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ऑयल पाम मिशन: सिर्फ पौधरोपण नहीं, तेल उत्पादन और किसानों की कमाई भी बनेगी सफलता का पैमाना

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 07 Nov 2026 01:06 PM IST
सार

भारत में ऑयल पाम की खेती का रकबा बढ़ रहा है, लेकिन क्या पौधे जीवित हैं और किसानों को मुनाफा मिल रहा है? जानिए ऑयल पाम मिशन की चुनौतियां और खेती की सफलता के जरूरी पैमाने।

पाम ऑयल
पाम ऑयल - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारत में ऑयल पाम (तेल देने वाले पाम के पेड़) की खेती का विस्तार तेजी से हो रहा है। हालांकि, इस खेती की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने हेक्टेयर में पौधे लगाए गए। असली सफलता तब होगी, जब पौधे जीवित रहें, उनकी सही देखभाल हो, वे फल देने लगें और किसानों को उनसे नियमित आमदनी मिले। विशेषज्ञों का मानना है कि ऑयल पाम मिशन में अब केवल खेती का रकबा बढ़ाने के बजाय पौधों की स्थिति, उत्पादन और किसानों की कमाई पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

बिजनेस लाइन की 30 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में अब तक 55,614 हेक्टेयर क्षेत्र में ऑयल पाम की खेती की गई है। सरकार ने इसके लिए 1.19 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य रखा था। इस तरह लक्ष्य का करीब 47 फीसदी हासिल हुआ है। इसमें पूर्वोत्तर के छह राज्यों का योगदान 23,347 हेक्टेयर और देश के अन्य नौ राज्यों का योगदान 32,267 हेक्टेयर रहा।

कृषि मंत्रालय ने अगस्त 2026 में संसद को बताया था कि 2021-22 से 2025-26 के बीच कुल 2.73 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ऑयल पाम की खेती की गई। जबकि इस पांच साल की अवधि के लिए 6.5 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य रखा गया था।

ये आंकड़े खेती के विस्तार को तो दिखाते हैं, लेकिन एक अहम सवाल भी खड़ा करते हैं। क्या केवल पौधे लगा देने से मिशन सफल माना जा सकता है? या फिर यह देखना भी जरूरी है कि कितने पौधे जीवित हैं, कितने खेतों में उनकी नियमित देखभाल हो रही है और कितने बागान वास्तव में उत्पादन दे रहे हैं?

पूर्वोत्तर में बेहतर प्रगति, दक्षिण भारत के दो राज्यों का बड़ा योगदान
ऑयल पाम की खेती के विस्तार में पूर्वोत्तर के छह राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। यहां 36,319 हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले करीब 64 फीसदी क्षेत्र में खेती की गई है। वहीं, देश के बाकी नौ राज्यों में 82,959 हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले 32,267 हेक्टेयर में ही खेती हो पाई है। यह लक्ष्य का करीब 39 फीसदी है।

इन नौ राज्यों में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की हिस्सेदारी करीब 85 फीसदी है। इससे साफ है कि अन्य राज्यों में ऑयल पाम की खेती को बढ़ावा देने के लिए अभी काफी काम करने की जरूरत है। यह भी समझना होगा कि कुछ राज्यों में किसान इस फसल को अपनाने में पीछे क्यों हैं।

तमिलनाडु में उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी खेती
तमिलनाडु के कई इलाकों में ऑयल पाम की खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं। इसके बावजूद यहां इसका विस्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाया है। खेती के लिए जमीन और मौसम अनुकूल होना ही काफी नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि किसान इस फसल को अपनाने के लिए तैयार हैं या नहीं। इसके अलावा सिंचाई, जमीन की स्थिति, पौधों की उपलब्धता, तकनीकी मदद और प्रोसेसिंग यूनिट की दूरी जैसे पहलू भी अहम हैं।

ऑयल पाम लंबे समय तक उत्पादन देने वाली फसल है, लेकिन इसे लगाकर छोड़ नहीं सकते। इसके लिए नियमित पानी, संतुलित खाद, समय पर देखभाल और कीट-रोगों से बचाव जरूरी है। अगर पौधों को पर्याप्त पानी और देखभाल नहीं मिलती है तो फलों के गुच्छों का उत्पादन काफी कम हो सकता है। इसलिए केवल पौधे लगाने के आंकड़ों को खेती की सफलता नहीं माना जा सकता।

मिजोरम का अनुभव बताता है, पौधे लगाना ही काफी नहीं
मिजोरम में ऑयल पाम की खेती का पुराना अनुभव इस मामले में महत्वपूर्ण है। मार्च 2023 में मिजोरम के राज्यपाल कार्यालय की एक समीक्षा में बताया गया था कि पहले करीब 26,730 हेक्टेयर क्षेत्र में ऑयल पाम की खेती की गई थी। लेकिन उस समय केवल लगभग 3,398 हेक्टेयर क्षेत्र में ही सक्रिय रूप से इसकी खेती हो रही थी। इसके पीछे पहाड़ी जमीन, बारिश पर निर्भर खेती, पौधों की देखभाल में मुश्किल और खेतों से फल निकालकर प्रोसेसिंग सेंटर तक पहुंचाने की समस्या जैसे कारण सामने आए।

इससे साफ है कि ऑयल पाम की खेती के आंकड़ों में चार बातों का अलग-अलग हिसाब रखना जरूरी है। पहला, अब तक कितने हेक्टेयर में पौधे लगाए गए। दूसरा, कितने क्षेत्र में पौधों की देखभाल हो रही है। तीसरा, कितने पौधे फल देने की स्थिति में पहुंच चुके हैं और चौथा, कितने क्षेत्र से बाजार में बेचने लायक उत्पादन मिल रहा है। पूर्वोत्तर में ऑयल पाम की खेती की काफी संभावनाएं हैं, लेकिन इसके लिए बेहतर सड़क, सिंचाई, तकनीकी मदद और फल खरीदने की व्यवस्था भी जरूरी है।

खेती के लिए लक्ष्य तय करने से पहले इन बातों पर दें ध्यान
विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी जिले या ब्लॉक में ऑयल पाम की खेती का लक्ष्य तय करते समय कई बातों का ध्यान रखना चाहिए। इनमें भरोसेमंद सिंचाई व्यवस्था, उपयुक्त जमीन, किसानों की तैयारी, अच्छी गुणवत्ता के पौधे, कृषि विशेषज्ञों की उपलब्धता, कर्ज की सुविधा और फल खरीदने व प्रोसेसिंग की व्यवस्था शामिल हैं। जहां ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, वहां जल्दबाजी में बड़े लक्ष्य तय करने के बजाय धीरे-धीरे खेती का विस्तार करना बेहतर होगा।

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि योजना के तहत जारी की गई धनराशि में से रिपोर्ट तैयार होने के समय 40 फीसदी से भी कम खर्च हुई थी। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि लगाए गए पौधों की देखभाल हुई या नहीं, सिंचाई की व्यवस्था वास्तव में काम कर रही है या नहीं और किसानों को समय पर तकनीकी सहायता मिल रही है या नहीं।

सरकार की राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-ऑयल पाम योजना के तहत पौधों की देखभाल, ड्रिप सिंचाई, अच्छी गुणवत्ता के पौधे, नर्सरी, पुराने बागानों को दोबारा लगाने और प्रोसेसिंग से जुड़ी सुविधाओं के लिए सहायता का प्रावधान है। लेकिन योजना की निगरानी केवल खेती के रकबे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

इसके लिए कुछ जरूरी पैमाने तय किए जाने चाहिए, जैसे कितने पौधे जीवित हैं, कितने खेतों में सिंचाई की सुविधा है, पौधों की नियमित देखभाल हो रही है या नहीं, कितने पौधे फल देने लगे हैं और प्रति हेक्टेयर कितना उत्पादन मिल रहा है। साथ ही यह भी देखना होगा कि किसानों को उनकी उपज का उचित दाम मिल रहा है या नहीं।

किसानों का भरोसा जीतना सबसे जरूरी
ऑयल पाम की खेती में किसानों का भरोसा सबसे अहम है। यह ऐसी फसल है, जिसमें लंबे समय तक निवेश और देखभाल करनी पड़ती है। आमतौर पर पौधे लगाने के तीन से चार साल बाद फल मिलने शुरू होते हैं। इसलिए शुरुआती वर्षों में पौधों की देखभाल करना बहुत जरूरी है।

किसानों के सामने पानी, खाद, तकनीकी सलाह, फलों की खरीद, कीमत और कमाई को लेकर कई सवाल रहते हैं। केवल सरकारी आश्वासन या खेती का लक्ष्य तय करने से इनका समाधान नहीं होगा। इसके लिए खेतों में मॉडल प्लॉट तैयार करने, किसानों को खेती का सही तरीका दिखाने, नियमित निरीक्षण करने और उपज की खरीद व उचित कीमत सुनिश्चित करने की जरूरत है।

इसके लिए हर खेत का अलग रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है। इसमें पौधों के जीवित रहने, सिंचाई, देखभाल और उत्पादन की जानकारी दर्ज होनी चाहिए। इससे सरकार और संबंधित संस्थाएं यह समझ सकेंगी कि किस इलाके में खेती अच्छी चल रही है और कहां सुधार की जरूरत है।

किसानों को यह भी स्पष्ट बताया जाना चाहिए कि पौधों से उत्पादन कब शुरू होगा, उन्हें किस तरह की सरकारी मदद मिलेगी और उपज बेचने की क्या व्यवस्था होगी। इससे किसानों का भरोसा बढ़ेगा और वे लंबे समय तक इस खेती से जुड़े रहेंगे।

सिर्फ रकबा नहीं, किसानों की आमदनी भी देखनी होगी
भारत के लिए खाद्य तेलों का घरेलू उत्पादन बढ़ाना और आयात पर निर्भरता कम करना जरूरी है। इस लिहाज से ऑयल पाम की खेती का विस्तार एक अच्छा अवसर है। पूर्वोत्तर के राज्यों के साथ देश के दूसरे हिस्सों में भी इसकी संभावनाएं हैं।

हालांकि, अब इस मिशन की सफलता मापने का तरीका बदलने की जरूरत है। केवल यह नहीं गिनना चाहिए कि कितने हेक्टेयर में पौधे लगाए गए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि कितने पौधे जीवित हैं, कितने फल दे रहे हैं, कितना ताजा फल गुच्छा (FFB) उत्पादन हो रहा है और किसानों को कितनी नियमित आमदनी मिल रही है।

ऑयल पाम मिशन की असली सफलता इस बात से तय होगी कि खेती का रकबा कितनी तेजी से बढ़ा, इससे ज्यादा यह देखना जरूरी है कि लगाए गए पौधों को कितनी अच्छी तरह तैयार किया गया और उनसे किसानों को लंबे समय तक कितना फायदा मिला।
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