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India Close To Cold Storage Target 84 Target Met But 75 Capacity Depends Only On Potatoes
कोल्ड स्टोरेज लक्ष्य के करीब भारत : 84% क्षमता तैयार, लेकिन 75% क्षमता सिर्फ आलू के भरोसे
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Wed, 07 Oct 2026 01:58 PM IST
सार
भारत ने 2037-38 की जरूरत की 84% कोल्ड स्टोरेज क्षमता हासिल कर ली है, लेकिन करीब 75% क्षमता सिर्फ आलू के लिए इस्तेमाल हो रही है। पैक हाउस, रीफर वाहन और रिपनिंग चैंबर की भारी कमी के कारण हर साल बड़ी मात्रा में फल-सब्जियां और अन्य खाद्य उत्पाद खराब हो जाते हैं।
भारत ने 2037-38 तक जरूरी कोल्ड स्टोरेज क्षमता का 84 फीसदी हिस्सा हासिल कर लिया है, लेकिन खेत से बाजार तक उपज को सुरक्षित पहुंचाने वाली पूरी कोल्ड चेन अभी काफी पीछे है। देश में मौजूद कोल्ड स्टोरेज का करीब तीन-चौथाई हिस्सा सिर्फ आलू रखने में इस्तेमाल हो रहा है। वहीं, आधे से ज्यादा क्षमता उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में केंद्रित है।
FICCI और Grant Thornton Bharat की रिपोर्ट ‘India’s Cold Chain: From Storage to a Chain’ में कहा गया है कि पिछले दो दशकों में कोल्ड स्टोरेज के क्षेत्र में काफी निवेश हुआ है। अब अगली चुनौती मौजूदा भंडारण व्यवस्था को परिवहन और खेत के पास की सुविधाओं से जोड़कर एक मजबूत कोल्ड चेन बनाने की है।
4.02 करोड़ टन पहुंची कोल्ड स्टोरेज क्षमता
रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 8,815 कोल्ड स्टोरेज हैं। इनकी कुल क्षमता करीब 4.022 करोड़ टन हो गई है। 2037-38 तक करीब 4.8 करोड़ टन क्षमता की जरूरत का अनुमान है। यानी भारत इस लक्ष्य का करीब 84 फीसदी हासिल कर चुका है।
लेकिन इस क्षमता का बड़ा हिस्सा एक ही फसल के लिए इस्तेमाल हो रहा है। करीब 75 फीसदी कोल्ड स्टोरेज क्षमता आलू के भंडारण में लगी है। इसके अलावा आधे से ज्यादा क्षमता सिर्फ उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में है। रिपोर्ट में फल-सब्जियों के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों के पास बहुउद्देशीय और अलग-अलग तापमान पर काम करने वाले कोल्ड स्टोरेज बनाने की जरूरत बताई गई है।
पैक हाउस और रेफ्रिजरेटेड वाहन सबसे बड़ी कमी
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में असली कमी खेत से उपज को सुरक्षित तरीके से आगे ले जाने वाली सुविधाओं की है। कोल्ड स्टोरेज की क्षमता जहां लक्ष्य के 84 फीसदी तक पहुंच गई है, वहीं दूसरी जरूरी सुविधाएं काफी पीछे हैं।
पैक हाउस : लक्ष्य का सिर्फ 0.4 फीसदी
रेफ्रिजरेटेड (रीफर) वाहन : 3.8 फीसदी
रिपनिंग चैंबर : 7.1 फीसदी
पैक हाउस में खेत के पास ही फल और सब्जियों की सफाई, ग्रेडिंग और पैकिंग की जा सकती है। इससे फसल की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलती है। वहीं रीफर वाहनों में नियंत्रित तापमान पर उपज को एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है।
2037-38 तक 1.75 लाख करोड़ के निवेश की जरूरत
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि पैक हाउस, रीफर वाहन और रिपनिंग चैंबर जैसी सुविधाएं विकसित करने के लिए 2037-38 तक करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी। यह राशि औसतन करीब 8,800 करोड़ रुपये सालाना के निवेश के बराबर है।
इस निवेश की जरूरत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में हर साल बड़ी मात्रा में खाद्य उत्पाद कटाई के बाद खराब हो जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, फल-सब्जियों, डेयरी, मांस, पोल्ट्री और मछली समेत विभिन्न क्षेत्रों में हर साल करीब 1.7 करोड़ से 4.7 करोड़ टन खाद्य उत्पाद बर्बाद होने का अनुमान है। वहीं 54 फसलों में कटाई के बाद होने वाले नुकसान का सालाना मूल्य करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये आंका गया है।
खेत के पास हो प्री-कूलिंग की सुविधा
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि किसानों के खेत के पास प्री-कूलिंग सेंटर और छोटे पैक हाउस विकसित किए जाएं। फसल कटने के तुरंत बाद उसकी गर्मी कम करने से गुणवत्ता और भंडारण क्षमता बेहतर हो सकती है। इसके साथ ही किसानों, कारोबारियों और कंपनियों के लिए साझा रेफ्रिजरेटेड परिवहन व्यवस्था विकसित करने की जरूरत बताई गई है।
हर खेप का डिजिटल रिकॉर्ड रखने का सुझाव
रिपोर्ट में पूरी कोल्ड चेन के लिए एक राष्ट्रीय मानक बनाने की सिफारिश की गई है। इसके तहत तापमान-संवेदनशील उत्पाद की हर खेप के साथ मशीन से पढ़ा जा सकने वाला तापमान रिकॉर्ड रखा जा सकता है।
इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि उत्पाद के खेत से बाजार तक पहुंचने के दौरान किस चरण में तापमान तय सीमा से बाहर गया। इससे कारोबारियों की जवाबदेही बढ़ेगी और खरीदारों, नियामकों तथा वित्तीय संस्थानों को भी उत्पाद की गुणवत्ता का प्रमाण मिल सकेगा।
एक ही कोल्ड स्टोरेज में कई फसलों का भंडारण
रिपोर्ट में मल्टी-कमोडिटी कोल्ड स्टोरेज को बढ़ावा देने की भी बात कही गई है। यानी एक ही सुविधा में अलग-अलग फसलों और उत्पादों को उनकी जरूरत के अनुसार अलग तापमान पर रखा जा सके।इसके अलावा सालभर इस्तेमाल की गारंटी वाले समझौते और प्रोसेसर, रिटेलर तथा निर्यातकों से पहले से तय खरीद व्यवस्था को बढ़ावा देने का सुझाव दिया गया है। इससे कोल्ड चेन में किए गए निवेश का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा।
खेत और खरीदार के बीच टूट रही कड़ी
FICCI की लॉजिस्टिक्स समिति के चेयरमैन और DP World के सीईओ एवं एमडी रिजवान सोमार ने कहा कि मजबूत कोल्ड चेन सिर्फ ठंडे भंडारण तक सीमित नहीं है। इसमें खेत से पहली खेप की हैंडलिंग, भंडारण, परिवहन, वितरण और उपभोक्ता तक पहुंचने की पूरी व्यवस्था शामिल होती है। निर्यात के मामले में यह व्यवस्था बंदरगाह और विदेशी बाजार तक भी जाती है।
Grant Thornton Bharat के पार्टनर करण शर्मा ने कहा कि भारत में अब सिर्फ कोल्ड स्टोरेज की कमी नहीं है, बल्कि उसे खेत और बाजार से जोड़ने वाली पूरी व्यवस्था की कमी है। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब तीन-चौथाई कोल्ड स्टोरेज आलू के लिए इस्तेमाल होता है, जबकि हर साल बड़ी मात्रा में फल और सब्जियां पहली कोल्ड सुविधा तक पहुंचने से पहले या रास्ते में खराब हो जाती हैं।
किसानों को मिल सकता है सीधा फायदा
अगर मौजूदा कोल्ड स्टोरेज को खेत के पास पैक हाउस, प्री-कूलिंग सेंटर, रेफ्रिजरेटेड वाहनों और डिजिटल ट्रैकिंग से जोड़ा जाए तो फसल खराब होने का नुकसान कम किया जा सकता है। इससे किसान अपनी उपज को तुरंत कम कीमत पर बेचने की मजबूरी से बच सकते हैं, बेहतर बाजार तक पहुंच बना सकते हैं और उपज का बेहतर दाम हासिल कर सकते हैं। साथ ही भारत के कृषि, खाद्य और दवा निर्यात को भी मजबूती मिल सकती है।
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