हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन, बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और बर्फबारी के कारण इस साल सेब के उत्पादन में 48 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। राज्य बागवानी विभाग के निदेशक सतीश कुमार के अनुसार, इस सीजन में अब तक केवल 1.15 करोड़ सेब की पेटियां (बॉक्स) ही मंडियों में पहुंची हैं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 2.18 करोड़ पेटियां पहुंची थीं। उन्होंने बताया कि मौसम की मार के चलते इस वर्ष राज्य में सेब का कुल उत्पादन पिछले 10 से 12 वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच सकता है।
अर्थव्यवस्था और सरकारी खरीद पर गहरा असर
हिमाचल प्रदेश में लगभग 5,000 करोड़ रुपये की सेब आर्थिकी बागवानी क्षेत्र की रीढ़ है, जिससे राज्य के करीब 2.5 लाख परिवार जुड़े हैं। सेब का सीजन 15 जून से अक्टूबर के अंत तक चलता है, जिसमें शुरुआती किस्में जून के अंत से और अधिक ऊंचाई वाले जनजातीय इलाकों की फसल अक्टूबर तक मंडियों में आती है। बागवानी विभाग के अनुमान के मुताबिक, इस साल कुल सेब उत्पादन घटकर 1.5 करोड़ पेटी (लगभग 3.5 लाख से 3.75 लाख मीट्रिक टन) रह सकता है, जबकि पिछले साल यह 7 लाख मीट्रिक टन दर्ज किया गया था। पैदावार घटने से किसानों के साथ राज्य की जीडीपी भी प्रभावित होगी।
उत्पादन में आई इस कमी का सीधा असर मार्केट इंटरवेंशन स्कीम (एमआईएस) के तहत होने वाली खरीद पर पड़ा है। विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस साल अब तक एमआईएस के तहत मात्र 10,462 मीट्रिक टन सेब की खरीद हो पाई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि तक 76,674 मीट्रिक टन सेब खरीदा गया था। सेब का आकार छोटा रहने से भी खरीद प्रभावित हुई है, जिसके चलते एचपीएमसी (HPMC) को जूस और अन्य उत्पाद बनाने के लिए कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
वैज्ञानिक तकनीक अपनाने की सलाह और राहत की तैयारी
बागवानी निदेशक सतीश कुमार ने बागवानों से अपील की है कि वे मौसम से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए आगामी सीजन में 'पुनर्गठित मौसम आधारित बीमा योजना' में अधिक से अधिक पंजीकरण कराएं। उन्होंने कहा कि पुराने बागों में उत्पादन लगातार घट रहा है, इसलिए अब पारंपरिक तरीकों के बजाय वैज्ञानिक तरीके अपनाने होंगे। विभाग इसके लिए उच्च घनत्व वाले पौधारोपण (हाई-डेंसिटी प्लांटेशन) को बढ़ावा दे रहा है और करसोग में 1 लाख से 1.5 लाख उच्च घनत्व वाले पौधे तैयार किए जा रहे हैं, जिन्हें ऊंचाई के हिसाब से लगाया जाएगा।
उधर, प्रदेश के राजस्व एवं बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा कि इस बार उत्पादन काफी कम है और सीजन के अंत तक कुल आंकड़ा 2 करोड़ पेटी तक भी पहुंचना मुश्किल लग रहा है, जबकि पिछले साल करीब 3.49 करोड़ पेटियां बाजार में पहुंची थीं। बागवानी मंत्री ने बताया कि किसानों को राहत देने के लिए राज्य सरकार एमआईएस के तहत खरीद मूल्य बढ़ाने जा रही है और इसका प्रस्ताव आगामी कैबिनेट बैठक में रखा जाएगा।
बागवानों पर बढ़ती लागत और ओलावृष्टि की दोहरी मार
बागवानों के अनुसार, इस साल ऊपरी शिमला के क्षेत्रों में फसल बेहद कमजोर रही है। सेब बागवान प्रेमराज धर्ता ने बताया कि ओलावृष्टि से भारी तबाही हुई है और साथ ही खाद, कीटनाशक स्प्रे, मजदूरी तथा पैकिंग पेटियों के दाम भी काफी बढ़ गए हैं। संधू क्षेत्र के बागवान सुजात चौहान का कहना है कि पहले उनके यहां हर साल 1,000 से 1,200 पेटी सेब होता था, लेकिन इस बार ओलावृष्टि के कारण पैदावार घटकर केवल 300 से 400 पेटी रह गई है।
बागवान हरदयाल रोल्टा के अनुसार, खाद, स्प्रे और पेटियों के कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के अलावा बाजार में असली व नकली कीटनाशकों के संशय और महंगी मजदूरी के कारण इस साल बगीचों के संचालन का मूल खर्च निकालना भी मुश्किल हो रहा है।