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खाद्य तेल का आयात घटाने पर जोर : सरसों की MSP बढ़ने से किसानों को मिल सकती है राहत, SEA ने बताया बड़ा मौका

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 22 Oct 2026 09:18 AM IST
सार

  • सरसों के MSP में बढ़ोतरी: रबी विपणन सीजन 2027-28 के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 413 रुपये बढ़ाकर 6,613 रुपये प्रति क्विंटल किया गया।

  • कुसुम का MSP बढ़ा: कुसुम का समर्थन मूल्य 675 रुपये बढ़ाकर 7,215 रुपये प्रति क्विंटल किया गया।

  • तिलहन का रकबा बढ़ा: 2 अक्टूबर 2026 तक खरीफ तिलहन का कुल रकबा 196.66 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले साल से थोड़ा अधिक है।

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सरसों से पाएं ज्यादा मुनाफा - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी से देश में सरसों की खेती और उत्पादन बढ़ाने का मौका मिल सकता है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के अध्यक्ष अंग्शु मलिक ने कहा कि सरसों का बेहतर दाम मिलने से किसान इसकी खेती का रकबा बढ़ाने और उत्पादन सुधारने के लिए निवेश करने को प्रोत्साहित हो सकते हैं।

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार की आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने रबी विपणन सीजन 2027-28 के लिए सभी अधिसूचित रबी फसलों के MSP में बढ़ोतरी को मंजूरी दी है। इसके तहत सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 413 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाकर 6,613 रुपये कर दिया गया है। वहीं, कुसुम का MSP 675 रुपये बढ़ाकर 7,215 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है।

SEA के अध्यक्ष ने बुधवार को एसोसिएशन के सदस्यों को लिखे मासिक पत्र में कहा कि सरसों का बेहतर मूल्य मिलने से किसान इसकी खेती जारी रखने या रकबा बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं। इससे खेती के बेहतर तरीकों को अपनाने में भी मदद मिल सकती है।

हालांकि, उन्होंने कहा कि MSP बढ़ाने का पूरा फायदा किसानों तक पहुंचाने के लिए सरकारी खरीद की व्यवस्था, बाजार तक पहुंच और किसानों को वास्तव में मिलने वाली कीमत भी महत्वपूर्ण हैं। SEA घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने, तेल प्रसंस्करण उद्योग को मजबूत करने और किसानों के लिए तिलहन की खेती को अधिक लाभकारी बनाने की दिशा में काम करता रहेगा।

खरीफ सीजन में तिलहन का रकबा थोड़ा बढ़ा
SEA के मुताबिक, देश में 2 अक्टूबर 2026 तक खरीफ तिलहन फसलों का कुल रकबा बढ़कर 196.66 लाख हेक्टेयर हो गया। पिछले साल इसी अवधि में यह 195.55 लाख हेक्टेयर था। हालांकि, अलग-अलग फसलों के रकबे में मिला-जुला रुझान देखने को मिला। सोयाबीन की बुवाई का रकबा थोड़ा घटकर 123.16 लाख हेक्टेयर रह गया। वहीं, मूंगफली का रकबा करीब 51 लाख हेक्टेयर पर लगभग स्थिर रहा। दूसरी ओर, तिल का रकबा बढ़कर 11.23 लाख हेक्टेयर हो गया। सूरजमुखी की बुवाई भी बढ़कर 1.29 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई। हालांकि, अरंडी का रकबा घटकर 8.97 लाख हेक्टेयर रह गया।

गुजरात में मूंगफली का रकबा घटा
देश के प्रमुख तिलहन उत्पादक राज्यों में शामिल गुजरात में भी तिलहन की बुवाई का रकबा कम हुआ है। SEA के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में कुल तिलहन रकबा पिछले साल के 31.95 लाख हेक्टेयर से घटकर 30.28 लाख हेक्टेयर रह गया। गुजरात में मूंगफली का रकबा भी घटकर 20.70 लाख हेक्टेयर रह गया। मूंगफली देश में खाद्य तेल उत्पादन के लिए एक महत्वपूर्ण फसल है। ऐसे में इसके रकबे में कमी का असर घरेलू तिलहन उत्पादन पर पड़ सकता है।

तिलहन के निर्यात से ज्यादा हुआ आयात
SEA के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 में अप्रैल से जुलाई के दौरान भारत ने 3,324.05 करोड़ रुपये मूल्य के 2.64 लाख टन तिलहन का निर्यात किया। वहीं, इस अवधि में 3,733.55 करोड़ रुपये मूल्य के 6.75 लाख टन तिलहन का आयात किया गया।

इस तरह मात्रा के हिसाब से तिलहन का आयात निर्यात से 4.11 लाख टन अधिक रहा। वहीं, मूल्य के आधार पर आयात और निर्यात के बीच 409.50 करोड़ रुपये का अंतर रहा। निर्यात में मूंगफली और तिल का योगदान रहा, जबकि आयात में सोयाबीन प्रमुख रहा। ये आंकड़े बताते हैं कि घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को तिलहन उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए बेहतर गुणवत्ता वाले बीज, खेती की उत्पादकता में सुधार, किसानों की लागत और कमाई के बीच बेहतर संतुलन तथा प्रसंस्करण और विपणन व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।

खाद्य तेल क्षेत्र के सामने कई चुनौतियां
SEA के अध्यक्ष अंग्शु मलिक ने कहा कि वैश्विक स्तर पर जैव ईंधन से जुड़ी नीतियों, बदलते व्यापार मार्गों, कीमतों में उतार-चढ़ाव और खाद्य तेल की बढ़ती मांग का असर इस क्षेत्र पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने, आयात के स्रोतों में विविधता लाने और देश के भीतर ही तिलहन के प्रसंस्करण और उनसे बनने वाले उत्पादों का मूल्य बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।

उनके मुताबिक, किसानों को बेहतर कीमत मिलने और घरेलू उत्पादन बढ़ने से खाद्य तेल क्षेत्र को अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाया जा सकता है। इससे आयात पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।
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