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मिट्टी की सुधरेगी सेहत: जल्द आएगी भारत सॉइल हेल्थ पॉलिसी, देश में बनेंगे 1 लाख मृदा स्वास्थ्य उद्यमी- ICAR चीफ

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Fri, 23 Oct 2026 05:34 PM IST
सार

  • सरकार जल्द भारत सॉइल हेल्थ पॉलिसी ला सकती है, इसका पहला मसौदा तैयार है।

  • ICAR के महानिदेशक एमएल जाट के मुताबिक, देश में 1 लाख मृदा स्वास्थ्य उद्यमी तैयार करने का लक्ष्य है।

  • पहले चरण में कम से कम 1,000 उद्यमियों को तैयार करने की योजना है।

  • देश के 100 से अधिक जिलों में जरूरत से दोगुना उर्वरक इस्तेमाल किए जाने की जानकारी दी गई।

आईसीएआर के महानिदेशक एमएल जाट
आईसीएआर के महानिदेशक एमएल जाट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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किसानों को मिट्टी की सेहत सुधारने और उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल करने में मदद के लिए सरकार जल्द ही भारत सॉइल हेल्थ पॉलिसी (Bharat Soil Health Policy) ला सकती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक एमएल जाट ने बताया कि नीति का पहला मसौदा तैयार हो चुका है। इसके तहत देश में एक लाख मृदा स्वास्थ्य उद्यमी तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है।

जाट ने नीति आयोग से अलग कृषि नीति पर काम करने वाले थिंक टैंक ICRIER की ओर से आयोजित उर्वरक नीति से जुड़ी एक चर्चा में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पिछले एक साल से इस नीति को लेकर विभिन्न पक्षों के साथ बातचीत और क्षेत्रीय स्तर पर विचार-विमर्श किया जा रहा है। हालांकि, उन्होंने नीति की विस्तृत जानकारी साझा नहीं की। उन्होंने कहा कि नीति को सफल बनाने के लिए इसे जमीन पर लागू करना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

पहले चरण में तैयार होंगे 1,000 मृदा स्वास्थ्य उद्यमी
एमएल जाट के मुताबिक, सरकार का लक्ष्य हर किसान तक मिट्टी की सेहत से जुड़ी जानकारी पहुंचाना है। इसके लिए मृदा स्वास्थ्य उद्यमियों की मदद ली जाएगी। शुरुआत में कम से कम 1,000 ऐसे उद्यमियों को तैयार करने की योजना है। आगे इस पहल का विस्तार सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और कंपनियों के सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत मिलने वाली मदद से किया जा सकता है।

इस पहल का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर लोगों को जागरूक करना और किसानों को उर्वरकों का सही मात्रा में इस्तेमाल करने के लिए सक्षम बनाना है। इससे खेती में पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

नैनो उर्वरकों के प्रचार में हुई जल्दबाजी: ICAR महानिदेशक
नैनो उर्वरकों के इस्तेमाल को लेकर किसानों की हिचकिचाहट पर जाट ने माना कि इनके प्रचार में जल्दबाजी हुई। उन्होंने कहा कि किसानों तक यह संदेश पहुंचाने में समस्या रही कि नैनो उर्वरक की एक बोतल पारंपरिक दानेदार उर्वरक की एक बोरी की जगह ले सकती है।

इफको ने वर्ष 2021 में नैनो यूरिया पेश किया था। उस समय दावा किया गया था कि 500 मिलीलीटर नैनो यूरिया की एक बोतल 45 किलोग्राम की पारंपरिक यूरिया बोरी का विकल्प बन सकती है। पारंपरिक यूरिया में 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है। जाट के अनुसार, नैनो उर्वरकों की उपयोगिता हो सकती है, लेकिन इसके लिए उनका सही तरीके से और उचित परिस्थितियों में इस्तेमाल जरूरी है।

उन्होंने बताया कि पिछले साल प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के सामने नैनो उर्वरकों से मिली सीख और आगे की रणनीति पर प्रस्तुति दी गई थी। ICAR ने भी देश के 15 स्थानों पर नैनो उर्वरकों को लेकर व्यवस्थित शोध शुरू किया है। इसका उद्देश्य इनके प्रभाव से जुड़े ठोस वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना है।

100 से ज्यादा जिलों में जरूरत से दोगुना उर्वरक इस्तेमाल
जाट ने बताया कि देश के 100 से अधिक ऐसे जिलों की पहचान की गई है, जहां किसान जरूरत से दोगुनी मात्रा में उर्वरकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसानों को उर्वरकों की सही मात्रा और इस्तेमाल के तरीके के बारे में जानकारी देना जरूरी है।

ICAR मिट्टी की सेहत और उर्वरकों के सही इस्तेमाल को लेकर समय-समय पर सलाह जारी करता है। हालांकि, जाट ने सवाल उठाया कि जब तक इन सलाहों को किसानों तक पहुंचाने और उन पर अमल कराने की ठोस व्यवस्था नहीं होगी, तब तक उनका पूरा लाभ कैसे मिलेगा।

एक-तिहाई रासायनिक उर्वरकों का विकल्प बन सकते हैं जैविक स्रोत
ICAR महानिदेशक ने कहा कि भारत जैविक संसाधनों और उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल के जरिए रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर सकता है। उनके अनुसार, देश में रासायनिक उर्वरकों की करीब एक-तिहाई जरूरत को जैविक संसाधनों से पूरा करने की संभावना है। इसके लिए उपयुक्त नीति और किसानों को प्रोत्साहन देने की जरूरत होगी।

उन्होंने कहा कि देश में मौजूद खनिज संसाधनों की संभावनाओं का भी बेहतर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। ग्लॉकोनाइट जैसे पोटाश के स्रोतों पर अभी और काम करने की जरूरत है। गोबरधन योजना के तहत उपलब्ध संसाधनों से जैविक और खनिज पोषक तत्वों वाले उर्वरक तैयार करने की संभावनाएं भी तलाशी जा सकती हैं।

जाट ने जैविक सूक्ष्मजीवों और अन्य जैविक संसाधनों को पोषक तत्वों के महत्वपूर्ण स्रोत बताते हुए कहा कि इस क्षेत्र की क्षमता का अभी पर्याप्त इस्तेमाल नहीं हुआ है। भारत में जैविक विविधता काफी अधिक है, जिसका उपयोग खेती में किया जा सकता है।

आयात पर निर्भरता घटाने और पोषक तत्वों का बेहतर इस्तेमाल करने पर जोर
जाट के मुताबिक, उर्वरक नीति में बदलाव के तहत दो प्रमुख लक्ष्यों पर काम करना होगा। पहला, केवल सब्सिडी आधारित व्यवस्था से आगे बढ़कर ऐसे प्रोत्साहन देना, जो उर्वरकों के अधिक कुशल इस्तेमाल को बढ़ावा दें। दूसरा, आयात पर निर्भरता कम करके देश में उपलब्ध संसाधनों से फसलों की पोषक तत्वों की जरूरत पूरी करने की संभावनाएं बढ़ाना।

उन्होंने बताया कि ICAR अब फसल प्रजनन कार्यक्रमों में भी पोषक तत्वों के बेहतर उपयोग की क्षमता पर ध्यान दे रहा है। पहले मुख्य जोर फसल की पैदावार बढ़ाने पर था, लेकिन अब ऐसी किस्मों के विकास पर भी काम किया जा रहा है, जो पोषक तत्वों का अधिक कुशलता से इस्तेमाल कर सकें।
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