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खाद्यान्न उत्पादन में भारत मजबूत : खेती के लिए पानी का प्रबंधन बड़ी चुनौती- IFAD

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Fri, 09 Oct 2026 12:22 PM IST
सार

  • भारत के कुल बोए गए क्षेत्र का करीब 60% हिस्सा बारिश पर निर्भर है।
  • बारिश आधारित खेती देश के कुल खाद्य उत्पादन में लगभग 40% योगदान देती है।
  • 2024 में भारत की 40.4% आबादी पौष्टिक भोजन खरीदने में सक्षम नहीं थी
  • IFAD ने भारत में 37 परियोजनाओं के तहत करीब 1.5 अरब डॉलर का निवेश किया है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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भारत ने कई फसलों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल कर खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया है, लेकिन खेती के लिए पानी की उपलब्धता और उसके बेहतर प्रबंधन की चुनौती अब भी बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) के अध्यक्ष अल्वारो लारियो ने यह बात कही। उनके मुताबिक, देश की खेती का बड़ा हिस्सा अब भी मानसून की बारिश पर निर्भर है, जिससे किसानों को मौसम के उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है।

लारियो ने गुरुवार को पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि भारत कई फसलों के मामले में आत्मनिर्भर बना है। इससे देश की कृषि व्यवस्था पहले के मुकाबले अधिक मजबूत हुई है। हालांकि, बारिश पर निर्भर खेती के कारण पानी की उपलब्धता और उसका प्रबंधन बड़ी चुनौती बने हुए हैं। कृषि मंत्रालय के अनुसार, देश के कुल बोए गए क्षेत्र में करीब 60 प्रतिशत हिस्सा बारिश पर निर्भर खेती का है। इससे देश के कुल खाद्य उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत योगदान मिलता है।

पौष्टिक भोजन सस्ता करना भी बड़ी चुनौती
लारियो ने कहा कि खाद्य सुरक्षा का मतलब केवल पर्याप्त अनाज पैदा करना नहीं है, बल्कि लोगों तक पौष्टिक भोजन सस्ती कीमत पर पहुंचाना और ग्रामीण परिवारों की आमदनी बढ़ाना भी जरूरी है।उन्होंने कहा कि पौष्टिक भोजन की लागत दुनिया के सामने बड़ी चुनौतियों में से एक है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2024 में भारत की करीब 40.4 प्रतिशत आबादी पौष्टिक भोजन खरीदने में सक्षम नहीं थी।

लारियो 7 से 11 अक्टूबर तक भारत के दौरे पर हैं। इस दौरान उनका उद्देश्य केंद्र सरकार और ग्रामीण विकास से जुड़ी संस्थाओं के साथ सहयोग को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि IFAD की भारत के साथ करीब पांच दशक पुरानी साझेदारी देश के विकास के साथ आगे बढ़ी है। IFAD संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी और एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था है। इसका उद्देश्य ग्रामीण गरीबी कम करना और खाद्य प्रणालियों को मजबूत बनाना है।

37 परियोजनाओं में 1.5 अरब डॉलर का निवेश
IFAD ने भारत में अब तक 37 परियोजनाओं के तहत करीब 1.5 अरब डॉलर का निवेश किया है। इसके माध्यम से छह करोड़ नहीं, बल्कि 60 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों तक पहुंच बनाई गई है। इनमें खास तौर पर महिलाएं, आदिवासी समुदाय और छोटे उत्पादक शामिल हैं।

लारियो के मुताबिक, भारत में IFAD के निवेश से कुल निवेश में तीन गुने से अधिक की राशि जुटाने में मदद मिली है। मई में संस्था ने भारत के लिए आठ साल की नई रणनीति शुरू की थी, जिसके तहत करीब 30 लाख ग्रामीण परिवारों यानी 1.32 करोड़ लोगों तक पहुंचने का लक्ष्य है।

वर्ष 2026 से 2033 तक की इस रणनीति का उद्देश्य ग्रामीण समुदायों को जलवायु परिवर्तन और आर्थिक झटकों से निपटने में सक्षम बनाना है। साथ ही, सफल ग्रामीण विकास योजनाओं को बड़े स्तर पर लागू करना भी इसके लक्ष्यों में शामिल है। लारियो ने कहा कि इन प्रयासों से ग्रामीण परिवारों की आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी। इससे मानसून की विफलता या फसलों के दाम में अचानक गिरावट आने पर उनके दोबारा गरीबी में जाने का खतरा कम होगा।

पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों पर विशेष ध्यान
लारियो ने कहा कि भारत में IFAD का काम अब उन क्षेत्रों पर अधिक केंद्रित है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं। इनमें पूर्वोत्तर के राज्य और हिमालयी क्षेत्र प्रमुख हैं। शुक्रवार को वह मेघालय में राज्य सरकार और IFAD की साझेदारी से चल रही मेघालय आजीविका एवं बाजार पहुंच परियोजना का दौरा करेंगे। यह ग्रामीण विकास परियोजना वर्ष 2014 में शुरू की गई थी।

पूर्वोत्तर में ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने के लिए IFAD ने मेघालय में जैविक मसालों के प्रसंस्करण केंद्र में शुरुआती निवेश के तौर पर दो करोड़ रुपये दिए हैं। जून में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस केंद्र का उद्घाटन किया था। इसे पूर्वोत्तर का अपनी तरह का पहला और सबसे बड़ा केंद्र बताया गया है। इसकी सालाना प्रसंस्करण क्षमता 10 हजार मीट्रिक टन से अधिक है और यह करीब 5,500 किसानों के साथ काम करता है। इस तरह भारत में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पानी का बेहतर प्रबंधन, पौष्टिक भोजन की उपलब्धता और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाना भी कृषि क्षेत्र के लिए अहम प्राथमिकताएं बनी हुई हैं।
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