किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम दिलाने और गांवों में सहकारी संस्थाओं को मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार नए मॉडल तलाशेगी। इसके तहत विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण, गोदामों के आधार पर किसानों को कर्ज देने और कृषि उपज के विपणन की वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर काम किया जाएगा।
सरकार इन मॉडलों को पहले कुछ जिलों में पायलट परियोजना के तौर पर लागू करने की संभावनाएं भी तलाशेगी। हालांकि, इनका उद्देश्य न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था को बदलना नहीं, बल्कि किसानों के लिए अतिरिक्त विकल्प तैयार करना है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में 8 और 9 अक्तूबर को आयोजित सहकारिता मंत्रालय की दो दिवसीय नौवीं राष्ट्रीय समीक्षा कार्यशाला में ये मुद्दे प्रमुखता से उठे। कार्यशाला का विषय ‘सहकार से समृद्धि- आगे की राह: सहकारिता में बदलाव के जरिए प्रभाव का विस्तार’ था। इसमें विभिन्न राज्यों के अधिकारियों और सहकारी संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने सहकारी क्षेत्र को मजबूत बनाने के उपायों पर चर्चा की।
सहकारिता मंत्रालय के सचिव डॉ. आशीष कुमार भूटानी ने राज्यों से कहा कि वे कार्यशाला में सामने आए सुझावों को लागू करने के लिए प्राथमिकता के आधार पर कार्ययोजना बनाएं। इसमें जिम्मेदार अधिकारियों, समयसीमा और नियमित निगरानी की व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए।
किसानों को बाजार से जोड़ेंगी सहकारी संस्थाएं
कार्यशाला में राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (एनसीईएल), राष्ट्रीय सहकारी ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (एनसीओएल) और भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड (बीबीएसएसएल) के कामकाज पर भी चर्चा हुई। इन संस्थाओं के माध्यम से किसानों और सहकारी समितियों को कृषि उपज एकत्र करने, बड़े बाजारों तक पहुंच बनाने और बेहतर दाम हासिल करने के अवसर मिल सकते हैं।
डॉ. भूटानी ने राज्यों से इन संस्थाओं के साथ मिलकर काम करने और सफल मॉडलों को अपनाने की अपील की। उन्होंने प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स) को खाद कारोबार सहित अन्य गतिविधियों से जोड़ने पर भी जोर दिया, ताकि उनकी आमदनी बढ़े और वे किसानों को ज्यादा सेवाएं दे सकें।
दिसंबर तक पैक्स का कंप्यूटरीकरण पूरा करने का लक्ष्य
कार्यशाला में पैक्स के कंप्यूटरीकरण की प्रगति की समीक्षा की गई। डॉ. भूटानी ने निर्देश दिए कि इसके पहले चरण के सभी लंबित काम दिसंबर 2026 तक पूरे किए जाएं। उन्होंने वित्त वर्ष 2024-25 और 2025-26 के ऑडिट अक्तूबर 2026 तक पूरा करने पर भी जोर दिया।
पैक्स को कंप्यूटरीकृत करने से उनके कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाने, रिकॉर्ड व्यवस्थित रखने और किसानों को सेवाएं देने में मदद मिल सकती है। मंत्रालय ने योजना के मार्च 2027 में समाप्त होने से पहले बचे हुए काम पूरे कराने के लिए इसे आगे बढ़ाने का प्रस्ताव भी मांगा है।
सहकारी बैंकों में साइबर सुरक्षा पर जोर
सहकारी बैंकों को आधुनिक तकनीक से लैस करने की जरूरत भी उठाई गई। डॉ. भूटानी ने कहा कि साइबर धोखाधड़ी की घटनाओं को देखते हुए बैंकों को सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करनी होगी। इसके साथ ही इंटरनेट बैंकिंग और मोबाइल बैंकिंग जैसी सुविधाओं का विस्तार करना जरूरी है।
नाबार्ड की ओर से एक समान और मजबूत कोर बैंकिंग सॉल्यूशन (सीबीएस) प्लेटफॉर्म विकसित करने की पहल पर भी चर्चा हुई। आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था से सहकारी बैंकों को बेहतर सेवाएं देने और खासकर युवा ग्राहकों को आकर्षित करने में मदद मिल सकती है।
दो-तीन साल में करीब 95 हजार नई पैक्स बनाने का लक्ष्य
डॉ. भूटानी ने राज्यों से नई प्राथमिक कृषि ऋण समितियां बनाने और मौजूदा समितियों की सदस्यता बढ़ाने के प्रयास तेज करने को कहा। अगले दो से तीन वर्षों में करीब 95 हजार ऐसी संस्थाएं स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।
उन्होंने कहा कि पैक्स का मजबूत नेटवर्क जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (डीसीसीबी) को व्यवहार्य बनाने और ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी ऋण व्यवस्था का विस्तार करने के लिए जरूरी है। राज्यों से मौजूदा समितियों के पुनर्गठन और जरूरत के अनुसार नई समितियां बनाने पर भी जोर दिया गया।
गांवों में दूध संग्रह व्यवस्था को सहकारिता से जोड़ने की सलाह
कार्यशाला में डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियों के विस्तार पर भी चर्चा हुई। डॉ. भूटानी ने कहा कि गांवों में दूध एकत्र करने वाली अनौपचारिक व्यवस्थाओं को औपचारिक सहकारी संस्थाओं से जोड़ने की जरूरत है। इससे दूध उत्पादकों को संगठित व्यवस्था का लाभ मिल सकता है।
इसके अलावा, सहकारी क्षेत्र में अनाज भंडारण योजना के तहत गोदामों के निर्माण में तेजी लाने की जरूरत बताई गई। राज्यों से गोदामों के लिए जगह तय करने, ऋण मंजूरी लेने और निर्माण कार्य आगे बढ़ाने को कहा गया।
राज्यों को स्थानीय जरूरत के हिसाब से योजना बनाने की सलाह
डॉ. भूटानी ने कहा कि देश के सभी राज्यों में सहकारी संस्थाओं के विकास का एक ही मॉडल लागू नहीं किया जा सकता। हर राज्य की जरूरतें, परिस्थितियां और चुनौतियां अलग हैं। इसलिए सफल राज्य और जिला स्तर के प्रयोगों का दस्तावेजीकरण कर उन्हें दूसरी जगहों पर भी अपनाने की संभावनाएं तलाशनी चाहिए।
कार्यशाला में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, गुजरात, बिहार और पुडुचेरी के अनुभवों पर चर्चा हुई। मंत्रालय इन सफल प्रयोगों की जानकारी राज्यों के साथ साझा करेगा, ताकि वे अपनी जरूरत के अनुसार उन्हें लागू कर सकें।
मंत्रालय अगले दो से तीन महीनों में किसानों को बेहतर दाम दिलाने और सहकारी संस्थाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने वाले वैकल्पिक मॉडलों पर राज्यों के साथ चर्चा करेगा। इसके बाद चुनिंदा जिलों में पायलट परियोजनाएं शुरू करने की संभावना तलाशी जाएगी। कार्यशाला की अगली बैठक जनवरी 2027 में तमिलनाडु के महाबलीपुरम में प्रस्तावित है।
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