लद्दाख भारत का पहला पूरी तरह से जैविक केंद्र शासित प्रदेश बन गया है। उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने रविवार को यह जानकारी दी। यह कदम इस क्षेत्र से रासायनिक खादों के उपयोग को पूरी तरह से खत्म करने, हिमालय के नाजुक पर्यावरण को बचाने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में, उपराज्यपाल सक्सेना ने इस बड़ी उपलब्धि का श्रेय किसानों की कड़ी मेहनत और लगन को दिया। उपराज्यपाल के अनुसार, जैविक खेती की ओर यह बदलाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रसायन-मुक्त खेती, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ आजीविका के विजन (सोच) को पूरा करने की दिशा में प्रशासन की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
उन्होंने आगे कहा कि इस कदम से उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत होगी, किसानों की आय में सुधार होगा और लद्दाख ऊंचाई वाले इलाकों में टिकाऊ खेती के लिए एक बेहतरीन मॉडल बनकर उभरेगा।
500 करोड़ की योजना और रासायनिक खाद पर बैन
लद्दाख प्रशासन ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए लगातार कई कदम उठाए हैं। इसी दिशा में, इस साल जून महीने में प्रशासन ने रासायनिक खादों की बिक्री और उनके उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था।
साल 2020 में मिशन ऑर्गेनिक डेवलपमेंट इनिशिएटिव यानी 'मोदी' योजना शुरू की गई थी। 500 करोड़ रुपये के बजट वाली इस योजना का लक्ष्य लद्दाख के सभी 666 गांवों को प्रमाणित जैविक केंद्रों में बदलना है। सरकार के अनुसार, इस ताजा घोषणा से पहले ही 207 राजस्व गांवों को जैविक प्रमाणपत्र (सर्टिफिकेट) मिल चुका था।
इस योजना के तहत जैविक खाद (बायो-फर्टिलाइजर) बनाने, बीज बांटने, सुरक्षित खेती (प्रोटेक्टेड कल्टीवेशन) और जैविक उत्पादों की मार्केटिंग के लिए किसानों को मदद दी जाती है।
किसानों के सामने मौजूद चुनौतियां
एक तरफ जहां यह कदम ऐतिहासिक है, वहीं जमीनी स्तर पर कुछ चुनौतियां भी हैं। लद्दाख के एक स्थानीय किसान ताशी के अनुसार, अब असली चुनौती हमारी उपज (फसल) का बेहतर दाम पाना है। किसानों के लिए इस जैविक प्रमाणपत्र का तभी कोई फायदा है, जब इससे हमें अच्छे बाजार मिलें और हमारी आमदनी बढ़े।
किसान ने यह भी बताया कि लद्दाख में फसल उगाने का समय (सीजन) बहुत छोटा होता है और यहां का मौसम भी बेहद कठोर है, जिसके कारण खेती करना काफी मुश्किल हो जाता है।