भारतीय चावल के लिए निर्यात की संभावनाएं काफी मजबूत होती दिख रही हैं। चालू वित्त वर्ष (2026-27) के पहले 6 महीनों में चावल निर्यात में कीमत के हिसाब से 13 प्रतिशत का उछाल देखने को मिला है। अल नीनो ने प्रमुख चावल निर्यातक देशों के सामने घरेलू बनाम निर्यात बाजार का विकल्प खड़ा कर दिया है। हालांकि भारत के मामले में यह स्थिति केवल प्रीमियम चावल के मामले में दिखाई दे सकती है।
चावल का पर्याप्त स्टॉक मौजूद, अच्छे निर्यात की उम्मीद
सामान्य चावल की बात करें तो जानकार सरकार के बंपर बफर स्टॉक का हवाला देते हैं, जो चावल की महंगाई को काबू करने में अहम भूमिका निभा सकता है। डियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन का कहना है कि दुनिया भर में बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए बारत के पास पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, जिससे आगामी समय में अच्छे निर्यात की उम्मीद है।
वैश्विक बाजार में सबसे सस्ता भारतीय चावल, प्रतिस्पर्धा में मजबूती
बीते दिनों में भारत समेत प्रमुख निर्यातक देशों के चावल निर्यात दाम चढ़े हैं, लेकिन भारत मूल्य प्रतिस्पर्धा के मामले में अभी भी मजबूत है। IREF के उपाध्यक्ष देव गर्ग कहते हैं कि वैश्विक बाजार में भारतीय चावल सबसे कम दाम पर बिक रहा है। उनका कहना है कि हमारा चावल थाईलैंड या म्यांमार जैसे दूसरे प्रतिद्वंद्वी देशों के मुकाबले कम से कम 10 प्रतिशत सस्ता है।
बीते सीजन में अच्छा रहा चावल उत्पादन
जून महीने में खत्म हुए फसल वर्ष 2025-26 में भारत ने 15.4 करोड़ टन चावल का उत्पादन किया है। वहीं, इस खरीफ सीजन कम बारिश ने खासतौर से दक्षिण भारत में धान की उपज को लेकर चिंता खड़ी की है।
वैश्विक चावल उत्पादन में गिरावट के आसार, भारत के लिए अवसर
गर्ग का कहना है कि अल नीनो की वजह से वैश्विक चावल उत्पादन में गिरावट के आसार हैं। इससे वैश्विक मांग में बढ़ोतरी होगी। सबसे कम कीमत और बढ़ती मांग के साथ भारत बड़े निर्यात के लिए पूरी तरह तैयार है।
बीते साल 22 लाख टन का हुआ निर्यात, अब 24 लाख टन के आंकड़े को पार करने की उम्मीद
बीते वित्त वर्ष के दौरान भारत ने 22 लाख टन चावल निर्यात किया था, जिसका कल मुल्य करीब 1 लाख 12 हजार करोड़ रुपये था। इसमें बासमती और गैर बासमती का हिस्सा लगभग बराबर था। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) का अनुमान है कि इस साल भारत 24 लाख टन का निर्यात करेगा। लेकिन, गर्ग को पूरा भरोसा है कि भारत इस 24 लाख टन के आंकड़े को भी पार कर जाएगा।
निर्यात का रास्ता उतना आसान नहीं
कम कीमत और बढ़ती मांग भारत के लिए अवसर हैं, लेकिन निर्यात की इस राह पर चुनौतियों की भरमार है। गर्ग के अनुसार, ईरान संकट हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है। हम अपने कुल बासमती चावल का 74 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मध्य पूर्व के देशों को भेजते हैं। उन्होंने बताया की युद्ध के समय चावल की मांग बढ़ती है और लोग ज्यादा कीमत देने के लिए तैयार होते हैं। लेकिन, युद्ध लंबा खिंचने पर खरीदार ज्यादा समय तक इतनी ऊंची कीमत नहीं चुका पाएंगे। यह चावल उद्योग के लिए एक बड़ा जोखिम है।
इसके अलावा नीतियों में किसी भी तरह के बदलाव को गर्ग ने व्यापार के लिए जोखिम बताया। उन्होंने सरकार से मांग की है कि चावल निर्यात पर बिना किसी पाबंदी, निर्यात शुल्क (एक्सपोर्ट ड्यूटी) या न्यूनतम निर्यात मूल्य वाली वर्तमान नीति को ही जारी रखा जाना चाहिए।