान
शिवराज सिंह चौहान - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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केंद्र सरकार ने रबी सीजन 2027-28 के लिए छह प्रमुख फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी की है। इस बीच कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पत्रकारों को बताया कि गेहूं, जौ, चना, मसूर, रेपसीड-सरसों और कुसुम की MSP बढ़ाई गई है। सरकार का कहना है कि किसानों को उनकी लागत पर लाभकारी मूल्य देने के साथ दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाना भी इस फैसले का प्रमुख उद्देश्य है।

चौहान के मुताबिक, MSP में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी कुसुम की हुई है। इसकी कीमत में 675 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है। रेपसीड-सरसों की MSP 413 रुपये, मसूर की 390 रुपये, जौ की 136 रुपये और चने की 83 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाई गई है। गेहूं की MSP में 25 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है।

लागत पर 50 फीसदी से अधिक मार्जिन
कृषि मंत्री ने कहा कि रबी फसलों की MSP लागत को ध्यान में रखते हुए तय की गई है। उन्होंने बताया कि सरकार ने किसानों को लागत पर कम से कम 50 फीसदी लाभ देने की नीति के तहत MSP तय की है। कुछ फसलों में लागत के मुकाबले लाभ का मार्जिन इससे अधिक है।

गेहूं के साथ दलहन-तिलहन पर जोर
चौहान ने कहा कि देश में गेहूं का उत्पादन और उत्पादकता लगातार बढ़ रही है और वर्तमान में गेहूं का पर्याप्त भंडार है। इसके बावजूद किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य देना जरूरी है। वहीं, दलहन की उत्पादकता गेहूं की तुलना में कम है। ऐसे में किसानों को दलहन की खेती के लिए प्रोत्साहित करना जरूरी है।

उन्होंने बताया कि देश में दालों की जरूरत का एक हिस्सा अभी आयात से पूरा होता है। सरकार का लक्ष्य घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करना है। इसके लिए दलहन मिशन के तहत किसानों को विभिन्न तरह की सहायता दी जा रही है।

धान के बाद खाली खेतों में दलहन की खेती
कृषि मंत्री ने कहा कि धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले क्षेत्रों में दलहन की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे किसानों को अतिरिक्त फसल लेने का मौका मिलेगा और देश में दलहन का उत्पादन भी बढ़ेगा। मसूर के उत्पादन पर भी सरकार का विशेष जोर है। चौहान ने कहा कि देश में मसूर की जरूरत का एक हिस्सा दूसरे देशों से आयात करना पड़ता है। इसलिए किसानों को इसका उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

सरसों से खाद्य तेल का आयात घटाने की कोशिश
रेपसीड और सरसों को खाद्य तेल के लिहाज से महत्वपूर्ण बताते हुए चौहान ने कहा कि इन फसलों का उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है। MSP में बढ़ोतरी का उद्देश्य किसानों को तिलहन की खेती के लिए प्रोत्साहित करना और खाद्य तेल के लिए आयात पर निर्भरता कम करना है। धान के बाद खाली रहने वाले खेतों में तिलहन की खेती को भी बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।

कम पानी और कम उपजाऊ जमीन में कुसुम उपयोगी
चौहान ने बताया कि कुसुम ऐसी फसल है, जो कम पानी और अपेक्षाकृत कम उपजाऊ जमीन में भी उगाई जा सकती है। खासकर आदिवासी क्षेत्रों में इसकी खेती की संभावनाएं हैं। इसलिए सरकार ने इसकी MSP में सबसे अधिक 675 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की है।

कम बारिश वाले क्षेत्रों के लिए अलग योजना
देश में इस साल बारिश की स्थिति को लेकर पूछे गए सवाल पर कृषि मंत्री ने कहा कि सभी राज्यों में स्थिति एक जैसी नहीं है। कई जगह पर्याप्त बारिश हुई है, जबकि कुछ क्षेत्रों में बारिश कम रही है। इसलिए पूरे देश के लिए एक जैसा कृषि प्लान नहीं बनाया जा सकता।

उन्होंने बताया कि सरकार ने खरीफ और रबी की तैयारी के लिए पहले जिला स्तर पर बैठकें कीं। इसके बाद राज्यों और अलग-अलग क्षेत्रों के साथ बैठक कर उनकी स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर योजनाएं तैयार की गईं। कम बारिश वाले क्षेत्रों में मिट्टी की नमी और उपलब्ध पानी के अनुसार फसलों का चयन करने पर जोर दिया जा रहा है।

कम पानी वाले क्षेत्रों में ज्यादा पानी वाली फसल से बचने की सलाह
चौहान ने कहा कि जहां जलाशयों में पानी कम है, वहां रबी में ऐसी फसलें नहीं लगाई जानी चाहिए जिनमें ज्यादा पानी की जरूरत होती है। स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए फसल योजना तैयार की गई है। जिन क्षेत्रों में पानी की कमी की स्थिति है, वहां के लिए कंटिजेंसी प्लान भी तैयार है।

उन्होंने कहा कि फिलहाल देश के सामने कोई बड़ा जल संकट नहीं है, लेकिन कुछ इलाकों में पानी की कमी चिंता का विषय है। इसलिए सरकार की कोशिश है कि जमीन पर मौजूद वास्तविक स्थिति के आधार पर रबी फसल की योजना लागू की जाए।
 
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