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Preparations Underway Market Kashmir Gi Tagged Products Domestically Abroad But This Poses Significant Challen
पश्मीना से केसर तक: कश्मीर के GI टैग वाले उत्पादों को देश-विदेश में बेचने की तैयारी, लेकिन यह हैं बड़ी चुनौती
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Sat, 10 Oct 2026 08:42 AM IST
सार
कश्मीरी पश्मीना, केसर और पारंपरिक हस्तशिल्प को देश-विदेश के बाजारों तक पहुंचाने की तैयारी है। लेकिन GI टैग वाले उत्पादों की जांच में देरी और असली सामान की पहचान बचाना बड़ी चुनौती है। जानिए, कश्मीर के पारंपरिक उत्पादों के कारोबार को आगे बढ़ाने में क्या बाधाएं हैं।
जम्मू-कश्मीर के पारंपरिक उत्पादों को देश और विदेश के बाजारों तक पहुंचाने की तैयारी है। इसके लिए सरकार खरीदार-विक्रेता बैठकें और दूसरे व्यापारिक कार्यक्रम आयोजित कर रही है। हालांकि, GI टैग वाले उत्पादों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करना और उनकी जांच में लगने वाला लंबा समय स्थानीय कारीगरों, किसानों और निर्यातकों के लिए चुनौती बना हुआ है।
जम्मू-कश्मीर के कम से कम 25 उत्पादों को भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग मिल चुका है। इनमें हस्तशिल्प, केसर और दूसरे कृषि उत्पाद शामिल हैं। GI टैग किसी उत्पाद की उस खास पहचान को दर्शाता है, जो उसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य विशेषताओं के कारण किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है।
हाल ही में श्रीनगर में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय खरीदार-विक्रेता बैठक में कश्मीर के पारंपरिक उत्पादों को प्रदर्शित किया गया। इसमें देश के विभिन्न हिस्सों और विदेशी बाजारों से आए खरीदारों ने हिस्सा लिया। इसका उद्देश्य स्थानीय उत्पादकों और कारोबारियों को नए खरीदारों से जोड़ना और उनके उत्पादों के लिए बाजार का विस्तार करना है।
GI टैग से बढ़ रहा खरीदारों का भरोसा
निर्यातक और कश्मीर इकोनॉमिक एलायंस के प्रवक्ता काजी तौसीफ ने बिजनेस लाइन को बताया कि GI टैग वाले उत्पादों को खरीदारों से अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। खासकर कश्मीरी पश्मीना के मामले में प्रमाणन और जांच से ग्राहकों का भरोसा बढ़ाने में मदद मिल रही है।
उन्होंने कहा कि GI प्रमाणन और पश्मीना की जांच से असली कश्मीरी उत्पादों की पहचान मजबूत होती है। इससे उनकी बाजार में पहचान बढ़ाने और खरीदारों का विश्वास कायम करने में मदद मिलती है।हालांकि, तौसीफ ने उत्पादों की जांच के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं होने पर चिंता जताई। उनके मुताबिक, जांच के लिए केवल एक प्रयोगशाला उपलब्ध है और प्रक्रिया पूरी होने में कई महीने लग सकते हैं।
जांच में देरी से उन उत्पादकों और निर्यातकों को परेशानी हो सकती है, जो अपने सामान का प्रमाणन कराकर नए बाजारों तक पहुंचना चाहते हैं। हालांकि, लंबित जांच के मामलों की संख्या और इससे ऑर्डर या शिपमेंट पर पड़ने वाले असर का स्पष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
कश्मीरी उत्पादों की पहचान बचाना जरूरी
कश्मीर के GI टैग वाले प्रमुख उत्पादों में पश्मीना, केसर, कालीन, कानी शॉल, पेपर मेशी और अखरोट की लकड़ी पर की जाने वाली नक्काशी शामिल हैं। इन उत्पादों की पहचान और प्रतिष्ठा क्षेत्र की पारंपरिक कला, कौशल और स्थानीय उत्पादन से जुड़ी है।
लेकिन केवल GI टैग मिल जाने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि उस नाम से बिकने वाला हर उत्पाद असली है। इसके लिए उत्पादों की जांच, प्रमाणन और नियमों का प्रभावी पालन जरूरी है। इससे ग्राहकों को सही उत्पाद चुनने में मदद मिलती है और असली कारीगरों तथा उत्पादकों के हितों की रक्षा होती है।
कश्मीर के बाहर बने सामान को भी कश्मीर से जुड़े नामों के तहत बेचे जाने की आशंका स्थानीय उत्पादकों के लिए चिंता का विषय है। इससे असली उत्पादों की पहचान कमजोर पड़ सकती है और ग्राहकों का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
बाजार बढ़ाने के लिए गुणवत्ता और जांच पर जोर
निर्यातकों के सामने बड़ी चुनौती यह है कि GI टैग की पहचान को नियमित ऑर्डर और बेहतर कमाई में कैसे बदला जाए। प्रमाणन से उत्पाद की प्रामाणिकता साबित करने में मदद मिलती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में खरीदार कीमत, गुणवत्ता, एक जैसी उत्पाद विशेषताओं, पैकेजिंग और समय पर आपूर्ति को भी महत्व देते हैं।
तौसीफ के मुताबिक, GI टैग वाले उत्पादों को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयासों के साथ पर्याप्त जांच सुविधाएं उपलब्ध कराना, गलत नाम से उत्पाद बेचने पर रोक लगाने के लिए प्रभावी निगरानी करना और उत्पादकों को नए बाजारों तक पहुंचने में मदद देना भी जरूरी है। यदि इन चुनौतियों का समाधान किया जाता है, तो कश्मीर के पारंपरिक उत्पादों को व्यापक बाजार मिल सकता है और स्थानीय किसानों, कारीगरों तथा निर्यातकों के लिए नए व्यावसायिक अवसर बन सकते हैं।
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