छत्तीसगढ़ में खरीफ धान की एमएसपी पर खरीद के लिए तैयारियां तेज हो गई हैं। प्रदेश सरकार का कहना है कि राज्य में 15 नवंबर से धान की खरीद शुरू कर दी जाएगी। इस साल 27 लाख 50 हजार से अधिक किसानों से धान खरीदने का लक्ष्य तय किया है। इसके अलावा प्रति एकड़ धान खरीद की सीमा 21 क्विंटल तय की गई है।
धान खरीदी प्रक्रिया में 4 बड़े बदलाव
इस बार धान खरीद की प्रक्रिया में चार बड़े बदलाव किए गए हैं। नए नियमों के मुताबिक, अगर आपके पास फार्मर आईडी है और बीते सीजन मे आपने खरीद के लिए पंजीकरण किया था, तो दोबारा पंजीयन कराने की जरूरत नहीं है। इसके साथ ही, सरकार ने खरीदी केंद्रों पर धान ले जाते समय अलग से 'ऋण पुस्तिका' दिखाने की अनिवार्यता भी खत्म कर दी है। इस छूट से खरीदी केंद्रों पर किसानों की परेशानी दूर होगी और उपज बेचना आसान हो जाएगा।
प्रशासन ने डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल करते हुए डिजिटल फसल सर्वे को भी शामिल किया है। इसके जरिए किसानों के खेतों में लगी फसल का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा, जिससे असल रकबे और पैदावार की सटीक जानकारी मिल सकेगी। इसके अलावा, गड़बड़ियों को रोकने और केवल पात्र किसानों को योजना का लाभ देने के लिए खरीदी केंद्रों पर किसानों की बायोमीट्रिक पहचान की व्यवस्था लागू की गई है।
किसानों की सुविधा के लिए खोले गए 360 नए खरीद केंद्र
प्रशासन के मुताबिक, राज्य में खरीदी केंद्रों पर संभावित भीड़ को नियंत्रित करने और किसानों को उनके घर के पास ही सुविधा देने के लिए 360 नए धान उपार्जन केंद्र (खरीदी केंद्र) बनाए गए हैं। सरकार का उद्देश्य पारदर्शी तरीके से सभी पंजीकृत किसानों से बिना किसी रुकावट के धान की खरीदी करना है।
नागौर में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए जई की बुवाई शुरू
एक तरफ जहां धान की खरीद शुरू होने वाली है, वहीं राजस्थान के नागौर जिले में रबी सीजन की शुरुआत होते ही किसानों ने अपने पशुओं के लिए हरे चारे की उपलब्धता बढ़ाने के लिए जई की बुवाई शुरू कर दी है। जई को पशुओं के लिए बेहद पौष्टिक और स्वादिष्ट हरा चारा माना जाता है। इसकी खेती से पशुपालक साल भर हरे चारे की व्यवस्था कर सकते हैं और बाजार से खरीदे जाने वाले महंगे पशु आहार का खर्च भी घटा सकते हैं।
नवंबर का पहला पखवाड़ा बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, नवंबर का शुरुआती समय जई की बुवाई के लिए पूरी तरह सही रहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सही समय पर बुवाई करने से बेहतर उत्पादन मिलता है। इसकी हरी पत्तियों में मौजूद पोषक तत्व पशुओं के स्वास्थ्य और दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने में काफी मददगार माने जाते हैं, खासकर दुधारू पशुओं के लिए। नागौर जिले में पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है, इसलिए सिंचित इलाकों में जई की खेती एक बेहतरीन विकल्प बन रही है।
उन्नत बीज का चुनाव और खेत की तैयारी
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, अच्छी पैदावार के लिए किसानों को प्रमाणित उन्नत किस्मों जैसे- ओएस-6, ओएस-7 और कैंट का चुनाव करना चाहिए। किस्मों का चयन क्षेत्र की जलवायु, सिंचाई की सुविधा और मिट्टी के हिसाब से किया जाना चाहिए। एक हेक्टेयर खेत के लिए लगभग 75 से 100 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है।
युवा किसान अर्जुन ने बताया कि बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह तैयारी करना बहुत जरूरी है। खेत की दो से तीन बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा और समतल बना लेना चाहिए ताकि सिंचाई का पानी बराबर फैले। अर्जुन के अनुसार, बुवाई कतारों में करनी चाहिए और दो कतारों के बीच 25 से 30 सेंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिए। इससे पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है और निराई-गुड़ाई में भी आसानी रहती है। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी होना बहुत जरूरी है।
सिंचाई और खरपतवार पर नियंत्रण
जई की फसल में अच्छी बढ़त के लिए समय पर सिंचाई करना आवश्यक है। खेत में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए, लेकिन अत्यधिक पानी भरने से भी बचना चाहिए ताकि फसल खराब न हो। शुरुआत में ही खरपतवार (कचरा) निकाल देने से पौधों को पूरा पोषण मिलता है, जिससे वे तेजी से बढ़ते हैं और हरे चारे की पैदावार ज्यादा होती है। चारे का उत्पादन बढ़ने से पशुपालन व्यवसाय को अधिक लाभकारी बनाने में सीधे तौर पर मदद मिलती है।