कर्नाटक सरकार ने केंद्र से 22,400.58 करोड़ रुपये की सूखा राहत राशि मांगी है। इस कड़ी में प्रदेश के डिप्टी CM जी. परमेश्वर 2 नवंबर को PM मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने राहत राशि को जल्द से जल्द मंजूरी और जारी करने की बात कही है। इसके साथ ही, उन्होंने इन तीनों केंद्रीय नेताओं से मिलकर किसानों का हाल बताने और ज्ञापन सौंपने के लिए समय भी मांगा है।
लाखों हेक्टेयर फसल तबाह, कई तहसीलें सूखे की जद में
मंत्री के अनुसार, कर्नाटक में सूखे के कारण हालात बहुत गंभीर हैं। राज्य के 226 तहसीलों में सूखे का असर हुआ है, जिससे 57.93 लाख हेक्टेयर में फैली फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है। सरकार का अनुमान है कि इससे 62,481.88 करोड़ रुपये का भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। इस स्थिति ने लाखों किसान परिवारों, खासकर छोटे और सीमांत किसानों को गहरे आर्थिक संकट में डाल दिया है।
राज्य सरकार के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 अक्टूबर, 2026 को आपदा राहत कोष के 2026-27 से 2030-31 तक के नियमों में बदलाव किया था। इसके बाद, फसल नुकसान पर दी जाने वाली सब्सिडी की जरूरत 6,128.70 करोड़ रुपये से बढ़कर 7,943.55 करोड़ रुपये हो गई। यानी इसमें 1,814.85 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है। इसी वजह से कर्नाटक सरकार ने अपनी कुल राहत मांग को 20,585.73 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 22,400.58 करोड़ रुपये कर दिया है। ज्ञापन के बाकी हिस्से पहले जैसे ही रखे गए हैं।
पुरानी दरें किसानों के खर्च के लिए नाकाफी
केंद्र सरकार ने नियमों में बदलाव करते हुए मदद की नई दरें तय की हैं। इसमें बारिश पर निर्भर फसलों के लिए 11,000 रुपये, सिंचित फसलों के लिए 22,000 रुपये और बारहमासी फसलों के लिए 30,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर तय की गई है।
उप मुख्यमंत्री ने इन बदली हुई दरों की सराहना तो की, लेकिन चिंता जताते हुए कहा कि खेती का खर्च बढ़ने के कारण यह मदद अभी भी बहुत कम है। उन्होंने कहा कि आज के समय में बीज, खाद, मजदूरी और सिंचाई का खर्च काफी बढ़ गया है। पत्र में कहा गया, "हम अपने किसानों से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे ऐसे राहत ढांचे के साथ 2026 की आर्थिक सच्चाइयों का सामना करें, जो खेती की असली लागत और उनके नुकसान को ठीक से नहीं समझता।"
नए डेटाबेस के इस्तेमाल की अपील
पत्र में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि आपदा राहत देने के लिए अभी भी 2015-16 की कृषि जनगणना (जमीन के पुराने रिकॉर्ड) का इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकार के अनुसार, यह 10 साल पुराना डेटा है और आज की सच्चाई से अलग हो सकता है। इससे कई जरूरतमंद छोटे और सीमांत किसान मदद पाने से छूट सकते हैं। उन्होंने केंद्र से मांग की है कि लाभार्थियों की पहचान के लिए कर्नाटक के नए और प्रमाणित 'FRUITS' (फ्रूट्स) डेटाबेस का इस्तेमाल किया जाए।
'खराब मानसून किसानों की सालों की मेहनत खत्म कर देता है'
उप मुख्यमंत्री ने साल 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य का जिक्र करते हुए कहा, एक विकसित भारत ऐसी कृषि अर्थव्यवस्था पर नहीं बनाया जा सकता, जहां एक खराब मानसून किसानों की सालों की मेहनत और परिवार की बचत को खत्म कर दे और उन्हें अनिश्चितता में धकेल दे।