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Cotton Up To 30 Of Cotton Acreage Uses Non Approved Htbt Seeds A Market Worth Rs 880 Crore
Cotton: कपास के 30% तक रकबे में गैर-अनुमोदित HTBt बीजों का इस्तेमाल, 880 करोड़ का बाजार
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Thu, 22 Oct 2026 09:30 AM IST
सार
65 से 72 लाख एकड़ में खेती: अध्ययन के अनुसार, खरीफ 2025 में देश के कुल कपास क्षेत्र के 24 से 30 फीसदी हिस्से में गैर-अनुमोदित HTBt बीजों का इस्तेमाल हुआ।
880 करोड़ रुपये तक का बाजार: देश में गैर-अनुमोदित HTBt कपास बीजों के अनौपचारिक बाजार का अनुमानित मूल्य 820 से 880 करोड़ रुपये है।
खरपतवार नियंत्रण में खर्च का अंतर: ग्लाइफोसेट से खरपतवार नियंत्रण पर प्रति एकड़ 750 से 850 रुपये खर्च होते हैं, जबकि मजदूरों से यह काम कराने में 12,000 से 15,000 रुपये लग सकते हैं।
देश में कपास की खेती करने वाले किसान मजदूरों की कमी और खरपतवार नियंत्रण पर बढ़ते खर्च से बचने के लिए गैर-अनुमोदित एचटीबीटी (HTBt) कपास बीजों का इस्तेमाल तेजी से कर रहे हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, खरीफ 2025 के दौरान देश में करीब 65 से 72 लाख एकड़ में इन बीजों से कपास की खेती की गई। यह देश के कुल कपास क्षेत्र का लगभग 24 से 30 फीसदी है। अध्ययन में इस अनौपचारिक बीज बाजार का मूल्य 820 से 880 करोड़ रुपये आंका गया है।
साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर (SABC) ने फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया और नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NSAI) के सहयोग से यह अध्ययन किया। इसके लिए महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के कपास उत्पादक 16 जिलों में खेतों का सर्वे और संबंधित लोगों से बातचीत की गई। अध्ययन में पाया गया कि मजदूरों की कमी, खेती की बढ़ती लागत और खरपतवार नियंत्रण की जरूरत के कारण किसान इन बीजों की ओर बढ़ रहे हैं।
मजदूरों की तुलना में खरपतवार नियंत्रण सस्ता
अध्ययन के मुताबिक, एचटीबीटी कपास में इस्तेमाल होने वाली खरपतवारनाशक तकनीक के कारण ग्लाइफोसेट की खपत भी बढ़ी है। इस दवा से खरपतवार नियंत्रित करने पर किसानों को प्रति एकड़ करीब 750 से 850 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, जबकि मजदूरों से खरपतवार हटवाने की लागत 12,000 से 15,000 रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच सकती है। लागत का यह अंतर किसानों को इस तकनीक की ओर आकर्षित कर रहा है।
अध्ययन में बताया गया कि ग्लाइफोसेट की खपत 2024-25 में 27,271 किलोलीटर से बढ़कर 2025-26 में 35,642 किलोलीटर हो गई। यह करीब 26 फीसदी की वृद्धि है। आयात के आंकड़ों से भी इसकी बढ़ती मांग का संकेत मिला। रिपोर्ट के अनुसार, इस खरपतवारनाशक की आपूर्ति अनौपचारिक नेटवर्क के जरिये बड़े ड्रमों में भी की जा रही है।
महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा खेती
अध्ययन के अनुसार, महाराष्ट्र गैर-अनुमोदित एचटीबीटी कपास की खेती का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। राज्य में इसके इस्तेमाल का अनुमान 58 फीसदी है, जबकि यवतमाल जिले में यह आंकड़ा 76 फीसदी तक पहुंच गया।
तेलंगाना में ऐसे बीजों का इस्तेमाल 66 फीसदी और आंध्र प्रदेश में 49 फीसदी आंका गया। तेलंगाना के महबूबाबाद में यह दर 82 फीसदी और आंध्र प्रदेश के कुरनूल में 75 फीसदी तक रही। वहीं, राजस्थान में इसका इस्तेमाल बहुत कम मिला। अध्ययन के मुताबिक, वहां फसल की अवधि कम होने और खरपतवार की समस्या अपेक्षाकृत नियंत्रित रहने के कारण किसान इस तकनीक की ओर कम आकर्षित हुए।
बीजों में मिले कई जीएम जीन
अध्ययन के दौरान जांचे गए 227 नमूनों में से 223 यानी 98.2 फीसदी में कम से कम एक आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) गुण पाया गया। इनमें बीटी कपास की बोलगार्ड-II तकनीक से जुड़े Cry1Ac और Cry2Ab जीन क्रमशः 95.1 और 84.1 फीसदी नमूनों में मिले। वहीं, खरपतवारनाशक सहन करने से जुड़ा गैर-अनुमोदित CP4EPSPS जीन 72.7 फीसदी नमूनों में पाया गया। कीटों से बचाव से संबंधित Vip3A जीन 53.7 फीसदी नमूनों में मिला।
अध्ययन में चार जीन के 14 तरह के संयोजन पाए गए। चारों जीन वाले संयोजन 41.9 फीसदी नमूनों में मिले, जबकि तीन जीन वाले संयोजन 30.4 फीसदी और दो जीन वाले संयोजन 21.1 फीसदी नमूनों में पाए गए। इससे कपास की खेती में कई गुणों वाले संकर बीजों के बढ़ते इस्तेमाल का संकेत मिलता है।
मंजूर बीजों की बिक्री पर भी असर
रिपोर्ट के अनुसार, गैर-अनुमोदित एचटीबीटी कपास के प्रसार का असर मंजूर बीजों के बाजार पर भी पड़ रहा है। वर्ष 2022 से 2026 के बीच Cry1Ac और Cry2Ab कीट-प्रतिरोधी विशेषताओं वाले बोलगार्ड-II (BG-II) बीजों की बिक्री देशभर में 22.3 फीसदी घट गई।
बीज की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर चिंता
अध्ययन में गैर-अनुमोदित बीजों के इस्तेमाल से बीज की गुणवत्ता, जैव सुरक्षा और खरपतवारनाशक व कीट नियंत्रण तकनीकों के प्रति प्रतिरोध बढ़ने की आशंका जताई गई है। ऐसे बीज नियमन वाले बाजार से बाहर बेचे जाते हैं। इसलिए अगर फसल उम्मीद के मुताबिक नहीं होती, तो किसानों के पास शिकायत या मुआवजा पाने के विकल्प सीमित हो सकते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया कि नई कपास तकनीकों को मंजूरी देने में देरी भी गैर-अनुमोदित बीजों के प्रसार की एक वजह हो सकती है। अध्ययन ने सरकार से मंजूरी की प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध बनाने की सिफारिश की है। साथ ही, किसानों को वैध माध्यम से प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने के लिए बोलगार्ड-II-आरआरएफ (BG-II-RRF) कपास को जल्द मंजूरी देने की मांग की गई है।
SABC के संस्थापक निदेशक भागीरथ चौधरी ने कहा कि इन निष्कर्षों से स्पष्ट है कि देश में एक पारदर्शी नीति, राष्ट्रीय रणनीति और मजबूत नियामक व्यवस्था की जरूरत है। ऐसी व्यवस्था में बीजों की जैव सुरक्षा, खेती में प्रदर्शन और खरपतवार व कीटों के प्रति प्रतिरोध के प्रबंधन की जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसानों तक केवल अनुमोदित जीएम कपास तकनीक ही समय पर और नियमन के तहत पहुंचनी चाहिए।
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