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पोखरण जैसी चालाकी! : सैटेलाइट को चकमा देकर पराली जला रहे किसान, अब ऐसे होगी आग की निगरानी

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 07 Nov 2026 02:50 PM IST
सार

पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं पर सैटेलाइट से निगरानी की जा रही है। जानिए Fire Watch प्लेटफॉर्म और GISAT-1A जैसी तकनीक कैसे खेतों में आग का पता लगाने में मदद करेंगी।

पराली की आग (फाइल फोटो)
पराली की आग (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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साल 1998 में भारत ने राजस्थान के पोखरण में पांच परमाणु परीक्षण किए थे। उस समय वैज्ञानिकों ने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में अमेरिकी जासूसी सैटेलाइट की नजरों से बचाकर परीक्षण की तैयारियां पूरी की थीं। करीब 28 साल बाद सैटेलाइट को चकमा देने की ऐसी ही तकनीक का इस्तेमाल पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने के मामलों में देखने को मिल रहा है। किसान अब सैटेलाइट की निगरानी के समय को समझकर ऐसे वक्त खेतों में आग लगा रहे हैं, जब उनकी गतिविधियां कैमरे की नजर में आने की संभावना कम होती है।

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस चुनौती से निपटने के लिए इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरनमेंट, सस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी (iFOREST) ने 'फायर वॉच' नाम से एक नया सैटेलाइट निगरानी प्लेटफॉर्म तैयार किया है। इसका मकसद पराली जलाने की घटनाओं को ज्यादा सटीक तरीके से पकड़ना और यह पता लगाना है कि खेतों में आग कब, कहां और कितने बड़े क्षेत्र में लगाई जा रही है।

आईफॉरेस्ट के सीईओ डॉ. चंद्र भूषण के मुताबिक, अभी पराली जलाने की निगरानी मुख्य रूप से ऐसे सैटेलाइट के आंकड़ों पर निर्भर है, जो दिन में कुछ निश्चित समय पर ही किसी इलाके के ऊपर से गुजरते हैं। इससे आग लगने की सभी घटनाओं का पता नहीं चल पाता।

पराली जलाने के मामले घटे, लेकिन निगरानी पर उठे सवाल
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पराली जलाने की दर्ज घटनाओं में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी गिरावट आई है। साल 2021 में करीब 80 हजार घटनाएं दर्ज की गई थीं, जो 2025 में घटकर लगभग 6 हजार रह गईं। इस गिरावट के पीछे सरकार की सख्ती, जुर्माना, कृषि मशीनों पर सब्सिडी और किसानों को जागरूक करने के अभियान की अहम भूमिका रही है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को अब यह भी समझ आ गया है कि सैटेलाइट किस समय उनके खेतों की तस्वीर लेते हैं। इसी वजह से कुछ किसान निगरानी के समय से अलग वक्त पर पराली जला रहे हैं।

दिन में कुछ ही बार खेतों पर नजर रखते हैं सैटेलाइट
अभी पराली जलाने की निगरानी के लिए मुख्य रूप से चार सैटेलाइट सिस्टम के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें नासा के टेरा और एक्वा सैटेलाइट पर लगे मॉडिस (MODIS) सेंसर और सुओमी एनपीपी तथा एनओएए-20 सैटेलाइट पर लगे वीआईआईआरएस (VIIRS) सेंसर शामिल हैं।

ये सैटेलाइट पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों की तस्वीरें लेते हैं और खेतों में आग लगने की घटनाओं का पता लगाने में मदद करते हैं। लेकिन इनकी एक सीमा है। ये किसी खास इलाके के ऊपर से दिन में कुछ निर्धारित समय पर ही गुजरते हैं। ऐसे में अगर कोई किसान इन समयों के बीच खेत में आग लगाता है, तो कई बार घटना रिकॉर्ड नहीं हो पाती।

क्या है फायर वॉच और कैसे करेगा काम?
इस समस्या को दूर करने के लिए आईफॉरेस्ट ने फायर वॉच प्लेटफॉर्म तैयार किया है। इसमें अलग-अलग सैटेलाइट से मिलने वाले आंकड़ों को एक साथ जोड़कर पराली जलाने की ज्यादा विस्तृत जानकारी जुटाई जाती है। इसमें तीन प्रमुख स्तरों पर निगरानी की व्यवस्था है।
  1. बार-बार तस्वीर लेकर आग का समय पता करना : मॉडिस और वीआईआईआरएस के आंकड़ों के साथ यूरोपीय मौसम सैटेलाइट मेटियोसैट-8 और मेटियोसैट-9 के डेटा का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें लगे सेवीरी (SEVIRI) उपकरण एक ही इलाके की तस्वीर करीब हर 15 मिनट में लेते हैं। इससे खेतों में आग लगने का समय और उसकी गतिविधियों में तेजी आने की जानकारी मिल सकती है।
  2. जले हुए खेतों का क्षेत्र पता करना : फायर वॉच में सेंटिनल-2 सैटेलाइट की तस्वीरों का भी इस्तेमाल होता है। आग लगने के मौसम से पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना करके पता लगाया जाता है कि कितनी कृषि भूमि जली है।
  3. आग की घटनाओं के साथ नुकसान का आकलन : केवल आग की घटनाएं गिनने से नुकसान का सही अंदाजा नहीं मिलता। दो जिलों में आग लगने की घटनाओं की संख्या बराबर हो सकती है, लेकिन जला हुआ खेतों का क्षेत्र अलग-अलग हो सकता है। इसलिए यह जानना भी जरूरी है कि वास्तव में कितनी जमीन प्रभावित हुई।

संसद ने भी सैटेलाइट निगरानी की कमी पर जताई चिंता
साल 2026 में संसद की एक स्थायी समिति ने भी पर्यावरण से जुड़ी घटनाओं की निगरानी के लिए सैटेलाइट व्यवस्था में सुधार की जरूरत बताई। समिति के मुताबिक, भारत अंतरिक्ष तकनीक में बड़ी उपलब्धियां हासिल कर चुका है, लेकिन जंगलों में आग और ऐसी दूसरी घटनाओं की निगरानी के लिए अब भी काफी हद तक विदेशी सैटेलाइट पर निर्भर है।

समिति ने सैटेलाइट की निगरानी में समय के अंतर को दूर करने और लगातार आग की घटनाओं पर नजर रखने में सक्षम भूस्थिर सैटेलाइट विकसित करने पर जोर दिया। भारत के पास भी इस दिशा में काम करने की तकनीक मौजूद है। ईओएस-05 (EOS-05), जिसे जीसैट-1ए (GISAT-1A) भी कहा जाता है, इसी दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

भारत का जीसैट-1ए बन सकता है निगरानी का मजबूत हथियार
जीसैट-1ए को इस तरह तैयार किया गया है कि यह भारत के अलग-अलग इलाकों की बार-बार तस्वीर ले सकता है। इसके जरिए चुनिंदा क्षेत्रों की तस्वीर हर पांच मिनट में और बादल न होने की स्थिति में पूरे भारतीय भूभाग की तस्वीर करीब हर 30 मिनट में ली जा सकती है।

इसकी तुलना अंतरिक्ष में लगे एक बड़े सीसीटीवी कैमरे से की जा सकती है, जो लगातार एक ही क्षेत्र पर नजर रख सके। इससे खेतों में आग लगाने की घटनाओं को पकड़ने में मदद मिल सकती है और सैटेलाइट की निगरानी के बीच मिलने वाला समय भी कम हो सकता है।

हालांकि, यह सैटेलाइट अभी कक्षा में परीक्षण के दौर से गुजर रहा है। इसे एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय रणनीतिक संपत्ति माना जाता है और इसके संचालन में रक्षा व राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलू भी शामिल हैं। इसलिए पर्यावरण से जुड़ी एजेंसियों को इसके सभी आंकड़े सीधे उपलब्ध होना अभी तय नहीं है।

आग बुझ जाए, लेकिन खेतों के निशान नहीं छिपेंगे
वैज्ञानिकों का मानना है कि पर्यावरण की निगरानी के लिए जीसैट-1ए के कुछ आंकड़े नागरिक एजेंसियों को भी उपलब्ध कराने पर विचार किया जाना चाहिए। इससे पराली जलाने और वायु प्रदूषण जैसी समस्याओं पर नजर रखना आसान हो सकता है।

हालांकि, आग की लपटें सैटेलाइट की नजर से बच भी जाएं, तब भी खेतों में जलने के निशान छिपाना आसान नहीं है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC), हैदराबाद भी जले हुए खेतों की पहचान के लिए नियमित रूप से सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण करता है। इसमें कार्टोसैट-3 जैसी उच्च क्षमता वाली तस्वीरों का इस्तेमाल किया जाता है।

आग की घटना के समय तस्वीर न भी मिले, तो बाद में खेत की सतह पर बने जले हुए निशानों से प्रभावित क्षेत्र का पता लगाया जा सकता है। इन आंकड़ों को वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के साथ भी साझा किया जाता है। इस तरह पराली जलाने की निगरानी अब केवल आग की लपटें पकड़ने तक सीमित नहीं रह गई है। सैटेलाइट तकनीक के जरिए आग लगने का समय, स्थान और जले हुए खेतों का क्षेत्र पता लगाने की कोशिश की जा रही है।
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