एक तरफ भारत खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर बन गया है, दूसरी तरफ देश को पोषण सुरक्षा के मोर्चे पर काफी रास्ता तय करना है। इस रास्ते को तय करने में बायोफोर्टिफाइड किस्में और खेती काफी मदद कर सकती है। बायोफोर्टिफाइड किस्में में पारंपरिक किस्मों की तुलना में ज्यादा पोषक तत्व होते है। वहीं, बायोफोर्टिफाइड खेती में किसान उन तरीकों और उत्पादों का उपयोग करते हैं, जो फसल में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाते हैं। भारतीय थाली का राजा आलू- एक कार्बोहाइड्रेट से भरपूर कंद उपज है। लेकिन, साल 2024 में जारी हुई कुफरी जमुनिया किस्म पारंपरिक आलू की तुलना में शरीरी को ज्यादा विटामिन्स और खनिज देती है।
पोषण से भरपूर, विटामीन सी से जिंक तक मौजूदा
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान की यह किस्म बैंगनी रंग की है, जो कुपोषण से जंग में भारत की मदद कर सकती है। कुफरी जमुनिया आलू के 100 ग्राम हिस्से में 42.75 मिलीग्राम विटामिन सी होता है, जबकि साधारण आलू में यह केवल 23.15 मिलीग्राम होता है। इसमें 3.22 मिलीग्राम आयरन और 2.28 मिलीग्राम जिंक (प्रति 100 ग्राम) पाया गया है। इसके बैंगनी गूदे और छिलके में एंथोसायनिन नामक प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट भी मौजूद है। इससे पहले संस्थान कुफरी नीलकंठ और कुफरी माणिक जैसी किस्में भी विकसित कर चुका है।
35 हेक्टेयर उपज, अच्छी भंडारण क्षमता
सरकार के अनुसार, 'कुफरी जमुनिया' की खेती उत्तर भारत के मैदानी इलाकों के लिए अनुशंसित की गई है। इसके 90 दिनों के परीक्षण (स्टेशन ट्रायल) में प्रति हेक्टेयर लगभग 49 टन की बंपर पैदावार दर्ज की गई थी, जिसमें से 90 प्रतिशत उपज बाजार में बेचने लायक थी। सामान्य खेती के मानकों के तहत इसकी अनुशंसित उपज 32 से 35 टन प्रति हेक्टेयर है। इसमें लंबे समय तक सुरक्षित रखने (स्टोरेज क्वालिटी) की अच्छी क्षमता है।
बीजों की उपलब्था चुनौती?
व्यावसायिक रूप से इस आलू को उगाने के लिए बीजों की उपलब्धता एक चुनौती हो सकती है। विशेषज्ञ के अनुसार, चूंकि आलू के कंद धीरे-धीरे तैयार होते हैं, इसलिए किसानों को इसके प्रमाणित बीजों की जरूरत होगी। बाजार में शुरुआती आपूर्ति कम होने के कारण इस बैंगनी आलू की कीमत साधारण आलू से थोड़ी अधिक हो सकती है।