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Home› Khabar Junction› Broken Rice Prices Jump 5 Competition Between Ethanol And Poultry Industries Will The Government Ban Export

टूटे चावल के दाम 5% उछले : इथेनॉल और पोल्ट्री उद्योग में मची होड़; क्या निर्यात पर पाबंदी लगाएगी सरकार?

गांव जंक्शन डेस्क, लखनऊ Published by: Devesh Saraswat Updated Tue, 03 Nov 2026 06:38 PM IST
सार

  • घरेलू बाजार में टूटे चावल की कीमतें एक महीने में 5 प्रतिशत से अधिक बढ़ीं, निर्यात पर रोक लागने के लिए सरकार विचार कर सकती है।
  • जानकारों का कहना है कि इस समय इथेनॉल कंपनियों, पोल्ट्री फीड निर्माताओं और निर्यातकों के बीच टूटे चावल की खरीद को लेकर प्रतिस्पर्धा है।
  • भारतीय चावल निर्यातक महासंघ के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में टूटे चावल के दाम 360 डॉलर प्रति टन के पार पहुंचे।

टूटे चावल की कीमतों में तेजी, निर्यात पर पाबंदी लगाने पर सरकार विचार कर सकती है।
टूटे चावल की कीमतों में तेजी, निर्यात पर पाबंदी लगाने पर सरकार विचार कर सकती है। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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घरेलू बाजार में 100 प्रतिसथ टूटे चावल की बढ़ती कीमतों के बीच सरकार इसके निर्यात पर दोबारा पाबंदी लगाने पर विचार कर सकती है। बीते मात्र एक महीने के अंदर ही घरेलू बाजार में टूटे चावल के भाव में 5 प्रतिशत से अधिक की तेजी देखने को मिली है। इसका अहम कारण इथेनॉल बनाने वाले कारखानों, मुर्गी दाना निर्माताओं और चावल निर्यातकों के बीच कच्चे माल की खरीद को लेकर बढ़ती होड़ है। भारतीय चावल निर्यातक महासंघ ने चेतावनी दी है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में टूटे चावल के दाम 360 डॉलर प्रति टन के पार पहुंच गए हैं, जिससे घरेलू बाजार में सप्लाई सुरक्षित रखने के लिए सरकार के दखल की संभावना बढ़ गई है।

टूटे चावल के लिए निर्यात, इथेनॉल और पोल्ट्री उद्योग में प्रतिस्पर्धा
जानकारों का कहना है कि टूटा चावल निर्यात के अलावा इथेनॉल उत्पादन और पोल्ट्री उद्योग के लिए अहम कच्चा माल बन गया है। आईआरईएफ के महानिदेशक विनोद कौल कहती हैं कि इन तीनी क्षेत्रों की टूटे चावल को लेकर प्रतिस्पर्धा इसकी उपलब्धता को कम कर सकती है, जिससे आगे भी कीमतों में दबाव बना रहेगा। महासंघ का मानना है कि टूटे चावल के महंगे होने से संबंधित उद्योगों की लागत बढ़ेगी, जिसका असर आगे चलकर व्यापक स्तर पर खाद्य महंगाई के रूप में भी दिख सकता है।

इथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम से खुले बाजार में बढ़ी प्रतिस्पर्धा
देश में पेट्रोल के साथ इथेनॉल मिलाने के सरकारी कार्यक्रम का दायरा बढ़ने से अनाज आधारित कच्चे माल की मांग में जोरदार बढ़ोतरी हुई है। इसमें टूटा चावल, मक्का और भारतीय खाद्य निगम का अतिरिक्त चावल शामिल हैं। हालांकि सरकार एथेनॉल बनाने के लिए एफसीआई के अतिरिक्त चावल के उपयोग की छूट देती है, लेकिन निजी डिस्टिलरीज अपनी जरूरत पूरी करने के लिए खुले बाजार से भी भारी मात्रा में कच्चा माल खरीदती हैं। इसी वजह से डिस्टिलरीज की सीधी टक्कर पोल्ट्री फीड बनाने वालों और चावल निर्यातकों के साथ हो रही है।

पुराने फैसलों से संकेत: पहले भी लग चुकी है निर्यात पर रोक
टूटे चावल के निर्यात को नियंत्रित करने का फैसला पहले भी लिया जा चुका है। सरकार ने घरेलू मांग और उपलब्धता की चिंताओं को देखते हुए सितंबर 2022 में टूटे चावल के निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। यह पाबंदी 7 मार्च 2025 तक जारी रही थी, जिसके बाद इसे दोबारा बिना किसी रोक-टोक के निर्यात की अनुमति दी गई। आईआरईएफ का कहना है कि सरकार का पुराना फैसला यह साबित करता है कि जब भी देश के भीतर अनाज की आपूर्ति सुनिश्चित करना पहली प्राथमिकता होती है, तो निर्यात पर रोक लगाना सरकार के पास एक प्रमुख विकल्प के रूप में हमेशा रहता है।


बदलती परिस्थितियों को देखते हुए महासंघ ने सभी चावल निर्यातकों को सलाह दी है कि वे भविष्य के नए सौदे (फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट) करते समय सावधानी बरतें। इसके अलावा घरेलू कीमतों, राइस मिलों से आने वाले माल और इथेनॉल निर्माताओं की मांग पर लगातार नजर बनाए रखें। इसके अलावा, आईआरईएफ ने सरकार से भी अपील की है कि यदि कोई पाबंदी लगाई जाती है, तो उससे पहले उद्योग के हितधारकों से राय ली जाए। 
 


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