सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के अनुसार, रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में की गई बढ़ोतरी देश में सरसों के उत्पादन को मजबूत करने का एक बेहतरीन मौका है। संस्था के अध्यक्ष अंग्शु मल्लिक ने कहा है कि सरकार की आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने 2027-28 मार्केटिंग सीजन के लिए सभी प्रमुख रबी फसलों की एमएसपी बढ़ाने को मंजूरी दे दी है।
एमएसपी में कितनी हुई बढ़ोतरी?
एसईए के अध्यक्ष के अनुसार, सरकार ने सरसों की एमएसपी में 413 रुपये प्रति क्विंटल का इजाफा किया है, जिससे यह अब 6,613 रुपये हो गई है। इसी तरह, कुसुम (safflower) की एमएसपी 675 रुपये बढ़ाकर 7,215 रुपये प्रति क्विंटल कर दी गई है। बुधवार को संस्था के सदस्यों को लिखे अपने मासिक पत्र में मल्लिक ने कहा कि अच्छी कीमत मिलने के भरोसे से किसान सरसों की खेती का दायरा बढ़ाने और बेहतर कृषि तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित होंगे।
हालांकि, एसईए के अनुसार एमएसपी का असली फायदा तभी मिलेगा जब सरकारी खरीद की व्यवस्था अच्छी हो, मंडियों तक किसानों की पहुंच आसान हो और किसानों को उनकी फसल के सही दाम मिलें। संस्था ने कहा है कि वह देश में तिलहन की पैदावार और किसानों की आय बढ़ाने वाले कदमों का समर्थन करती रहेगी।
खरीफ तिलहन का रकबा और फसलों की स्थिति
एसईए के आंकड़ों के अनुसार, 2 अक्टूबर तक देश में खरीफ तिलहन का कुल रकबा (बुवाई क्षेत्र) 196.66 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है। पिछले साल यह आंकड़ा 195.55 लाख हेक्टेयर था, जिसका मतलब है कि कुल रकबे में मामूली बढ़ोतरी हुई है।
अगर अलग-अलग फसलों की बात करें तो स्थिति मिली-जुली है। सोयाबीन का रकबा थोड़ा घटकर 123.16 लाख हेक्टेयर रह गया है। मूंगफली का रकबा लगभग 51 लाख हेक्टेयर पर स्थिर बना हुआ है। तिल का रकबा बढ़कर 11.23 लाख हेक्टेयर और सूरजमुखी का 1.29 लाख हेक्टेयर हो गया है। अरंडी का रकबा घटकर 8.97 लाख हेक्टेयर रह गया है।
संस्था के अनुसार, गुजरात में कुल तिलहन का रकबा पिछले साल के 31.95 लाख हेक्टेयर से गिरकर 30.28 लाख हेक्टेयर रह गया है, जिसमें मूंगफली की बुवाई का क्षेत्र घटकर 20.70 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है।
व्यापार घाटा और आयात पर निर्भरता
तिलहन व्यापार के संबंध में एसईए ने बताया कि अप्रैल से जुलाई (2026-27) के बीच भारत ने 3,324.05 करोड़ रुपये मूल्य का 2.64 लाख टन तिलहन निर्यात किया। वहीं, इसी दौरान 3,733.55 करोड़ रुपये का 6.75 लाख टन तिलहन आयात किया गया। इस वजह से देश को व्यापार में 4.11 लाख टन और 409.50 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है।
संस्था के अनुसार, मूंगफली और तिल के कारण देश के निर्यात को सहारा मिला है, जबकि आयात के मामले में सोयाबीन सबसे आगे रहा। अध्यक्ष मल्लिक ने कहा कि आयात पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू पैदावार, बीज की गुणवत्ता और किसानों की कमाई में सुधार करने की बहुत जरूरत है। उन्होंने वैश्विक स्तर पर जैव ईंधन (बायोफ्यूल) की बदलती नीतियों और कीमतों में उतार-चढ़ाव को देखते हुए घरेलू खाद्य तेल उद्योग को और अधिक सुरक्षित तथा मजबूत बनाने पर जोर दिया है।