बाजार में कम बारिश की वजह से दालों के उत्पादन में गिरावट की संभावना ने जन्म लिया है। यह कारण है कि चालू वित्त वर्ष (2026-27) के अप्रैल से अगस्त महीने के दौरान दालों का आयात 67 प्रतिशत बढ़कर 20.6 लाख टन पहुंच गया है। दाम के हिसाब से देखें तो दालों के आयात का मूल्य 38 प्रतिशत बढ़कर 1.18 अरब अमेरिकी डॉलर पहुंच गया है।
एक राहत की खबर, दालों का आयात भाव फिलाहल काबू में
मात्रा के हिसाब से दालों के आयात में 67 प्रतिशत की तेजी आई है, लेकिन कीमतों के हिसाब से बढ़त 38 प्रतिशत है। इस अंतर से पता चलता है कि दुनिया के सबसे बड़े दलहन आयातक- भारत की विदेशी दाल पर बढ़ी निर्भरता के बावजूद विदेशी दालों की कीमतें वर्तमान में काबू में हैं।
विदेशी बाजार में दालों की सप्लाई पर दबाव के आसार
व्यापारियों का कहना है कि आगामी महीनों में दालों का आयात सुस्त पड़ सकता है। इसकी बड़ी वजह कनाड़ा से आयात होने वाली पीली मटर और मसूर की कीमतों में आया उछाल है। दूसरी तरफ युक्रेन के साथ युद्ध की वजह से रूस से दालों की सप्लाई पर खराब असर पड़ा है। अगर विदेशी बाजार में दालों की सप्लाई पर दबाव पड़ा और कीमतों में उछाल आया, तो यह भारत के लिए घरेलू महंगाई के मोर्चे पर नई चुनौती होगी।
मसूर और पीली मटर के आयात में भारी बढ़ोतरी
बीते अप्रैल से अगस्त महीने के दौरान मसूर और पीली मटर के आयात में बड़ा उछाल देखने को मिला है। मसूर का आयात 200 प्रतिशत उछलकर 6 लाख 40 हजार टन और पीली मटर आयात 114 प्रतिशत बढ़कर 6 लाख 20 हजार टन हो गया। दूसरी तरफ 2026-27 के पहले पांच महीनों में तुअर का आयात 10 प्रतिशत बढ़कर 3 लाख 50 हजार टन रहा, जबकि उड़द का 3 प्रतिशत लुढ़ककर 2 लाख 70 हजार टन रह गया।
खरीफ दलहन का रकबा बढ़ा, उपज पर अल नीनो का साया
इस खरीफ सीजन दालों का कुल रकबा 11.84 मिलियन हेक्टेयर रहा, जो पिछले साल ेक मुकाबले 1.42 प्रतिशत ज्यादा है। लेकिन, महाराष्ट्र और कर्नाटक के मुख्य दाल उत्पादक क्षेत्रों में कम बारिश के चलते फसल को नुकसान पहुंचा है। अब रबी सीजन की मुख्य दालों, जैसे चना और मसूर की बुवाई सर्दियों के महीनों में होने वाली बारिश और तापमान पर निर्भर करेगी।
बाजार में दालों की खुदरा कीमतें बढ़ीं, लेकिन सरकार आयात शुल्क घटाने के पक्ष में नहीं
उपभोक्ता मामलों के विभागके मूल्य निगरानी सेल के अनुसार, शनिवार को बाजार में प्रमुख दालों की औसत खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। तूर का भाव 132.75 रुपये, चना का भाव 93.48 रुपये और उड़द का भाव 125.46 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गया है। पिछले साल की तुलना में इनकी कीमतों में क्रमशः 15 प्रतिशत, 7.5 प्रतिशत और 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
बाजार में सप्लाई कम होने की आशंकाओं से कीमतें मजबूत हुई हैं, लेकिन सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि सरकार दालों पर आयात शुल्क में कोई कटौती नहीं करेगी। सरकार का मानना है कि अल नीनो के खतरे के बावजूद घरेलू खरीफ फसल पर बहुत बुरा असर नहीं पड़ा है। इसके अलावा दुनिया भर में पर्याप्त आपूर्ति मौजूद है और सरकार के पास लगभग 4.5 मिलियन टन का बफर स्टॉक (सुरक्षित भंडार) उपलब्ध है।
पिछले वर्षों के आंकड़े और आयात पर भारत की निर्भरता
भारत अपनी सालाना खपत का लगभग 18 से 20 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा करता है। मुख्य रूप से तूर, उड़द, मसूर, पीली मटर और चना मंगाने के लिए भारत कनाडा, रूस, ब्राजील, म्यांमार और अफ्रीकी देशों पर निर्भर है।
बीते साल आयात में गिरावट
व्यापार के जानकारों का कहना है कि मांग सुस्त होने और घरेलू फसल अच्छी होने के कारण वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) में भारत का दाल आयात 34 प्रतिशत घटकर 3.63 अरब डॉलर रह गया था, जबकि FY25 में यह आयात 5.54 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था। FY26 में कुल 6 मिलियन टन दालों का आयात हुआ था, जिसमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी तूर (25 प्रतिशत) की थी, उसके बाद मसूर (19 प्रतिशत), पीली मटर (18 प्रतिशत) और उड़द (16 प्रतिशत) का स्थान था।