बिहार के इंजीनियर नाज ओजैर ने मक्के के छिलकों से कप, प्लेट, कटोरी और बैग बनाने की तकनीक विकसित की।
मुजफ्फरपुर के मुरादपुर गांव में मक्के के छिलकों से उत्पाद बनाने की इकाई, किसानों से 1 से 2 रुपये किलो में खरीद।
मक्के के छिलकों से एक सामान बनाने की लागत 45 से 50 पैसे, कटोरी करीब 2 रुपये प्रति पीस बिक रही है।
इस इकाई से सालाना करीब 5 लाख रुपये की शुद्ध आमदनी, गांव के आठ लोगों को मिला रोजगार।
तकनीक को 2024 में पेटेंट मिला, अगले 10 साल में एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के 100 उत्पादों का विकल्प बनाने का लक्ष्य।
मक्के के छिलके भी आमदनी और रोजगार का माध्यम बन सकते हैं। बिहार के इंजीनियर माज ओजेर ने ऐसी तकनीक का विकास किया है, जिसकी मदद से मक्के के छिलकों से कप, प्लेट, कटोरी, गिलास, स्ट्रॉ और बैग तैयार हो रहे हैं। यह तकनीक कचरे से कंचन का उदाहरण है। खास बात यह है कि इस तकनीक का फायदा मात्र उद्यमी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने मक्का किसानों को छिलकों से अतिरिक्त कमाई और लोगों को रोजगार देने का भी काम किया है। खबरों के अनुसार, ओजैर ने मुजफ्फरपुर जिले के तहत आने वाले मुरादपुर गांव में छिलकों से काम के उत्पाद बनाने का काम शुरू किया है।
प्लास्टिक की समस्या का समाधान खोजा
ओजैर ने प्लास्टिक के बर्तनों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को देखते हुए उनके विकल्प तैयार करने पर काम शुरू किया था। इसके लिए उन्होंने बांस, केले और पपीते के रेशों से भी सामान बनाने के प्रयोग किए। इस तकनीक को विकसित करने में उन्हें करीब पांच साल लगे। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने मक्के के छिलकों को नियंत्रित तापमान पर गर्म करके सांचे में ढालने का तरीका विकसित किया। इससे छिलकों से बने सामान को आकार बनाए रखने में मदद मिलती है। इस तकनीक से तैयार सामान का इस्तेमाल प्लास्टिक के बर्तनों की तरह किया जा सकता है। इसमें मक्के के छिलकों का इस्तेमाल किया जाता है, जो फसल कटने के बाद बच जाते हैं।
किसानों से 1 से 2 रुपये किलो में खरीद रहे छिलके
ओजैर ने मक्के के छिलकों को किसानों से करीब 1 से 2 रुपये प्रति किलो की कीमत पर खरीदना शुरू किया है। इससे किसानों को फसल के बाद बचने वाले छिलकों से भी आमदनी हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार, इस इकाई में एक सामान बनाने की लागत करीब 45 से 50 पैसे है। वहीं, कटोरी करीब 2 रुपये प्रति पीस की कीमत पर बेची जाती है। फिलहाल इस इकाई से सालाना करीब 5 लाख रुपये की शुद्ध आमदनी हो रही है। यहां गांव के आठ लोगों को काम मिला है।
तकनीक का पेटेंट हासिल किया, 100 प्लास्टिक उत्पादों का विकल्प बनाने का लक्ष्य
ओजैर ने 1 मार्च 2019 को इस तकनीक के लिए पेटेंट आवेदन किया था। उन्हें 21 फरवरी 2024 को पेटेंट प्रमाणपत्र मिला। इसके बाद 26 मई 2026 को उन्होंने एमएनओ स्वदेशी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की और उत्पादन शुरू किया।नाज ओजैर का लक्ष्य अगले 10 साल में कम से कम 100 ऐसे उत्पाद तैयार करना है, जो एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक सामान की जगह ले सकें।
इस पहल के जरिए मक्के के छिलकों जैसे कृषि अवशेषों का इस्तेमाल बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिल सकती है और गांव में उत्पादन से जुड़े कामों के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
बिहार सरकार भी कर रही है पहल को बढ़ावा देने का काम
रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों ने बताया कि ऐसी ग्रामीण पहल को स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) और लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत प्रोत्साहित किया जा रहा है। बिहार के ग्रामीण विकास एवं सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री श्रवण कुमार ने इस पहल की सराहना की है। उन्होंने इसे ग्रामीण नवाचार और आत्मनिर्भरता का उदाहरण बताया। मंत्री के अनुसार, राज्य सरकार कृषि अवशेषों का उपयोग बढ़ाने, एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पर निर्भरता कम करने और गांवों में स्वच्छता को बढ़ावा देने वाली पहल को प्रोत्साहित करना चाहती है। उन्होंने इस क्षेत्र में काम करने वाले उद्यमियों और स्टार्टअप को सहयोग देने की प्रतिबद्धता भी जताई।