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जम्मू-कश्मीर में मिलेट्स को बढ़ावा : एलजी बोले- यही है भविष्य की खेती, छोटे किसानों के लिए बड़ी उम्मीद

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Mon, 21 Sep 2026 04:29 PM IST
सार

  • जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने SKUAST जम्मू में मिलेट्स पर राष्ट्रीय संवाद का उद्घाटन किया।
  • उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के 80% से ज्यादा किसान छोटे और सीमांत हैं, ऐसे में मिलेट्स उनके लिए अहम हो सकते हैं।
  • मिलेट्स को दूसरी कई फसलों की तुलना में कम पानी और कम इनपुट की जरूरत होती है।
  • बाजरा, रागी, ज्वार, कोदो, कुटकी, कंगनी और सांवा जैसे अनाज पोषण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं।

जम्मू-कश्मीर में मिलेट्स को बढ़ावा
जम्मू-कश्मीर में मिलेट्स को बढ़ावा - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने सोमवार को शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी (SKUAST), जम्मू में ‘मिलेट्स फॉर हेल्थ’ विषय पर राष्ट्रीय संवाद का उद्घाटन किया। इसका विषय था- स्वस्थ पर्यावरण, जलवायु अनुकूल खेती और टिकाऊ खाद्य व्यवस्था का निर्माण।

कार्यक्रम में उपराज्यपाल ने मोटे अनाज यानी मिलेट्स की खेती और उनके इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उन्होंने पद्मश्री डॉ. खदार वली और खेती विरासत मिशन के उमेंद्र दत्त के मिलेट्स मिशन से जुड़े प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम केवल एक सेमिनार नहीं, बल्कि गांवों से जुड़ी एक कृषि क्रांति की दिशा में कदम है।

मिलेट्स को मिला दुनिया भर में पहचान
उपराज्यपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018 में मिलेट्स को ‘न्यूट्री-सीरियल’ के रूप में बढ़ावा दिया और इन्हें ‘श्री अन्न’ नाम दिया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष घोषित किया। उन्होंने कहा कि भारत में सदियों से ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो, कुटकी, कंगनी और सांवा जैसे मोटे अनाज का इस्तेमाल होता रहा है। लंबे समय तक इन्हें गरीबों के भोजन के तौर पर देखा गया, लेकिन अब पोषण और जलवायु के लिहाज से इनकी उपयोगिता फिर सामने आ रही है।

कठिन मौसम में भी उगती हैं मिलेट्स
मनोज सिन्हा ने कहा कि देश के छोटे और सीमांत किसान लंबे समय से मिलेट्स पर निर्भर रहे हैं। ऐसे समय में जब आधुनिक सिंचाई सुविधाएं, उर्वरक और सटीक मौसम की जानकारी आसानी से उपलब्ध नहीं थी, तब भी ये फसलें कठिन परिस्थितियों में उग जाती थीं और किसानों के परिवारों के लिए भोजन का सहारा बनती थीं।

उन्होंने कहा कि आज वैज्ञानिक शोध भी इस पारंपरिक ज्ञान को नए प्रमाणों के साथ समझ रहा है। जलवायु परिवर्तन की चुनौती के बीच दुनिया को ऐसी फसलों की जरूरत है जो पौष्टिक हों, किसानों के लिए कमाई का जरिया बनें और पर्यावरण पर कम दबाव डालें।

जम्मू-कश्मीर के छोटे किसानों के लिए क्यों जरूरी?
उपराज्यपाल ने बताया कि जम्मू-कश्मीर में 80 फीसदी से ज्यादा किसान छोटे और सीमांत किसान हैं और बड़ी संख्या में किसान मौसम पर निर्भर हैं। उनके मुताबिक मिलेट्स में दूसरी कई फसलों की तुलना में पानी और कृषि इनपुट की जरूरत कम होती है।

उन्होंने कहा कि मिलेट्स की खेती छोटे किसानों को बदलते मौसम के बीच अधिक भरोसा और स्थिरता दे सकती है। उन्होंने किसानों से मिलेट्स की खेती को आत्मनिर्भरता और जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीति के रूप में अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा, “भूमि का आकार छोटा हो सकता है, लेकिन आत्मनिर्भर जम्मू-कश्मीर बनाने में छोटे किसानों का योगदान छोटा नहीं हो सकता।”

सेहत के लिए भी फायदेमंद
उपराज्यपाल ने मिलेट्स के पोषण संबंधी फायदे भी गिनाए। उन्होंने कहा कि इनमें फाइबर, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम और जिंक जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी कम होता है।

उन्होंने लोगों से अपनी थाली में बाजरे की रोटी, रागी से बने व्यंजन और सांवा जैसे मोटे अनाज को फिर से शामिल करने की अपील की। उनके मुताबिक मिलेट्स आधारित भोजन को बढ़ावा देने से मधुमेह, मोटापा और हाई ब्लड प्रेशर जैसी जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं से निपटने में मदद मिल सकती है।

खेत से बाजार तक बनेगी मिलेट्स की अर्थव्यवस्था
उपराज्यपाल ने कहा कि मिलेट्स को केवल खेती तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि खेत से बाजार तक पूरी वैल्यू चेन विकसित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत ने 2024-25 में करीब 1.8 करोड़ टन मिलेट्स का उत्पादन किया और वैश्विक उत्पादन में लगभग 38 फीसदी हिस्सेदारी रही। ऐसे में मिलेट्स से बने पैकेज्ड और वैल्यू-एडेड उत्पादों की बड़ी संभावनाएं हैं।

उन्होंने जम्मू-कश्मीर में महिला स्वयं सहायता समूहों और युवाओं को मिलेट्स से जुड़े कारोबार, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग से जोड़ने पर जोर दिया। इसके लिए ‘वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट’ जैसी पहल का इस्तेमाल करने की बात कही।

किसानों से लेकर डॉक्टरों तक सभी की भूमिका
उपराज्यपाल ने किसानों, वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, उद्यमियों और आम लोगों से मिलकर ऐसे खाद्य तंत्र को बढ़ावा देने की अपील की जो पौष्टिक, टिकाऊ और बदलती जलवायु के अनुकूल हो। उन्होंने कहा कि मिलेट्स केवल अतीत की विरासत नहीं हैं, बल्कि जम्मू-कश्मीर के भविष्य की खेती की रणनीति का हिस्सा बन सकते हैं।

कई कृषि पुस्तिकाएं जारी
कार्यक्रम के दौरान उपराज्यपाल ने कई प्रकाशनों का विमोचन भी किया। इनमें ‘ए लेबोरेटरी मैनुअल ऑन सॉयल माइक्रोबायोलॉजी’, ‘फंडामेंटल्स ऑफ जियोग्राफिकल इंफॉर्मेशन सिस्टम्स एंड रिमोट सेंसिंग’ और ‘पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज फॉर माइनर मिलेट्स’ शामिल हैं।

कार्यक्रम में पद्मश्री डॉ. खदार वली, SKUAST जम्मू के कुलपति प्रो. बीएन त्रिपाठी, खेती विरासत मिशन के कार्यकारी निदेशक उमेंद्र दत्त, IFPRI के डॉ. अंजनी कुमार, SKUAST जम्मू के निदेशक अनुसंधान प्रो. एसके गुप्ता समेत विशेषज्ञ, नीति-निर्माता, वैज्ञानिक, अधिकारी, प्रगतिशील किसान, कृषि उद्यमी, स्वयं सहायता समूहों के सदस्य, शिक्षक और छात्र मौजूद रहे।
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