भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक है, फिर भी घरेलू मांग पूरी करने और आयात पर निर्भरता घटाने की चुनौती बनी हुई है। इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने 11 अक्टूबर 2025 को 11,440 करोड़ रुपये के 'दालों में आत्मनिर्भरता मिशन' की शुरुआत की थी। 11 अक्टूबर 2026 को इस मिशन का एक साल पूरा हो गया है। इसका उद्देश्य घरेलू उत्पादन बढ़ाने, किसानों की आमदनी सुधारने और देश के लिए प्रोटीन से भरपूर भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ विदेशी मुद्रा बचाना भी है।
छह साल के इस मिशन का लक्ष्य वर्ष 2030-31 तक देश में दालों का उत्पादन बढ़ाकर 350 लाख टन करना और विदेशों से दालों के आयात पर निर्भरता कम करना है। सरकार का कहना है कि मिशन के तहत अरहर, उड़द और मसूर की खेती को बढ़ावा देने के साथ किसानों को बेहतर बीज, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सरकारी खरीद की सुविधा देने पर जोर दिया जा रहा है।
छह साल में 350 लाख टन दाल उत्पादन का लक्ष्य
भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। दालें प्रोटीन का प्रमुख स्रोत हैं। इनमें लगभग 20 से 25 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। गेहूं और चावल की तुलना में दालों में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। इसलिए देश में पोषण सुरक्षा के लिहाज से भी इनका उत्पादन बढ़ाना जरूरी है। सरकार ने वर्ष 2030-31 तक दालों का उत्पादन बढ़ाकर करीब 350 लाख टन करने का लक्ष्य रखा है। इसके साथ ही प्रति हेक्टेयर औसत उपज को बढ़ाकर 1,130 किलोग्राम करने की योजना है।
मिशन के तहत दालों की खेती का रकबा 35 लाख हेक्टेयर बढ़ाया जाएगा। इसे वर्ष 2030-31 तक कुल 310 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। इसके लिए देश के 489 जिलों में क्लस्टर आधारित खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। इसमें किसी क्षेत्र की जलवायु और खेती की परिस्थितियों के अनुसार दालों की पैदावार बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा।
किसानों को मिलेंगी 87.5 लाख मुफ्त बीज किट
दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराए जाएंगे। मिशन के छह साल के दौरान 87.5 लाख मुफ्त बीज किट बांटने और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। खासतौर पर अरहर, उड़द और मसूर की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके साथ ऐसी किस्मों के बीजों पर जोर दिया जाएगा, जो बदलते मौसम और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर सकें।
धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों में भी दालों की खेती बढ़ाने की योजना है। इससे जमीन का बेहतर इस्तेमाल होगा और किसानों को अतिरिक्त फसल लेने का अवसर मिलेगा। मिशन के तहत रबी 2025-26 में 9.25 लाख बीज किट बांटे जाने की जानकारी दी गई है।
दालों की खरीद के लिए 1,000 प्रसंस्करण इकाइयां
दालों की पैदावार बढ़ाने के साथ उनके भंडारण, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच को मजबूत करने की योजना है। इसके लिए देशभर में 1,000 दाल प्रसंस्करण इकाइयां यानी दाल मिलें स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।
पहले चरण में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 528 प्रसंस्करण इकाइयां आवंटित की जा चुकी हैं। वहीं, प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के तहत दाल प्रसंस्करण से जुड़ी 23 इकाइयों को मंजूरी दी गई है, जिनमें से 18 इकाइयां पूरी हो चुकी हैं। इन इकाइयों से दालों के प्रसंस्करण की क्षमता बढ़ाने और किसानों की उपज को बाजार तक पहुंचाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
अरहर, उड़द और मसूर की सरकारी खरीद का प्रावधान
दाल उत्पादक किसानों को उनकी फसल का उचित दाम दिलाने के लिए सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की व्यवस्था की है। इसके तहत भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ (NCCF) और भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (NAFED) को वर्ष 2025-26 से 2028-29 तक चार साल के लिए अरहर, उड़द और मसूर की खरीद की जिम्मेदारी दी गई है। यह खरीद इच्छुक और पंजीकृत किसानों से निर्धारित नियमों के अनुसार की जाएगी। इसका उद्देश्य किसानों को बाजार में कीमतों में गिरावट से बचाना और दालों की खेती के लिए प्रोत्साहित करना है।
सरकार के मुताबिक, 17 जून 2026 तक NCCF के खरीद डैशबोर्ड के अनुसार नौ राज्यों में कुल 10.55 लाख टन दालों की खरीद की गई थी। इसके लिए 7,047 करोड़ रुपये का MSP भुगतान किसानों को सीधे जारी किया गया। इस खरीद से 4.69 लाख किसानों को लाभ मिलने की जानकारी दी गई है।
अरहर, उड़द और मसूर के MSP में बढ़ोतरी
सरकार ने दाल उत्पादक किसानों को बेहतर दाम देने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की है। वर्ष 2024-25 की तुलना में 2026-27 के लिए प्रमुख दालों के MSP में बदलाव इस प्रकार है।
- उड़द : वर्ष 2024-25 में 7,400 रुपये प्रति क्विंटल था, जिसे 2026-27 के लिए बढ़ाकर 8,200 रुपये प्रति क्विंटल किया गया।
- अरहर : वर्ष 2024-25 में 7,550 रुपये प्रति क्विंटल था, जिसे बढ़ाकर 8,450 रुपये प्रति क्विंटल किया गया।
- मसूर : वर्ष 2024-25 में 6,700 रुपये प्रति क्विंटल था, जिसे बढ़ाकर 7,000 रुपये प्रति क्विंटल किया गया।
MSP में बढ़ोतरी का उद्देश्य किसानों को बेहतर मूल्य देना और दालों की खेती को अधिक लाभकारी बनाना है। हालांकि, किसानों को वास्तविक लाभ उनकी उपज, गुणवत्ता, पंजीकरण और खरीद के लागू नियमों पर भी निर्भर करेगा।
एक साल में बढ़ा दालों का उत्पादन
सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में वर्ष 2025-26 के दौरान दालों का उत्पादन बढ़कर 274.09 लाख टन हो गया। वर्ष 2024-25 में यह 256.83 लाख टन था। दालों की खेती का रकबा भी बढ़ा है। वर्ष 2024-25 में दालों की खेती 277.20 लाख हेक्टेयर में हुई थी, जो 2025-26 में बढ़कर 286.46 लाख हेक्टेयर हो गई।
इस दौरान प्रति हेक्टेयर औसत उपज में भी सुधार हुआ। वर्ष 2024-25 में दालों की औसत उत्पादकता 926 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी, जो 2025-26 में बढ़कर 957 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल देश के प्रमुख दाल उत्पादक राज्यों में शामिल हैं।
दालों के आयात में कमी, निर्यात बढ़ा
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में भारत ने 46,427.60 करोड़ रुपये की दालों का आयात किया था। वर्ष 2025-26 में आयात का मूल्य घटकर 31,793.59 करोड़ रुपये रह गया। इस तरह आयात मूल्य में 31.52 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
दूसरी ओर, दालों के निर्यात में बढ़ोतरी हुई। वर्ष 2024-25 में भारत ने 855 मिलियन डॉलर की दालों का निर्यात किया था, जो वर्ष 2025-26 में बढ़कर 969.53 मिलियन डॉलर हो गया। इस दौरान कुल 10.01 लाख टन दालों का निर्यात किया गया। भारत से दालों के प्रमुख खरीदार देशों में चीन, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बांग्लादेश, अमेरिका और श्रीलंका शामिल हैं।
डिजिटल तकनीक से होगी निगरानी
मिशन को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए सरकार डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल कर रही है। राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर तीन स्तरीय समितियां मिशन की योजना, कामकाज और प्रगति की निगरानी करेंगी।
कृषि मैपर ऐप के माध्यम से खेतों की भौगोलिक स्थिति दर्ज करने और बीजों की किस्मों के प्रदर्शन व पैदावार पर नजर रखने में मदद मिलेगी। वहीं, साथी (SATHI) पोर्टल के जरिए बीज उत्पादन से लेकर प्रमाणन और बिक्री तक की जानकारी दर्ज करने की व्यवस्था है। एग्रीस्टैक और डिजिटल क्रॉप सर्वे के माध्यम से किसान पहचान पत्र, खेतों के सत्यापित रिकॉर्ड और फसल संबंधी आंकड़ों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। ई-समृद्धि और विस्तार जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल भुगतान, बाजार की जानकारी और घरेलू कीमतों की निगरानी के लिए किया जाएगा।
किसानों की आमदनी और देश की पोषण सुरक्षा पर जोर
दालों में आत्मनिर्भरता मिशन का मुख्य उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है। इसके जरिए किसानों को बेहतर बीज, उचित मूल्य, सरकारी खरीद और प्रसंस्करण की सुविधाएं उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया जा रहा है।
यदि मिशन के लक्ष्य हासिल होते हैं, तो भारत को दालों के आयात पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने और देश में प्रोटीन से भरपूर भोजन की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। साथ ही, किसानों के लिए दालों की खेती को अधिक लाभकारी बनाने का अवसर भी पैदा होगा।
वर्ष 2030-31 तक 350 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य हासिल करना इस मिशन की बड़ी चुनौती होगी। इसके लिए बेहतर बीज, सिंचाई, खेती की आधुनिक तकनीक, उचित बाजार और समय पर सरकारी खरीद की व्यवस्था महत्वपूर्ण रहेगी।