विज्ञापन
Home› Khabar Junction› Lakhpati Didi Some Turnovers Of 60 Lakhs Crossed 1 Crore Such Is Success Of Lakhpati Didi

Lakhpati Didi: किसी का कारोबार 60 लाख तो किसी का एक करोड़ पार, ऐसी है लखपति दीदियों की सफलता

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Mon, 26 Oct 2026 04:44 PM IST
सार

  • 50 लाख से एक करोड़ रुपये तक का कारोबार: ग्रामीण महिलाओं ने छोटे स्तर से शुरुआत कर खड़े किए बड़े उद्यम।

  • 20 हजार रुपये से बनी कारोबारी: आंध्र प्रदेश की पार्वती का काजू कारोबार सालाना 50 लाख रुपये के टर्नओवर तक पहुंचा।

  • सोशल मीडिया से विदेशों तक पहुंच: गोवा की सिद्धि कपड़ों के कारोबार से सालाना 60 लाख रुपये का टर्नओवर हासिल कर रही हैं।

  • रागी से कमाई और रोजगार: झारखंड की कुंवारी बरवा के संगठन में 1,501 सदस्य हैं और उत्पादों की मासिक बिक्री छह से सात लाख रुपये है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : गांव जंक्शन
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

गांव की जिन महिलाओं ने कभी परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए छोटे स्तर पर काम शुरू किया था, आज उनमें से कई अपना कारोबार संभाल रही हैं। कोई लकड़ी की कलाकृतियां बनाकर बेच रही है, तो कोई सोशल मीडिया के जरिये कपड़ों का कारोबार चला रही है। कुछ महिलाएं मोटे अनाज रागी से खाद्य उत्पाद बना रही हैं, जबकि कुछ ने काजू प्रसंस्करण को अपना व्यवसाय बना लिया है। इन महिलाओं का सालाना कारोबार 50 लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंच गया है।

इन महिलाओं की सफलता की कहानियां आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा स्थित पुन्नामी घाट पर आयोजित पहले राष्ट्रीय सरस मेले में सामने आई हैं। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने आंध्र प्रदेश सरकार के सहयोग से इस मेले का आयोजन किया है। इसमें राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड), राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान और कुदुम्बश्री भी सहयोग कर रहे हैं। मेले का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं के उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराना और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के अवसर देना है।

क्या है लखपति दीदी योजना?
लखपति दीदी ऐसी महिला को कहा जाता है, जिसके स्वयं सहायता समूह से जुड़े परिवार की सालाना स्थायी आय कम से कम एक लाख रुपये हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2029 तक छह करोड़ महिलाओं को लखपति दीदी बनाने का लक्ष्य रखा है।

दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार तक पहुंच बनाने में मदद दी जाती है। इसका उद्देश्य महिलाओं की आमदनी बढ़ाना और उन्हें अपना कारोबार शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करना है। राष्ट्रीय सरस मेले में शामिल महिलाओं की कहानियां बताती हैं कि सही सहयोग, मेहनत और बाजार मिलने पर छोटे कारोबार भी बड़े उद्यम बन सकते हैं।

1. चंद्रकला : लकड़ी की कलाकृतियों के कारोबार से एक करोड़ रुपये से अधिक की कमाई
आंध्र प्रदेश के तिरुपति की चंद्रकला ने अपने परिवार के लकड़ी की कलाकृतियां बनाने के कारोबार को आगे बढ़ाया। उनके परिवार में यह काम वर्ष 2002 में शुरू हुआ था। वर्ष 2007 में पति के निधन के बाद कारोबार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। शुरुआत में उनके सामने ग्राहकों के ऑर्डर पूरे करने, कारीगरों के साथ काम संभालने और कारोबार के हिसाब-किताब जैसी चुनौतियां थीं। हालांकि, लोटस स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें दूसरी महिलाओं का सहयोग मिला।

इसके बाद उन्होंने अलग-अलग शहरों में लगने वाली प्रदर्शनियों और व्यापार मेलों में अपने उत्पाद बेचने शुरू किए। चेन्नई, मुंबई, विजयवाड़ा, विशाखापत्तनम और दिल्ली जैसे शहरों में उनके उत्पादों को बाजार मिला। एक मेले में तो उनका पूरा सामान दिन खत्म होने से पहले ही बिक गया। आज उनके कारोबार का सालाना टर्नओवर एक करोड़ रुपये से अधिक बताया गया है।

वह 100 से अधिक लोगों को रोजगार भी दे रही हैं। उनके उत्पाद लेपाक्षी एम्पोरियम के शोरूम के जरिये भी कई शहरों में पहुंच रहे हैं। उनके उत्पाद मंत्रियों और अन्य प्रमुख लोगों को उपहार देने के लिए भी खरीदे जाते हैं। अब चंद्रकला अपने कारोबार को और बढ़ाना चाहती हैं। उनका लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्र की 500 महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराना है।

2. सिद्धि : सोशल मीडिया से खड़ा किया 60 लाख रुपये का कारोबार
गोवा के उत्तरी हिस्से की रहने वाली सिद्धि ने फैशन डिजाइनिंग में डिप्लोमा पूरा करने के बाद करीब चार साल पहले अपना कारोबार शुरू किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम के जरिये पारंपरिक कपड़ों का व्यवसाय शुरू किया और शुरुआत में इसमें अपना पैसा लगाया। महमाया स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें दूसरी महिलाओं के साथ काम करने, कर्ज के विकल्पों की जानकारी पाने और कारोबार से जुड़ा प्रशिक्षण हासिल करने में मदद मिली।

आज सिद्धि अपनी बुटीक चलाती हैं और उनके साथ करीब सात से दस लोग काम करते हैं। इनमें कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं, जिन्हें उन्होंने खुद प्रशिक्षण दिया है। उनके कारोबार में कपड़ों की कटाई, सिलाई, सामान खरीदने, पैकिंग और प्रदर्शनियों में बिक्री जैसे काम शामिल हैं।

सिद्धि अपनी वेबसाइट और सोशल मीडिया के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंचती हैं। इंस्टाग्राम पर मिलने वाले ऑर्डर वह इंडिया पोस्ट के जरिये सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका समेत दूसरे देशों में भी भेजती हैं। उनके कारोबार का सालाना टर्नओवर करीब 60 लाख रुपये है।

शुरुआत में उनके आसपास के कई लोग चाहते थे कि वह कारोबार करने के बजाय कोई नियमित नौकरी करें। लेकिन सिद्धि ने अपना काम जारी रखा। अब वह गोवा की करीब 100 और महिलाओं को अपने कारोबार से जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं।

3. कुंवारी बरवा : रागी के उत्पाद बेचकर महिलाओं को दे रहीं रोजगार
झारखंड के गुमला जिले की कुंवारी बरवा की सफलता की कहानी स्वयं सहायता समूह से शुरू हुई। उनके गांव की महिलाओं ने शुरुआत में समूह में रोजाना दो-दो रुपये की बचत करनी शुरू की थी। कुंवारी ने दूसरी महिलाओं को भी समूह से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।

समूह में जमा पैसे से उन्होंने कर्ज लेकर एक गाय खरीदी। बाद में बैंक से जुड़े कर्ज की मदद से सब्जियों की खेती के लिए उपकरण खरीदे। खेती और उपज की बिक्री से होने वाली आमदनी से उन्होंने परिवार का खर्च चलाने और बच्चों की पढ़ाई में मदद की।

समय के साथ महिलाओं के समूह का काम बढ़ा। वर्ष 2022 में 381 सदस्यों के साथ किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) बनाया गया। कुंवारी के मुताबिक, अब इसके सदस्यों की संख्या बढ़कर 1,501 हो गई है। यह संगठन किसानों को रागी की खेती करने, उपज इकट्ठा करने और उसका भंडारण करने में मदद करता है। इसके साथ ही रागी से लड्डू, ठेकुआ और नमकीन जैसे खाद्य उत्पाद भी बनाए जाते हैं।

गुमला में छोटे स्तर पर शुरू हुआ यह काम अब दिल्ली, हैदराबाद और दूसरे शहरों में लगने वाले मेलों तक पहुंच गया है। कुंवारी के अनुसार, संगठन के उत्पादों की मासिक बिक्री करीब छह से सात लाख रुपये है। इस कारोबार से 150 से अधिक महिलाओं को नियमित काम मिलता है। ऑर्डर बढ़ने पर अतिरिक्त महिलाओं को भी काम दिया जाता है। मेलों में हिस्सा लेने से ग्रामीण महिलाओं को दूसरे शहरों में जाने और नए बाजारों से जुड़ने का मौका मिला है।

4. पार्वती : 20 हजार रुपये के कर्ज से शुरू किया काजू का कारोबार
आंध्र प्रदेश के अनकापल्ली जिले के नटवरम गांव की सिंगमपल्ली पार्वती के परिवार की आमदनी खेती, दो दुधारू भैंसों और पति की दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर थी। परिवार की कमाई कई बार घरेलू खर्च और अचानक आने वाली जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होती थी। ऐसे में उन्हें ऊंची ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ता था।

पार्वती अपना कारोबार शुरू करना चाहती थीं, लेकिन पैसे की कमी बड़ी बाधा थी। वर्ष 2018 में श्री दुर्गा भवानी किसान उत्पादक समूह से जुड़ने के बाद उन्हें 20 हजार रुपये का कर्ज मिला। इस पैसे से उन्होंने कच्चा काजू खरीदकर बेचने का काम शुरू किया।

अगले साल उन्होंने 50 हजार रुपये का अतिरिक्त कर्ज लेकर काजू काटने की दो मशीनें खरीदीं। इसके बाद उन्होंने कच्चे काजू के व्यापार के साथ उसकी गिरी निकालने और बेचने का काम भी शुरू कर दिया। वह अपनी उपज तुनी के व्यापारियों को बेचती थीं। कारोबार बढ़ने पर उन्होंने प्रसंस्करण इकाई लगाने की योजना बनाई। इसके लिए किसान उत्पादक समूह से दो लाख रुपये और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत बैंक से तीन लाख रुपये की वित्तीय सहायता मिली। इस पैसे से उन्होंने काजू प्रसंस्करण की बड़ी इकाई स्थापित की।

आज पार्वती काजू की 11 अलग-अलग श्रेणियों के उत्पाद तैयार करती हैं। वह देश के विभिन्न हिस्सों में ग्राहकों को सामान बेचती हैं और प्रदर्शनियों में भी हिस्सा लेती हैं। उनके कारोबार का सालाना टर्नओवर करीब 50 लाख रुपये तक पहुंच गया है। 20 हजार रुपये के शुरुआती कर्ज से शुरू हुआ यह काम अब उनके परिवार की आमदनी का अहम जरिया बन चुका है। उनकी कहानी बताती है कि समय पर कर्ज, समूह का सहयोग और मेहनत ग्रामीण महिलाओं के लिए कारोबार के नए रास्ते खोल सकते हैं।

छोटे कारोबार से बड़े उद्यम तक का सफर
इन महिलाओं की सफलता के पीछे हुनर, मेहनत, समूह का सहयोग और बाजार तक पहुंच जैसे कई अहम कारण हैं। स्वयं सहायता समूहों ने उन्हें बचत और कर्ज के साथ-साथ दूसरी महिलाओं के साथ मिलकर काम करने का अवसर दिया। प्रदर्शनियों और व्यापार मेलों से उनके उत्पाद नए ग्राहकों तक पहुंचे। मेले में 'शक्ति- द स्पिरिट ऑफ लखपति दीदी' नाम से 16 फुट ऊंची कलाकृति भी लगाई गई है। इसके जरिये ग्रामीण महिलाओं की मेहनत और आत्मनिर्भरता को दर्शाया गया है।

मेले के उद्घाटन के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने महिलाओं को अपने कारोबार को आगे बढ़ाने और लखपति दीदी बनने के लक्ष्य से आगे बढ़कर बड़े उद्यम खड़े करने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि महिलाओं के सशक्तीकरण में उनकी आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी के साथ-साथ अपनी कमाई और संपत्ति पर उनका अधिकार भी महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि सरस मेले हर साल अलग-अलग राज्यों में आयोजित किए जाएंगे। इससे ग्रामीण महिलाओं को अपने उत्पादों की बिक्री, नए ग्राहक बनाने और आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने के अधिक अवसर मिलेंगे। विजयवाड़ा के पुन्नामी घाट पर आयोजित पहला राष्ट्रीय सरस मेला 31 अक्टूबर 2026 तक चलेगा। मेले में रोजाना सुबह 11 बजे से रात 9:30 बजे तक लोग आ सकते हैं।
 
विज्ञापन
विज्ञापन