विज्ञापन
Home› Khabar Junction› International Maize Conference Aim Increase Maize Production To 75 Million Tonnes Focus New Varieties Technolo

International Maize Conference: मक्का उत्पादन 7.5 करोड़ टन तक पहुंचाने का लक्ष्य, नई किस्मों और तकनीक पर जोर

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Mon, 02 Nov 2026 06:49 PM IST
सार

भारत में मक्का उत्पादन अगले 10 साल में 7.5 करोड़ टन करने का लक्ष्य रखा गया है। जानिए नई संकर किस्मों, बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक और किसानों की आय बढ़ाने की रणनीति से जुड़ी पूरी जानकारी।

International Maize Conference 2026
International Maize Conference 2026 - फोटो : सोशल मीडिया
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

भारत में मक्का का उत्पादन अगले 10 साल में बढ़ाकर 7.5 करोड़ टन करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए बेहतर बीज, नई किस्मों और संकर बीजों के विकास के साथ खेती की आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एमएल जाट ने कहा कि मक्का पर होने वाले शोध और किसानों तक पहुंचने वाली तकनीक का फायदा सीधे उनकी आमदनी बढ़ाने में दिखना चाहिए।

हैदराबाद में सोमवार, 2 नवंबर को पहली अंतरराष्ट्रीय मक्का कॉन्फ्रेंस-2026 शुरू हुई। तीन दिन तक चलने वाली इस कॉन्फ्रेंस में देश-विदेश के वैज्ञानिक, नीति निर्माता, कृषि संस्थानों और उद्योग जगत के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। इसमें मक्का की पैदावार बढ़ाने, बेहतर किस्में विकसित करने, बीज की उपलब्धता और मक्का से जुड़े उद्योगों को मजबूत बनाने पर चर्चा हो रही है।

मक्का उत्पादन में बड़ी बढ़ोतरी का लक्ष्य
कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए डॉ. एमएल जाट ने बताया कि भारत में मक्का का उत्पादन बढ़कर करीब 5.5 करोड़ टन पहुंच गया है। पिछले एक दशक में इसकी पैदावार में भी अच्छी बढ़ोतरी हुई है। अब अगले 10 साल में उत्पादन को 7.5 करोड़ टन तक पहुंचाने का लक्ष्य है। इसके साथ ही प्रति हेक्टेयर पैदावार में भी 1.5 गुना बढ़ोतरी करने की जरूरत बताई गई है।

उन्होंने कहा कि इसके लिए नई तकनीक, बेहतर फसल प्रबंधन और उपलब्ध संसाधनों का सही इस्तेमाल जरूरी है। खासकर उन क्षेत्रों में पैदावार बढ़ाने पर ध्यान देना होगा, जहां किसानों को खेती के बेहतर तरीके अपनाने के बावजूद उत्पादन में अंतर का सामना करना पड़ता है।

किसानों को केंद्र में रखकर बनेगी रणनीति
डॉ. जाट ने कहा कि मक्का की खेती को केवल खाद्य उत्पादन तक सीमित नहीं देखना चाहिए। इसका इस्तेमाल भोजन, पशु आहार, चारे और ईंधन के रूप में भी होता है। अब तक मक्का के विकास की रणनीति में इन चार पहलुओं (4F) पर जोर दिया जाता रहा है। उन्होंने इसमें पांचवां F यानी किसान (Farmer) जोड़ने की बात कही।

उनका कहना था कि मक्का पर होने वाले शोध और किसानों को दी जाने वाली तकनीकी सलाह का उद्देश्य उनकी खेती को अधिक लाभकारी बनाना होना चाहिए। इसके लिए किसानों को सस्ती और अच्छी गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराने होंगे। खासकर सरकारी संस्थानों की ओर से विकसित संकर बीजों की उपलब्धता बढ़ाने और बीज वितरण व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है।

उन्होंने यह भी कहा कि मक्का की खेती को अलग-अलग मौसम और कृषि जलवायु वाले क्षेत्रों के हिसाब से बढ़ावा दिया जाना चाहिए। हालांकि, इसके लिए दलहन और तिलहन जैसी दूसरी महत्वपूर्ण फसलों के रकबे और उत्पादन पर असर नहीं पड़ना चाहिए।

पांच साल में विकसित किए गए 329 संकर बीज
ICAR के उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डीके यादव ने कहा कि मक्का खाद्य, पोषण और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण फसल है। उन्होंने बताया कि पिछले पांच वर्षों में मक्का अनुसंधान और विस्तार के क्षेत्र में प्रगति हुई है और इस दौरान 329 संकर किस्में विकसित की गई हैं।

उन्होंने मक्का की पैदावार और पोषण गुणवत्ता बढ़ाने के लिए नई किस्मों के विकास पर जोर दिया। साथ ही फसल को कीट, बीमारियों, सूखे और मौसम की दूसरी चुनौतियों से बचाने वाली किस्में विकसित करने की जरूरत बताई। उनके मुताबिक, खेती में खाद और दूसरे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल, कृषि यंत्रों को बढ़ावा देना और किसानों को प्रशिक्षण देना भी जरूरी है।

डॉ. यादव ने सरकारी संस्थानों के स्तर पर संकर बीजों का उत्पादन बढ़ाने और शोध संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों तथा उद्योगों के बीच सहयोग मजबूत करने की बात कही। उन्होंने मक्का को एथेनॉल उत्पादन के लिए उपयोगी फसल के रूप में विकसित करने पर भी जोर दिया।

कम लागत में बेहतर किस्में विकसित करने की जरूरत
प्रसिद्ध मक्का वैज्ञानिक और पद्मश्री सम्मानित डॉ. एस. वासल ने कहा कि किसानों की जरूरत के मुताबिक नई किस्में और संकर बीज विकसित करने के लिए सरल और कम खर्च वाली प्रजनन तकनीकों को अपनाना चाहिए। इससे बेहतर किस्में कम समय में विकसित करने में मदद मिल सकती है।

वहीं, पद्म भूषण सम्मानित और ICAR के पूर्व महानिदेशक डॉ. आरएस परोदा ने कहा कि कृषि अनुसंधान की प्राथमिकताएं किसानों और कृषि क्षेत्र की बदलती जरूरतों के अनुरूप होनी चाहिए। उन्होंने उन्नत प्रजनन तकनीकों के इस्तेमाल, मक्का की पारंपरिक आनुवंशिक सामग्री के संरक्षण और उसके बेहतर उपयोग पर जोर दिया।

उन्होंने मक्का की पूरी मूल्य शृंखला को मजबूत बनाने और अफ्लाटॉक्सिन से बचाव के बेहतर उपाय अपनाने की जरूरत भी बताई। अफ्लाटॉक्सिन एक तरह का जहरीला पदार्थ है, जो कुछ फफूंद के कारण अनाज में पैदा हो सकता है। इससे मक्का की गुणवत्ता और खाद्य एवं पशु आहार के रूप में उसकी सुरक्षा प्रभावित होती है।

तीन दिन तक मक्का की खेती और बाजार पर चर्चा
मक्का टेक्नोलॉजिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. एचएस जाट ने कॉन्फ्रेंस में आए अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि भारत की कृषि में बदलाव लाने में मक्का की अहम भूमिका है। इसके लिए शोध संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, सरकार और उद्योग जगत के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।

कार्यक्रम में मक्का अनुसंधान से जुड़ी कई वैज्ञानिक पुस्तकों और प्रकाशनों का विमोचन किया गया। साथ ही इस क्षेत्र में योगदान देने वाले वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को सम्मानित किया गया। 2 से 4 नवंबर तक चलने वाली यह कॉन्फ्रेंस मक्का की पैदावार बढ़ाने, किसानों को बेहतर बीज उपलब्ध कराने, नई किस्में विकसित करने और मक्का आधारित उद्योगों को मजबूत बनाने की रणनीति तैयार करने का मंच है।
विज्ञापन
विज्ञापन