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हिमाचल प्रदेश : लाहौल घाटी में मिलीं औषधीय गुणों वाली 25 वनस्पतियां, पेट दर्द से खांसी तक में होता है इस्तेमाल

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 08 Nov 2026 02:30 PM IST
सार

हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में 25 औषधीय वनस्पतियों का दस्तावेजीकरण हुआ है। जानें कुठ, मनु, छोरा और दूसरी जड़ी-बूटियों के पारंपरिक उपयोग और इस शोध की खास बातें।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि औषधीय वनस्पतियों और पारंपरिक उपचार के ज्ञान के लिए भी खास है। यहां किए गए एक शुरुआती सर्वेक्षण में 16 वनस्पति परिवारों की 25 औषधीय प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया गया है। इन पौधों का इस्तेमाल स्थानीय लोग लंबे समय से पारंपरिक उपचार और खानपान में करते आ रहे हैं।

शोधकर्ताओं ने स्थानीय बुजुर्गों, चरवाहों और पारंपरिक वनस्पतियों की जानकारी रखने वाले लोगों से बातचीत करके इन पौधों के स्थानीय नाम, उपयोग और औषधीय महत्व की जानकारी जुटाई। इसके साथ ही पौधों के प्राकृतिक आवास और उनके औषधीय गुणों पर पहले से प्रकाशित वैज्ञानिक शोधों की भी समीक्षा की गई।

आयुषधारा शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ अध्ययन
यह अध्ययन 2 नवंबर को आयुषधारा शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इसे पपरोला स्थित राजीव गांधी राजकीय स्नातकोत्तर आयुर्वेदिक महाविद्यालय एवं अस्पताल के द्रव्यगुण विभाग की शोधार्थी सुकृति और मोनिका मेहता ने तैयार किया है। यह शोध प्रोफेसर रश्मि श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में किया गया।

शोधकर्ताओं ने मई 2026 में लाहौल घाटी के चुनिंदा गांवों में सर्वेक्षण किया। इस दौरान स्थानीय लोगों से बातचीत कर पौधों के स्थानीय और वैज्ञानिक नाम, उनके वनस्पति परिवार, उपयोग किए जाने वाले हिस्सों और पारंपरिक औषधीय इस्तेमाल की जानकारी जुटाई गई। सर्वेक्षण के दौरान पौधों की तस्वीरें भी ली गईं। साथ ही उनके प्राकृतिक आवास और भौगोलिक स्थिति का रिकॉर्ड तैयार किया गया।

पेट दर्द से खांसी तक, इन पौधों का होता है इस्तेमाल
सर्वेक्षण में कई ऐसी वनस्पतियों की जानकारी सामने आई है, जिनका इस्तेमाल स्थानीय लोग अलग-अलग स्वास्थ्य समस्याओं और खानपान में करते हैं।
  • कुठ: स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इसकी जड़ का इस्तेमाल पेट दर्द, खांसी और जुकाम में किया जाता है।
  • मनु: इसकी जड़ का पारंपरिक उपयोग खांसी और सांस संबंधी परेशानियों में होता है।
  • छोरा: इसकी जड़ का इस्तेमाल पाचन संबंधी समस्याओं के लिए किया जाता है।
  • अरचा: इसके तने और पत्तियों का इस्तेमाल भोजन बनाने में होता है।
  • चरमा: इसके पके फलों का रस गर्म पेय के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
  • चुकरी: इसकी पत्तियों से साग बनाया जाता है।

शोधकर्ताओं ने इन वनस्पतियों में पाए जाने वाले प्रमुख रासायनिक तत्वों और उनके औषधीय गुणों से जुड़े पहले प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययनों की भी समीक्षा की है।

आयुर्वेदिक ग्रंथों के आधार पर किया वर्गीकरण
शोध में दर्ज वनस्पतियों को आयुर्वेदिक ग्रंथों में उपलब्ध उल्लेख के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है। इनमें उक्त, अनुक्त और ईषदुक्त श्रेणियां शामिल हैं। इस वर्गीकरण के जरिए यह समझने की कोशिश की गई है कि अलग-अलग पौधों का आयुर्वेदिक साहित्य में किस तरह उल्लेख मिलता है।

सर्वेक्षण में दर्ज की गईं ये प्रमुख वनस्पतियां
शोधपत्र में कुठ, मनु, छोरा, कस्मल, चरमा, अरचा, चुकरी, बुच्छुर, पेथरा, शुर, शुकपा, बुज, नुरचा, विलो, बजारबंग, धनद्रो, लेमबुट, करकू, काडू, उम्बालिकुरी, बांककड़ी, पिंडियाली, पिपड़ी त्सरंग, माशा, सुरजी लैब, हड़जोड़, चुआंग, चाबू और कल्याश समेत स्थानीय नामों वाली वनस्पतियों को दर्ज किया गया है।

इस अध्ययन से लाहौल घाटी में पीढ़ियों से चले आ रहे पारंपरिक वनस्पति ज्ञान को दस्तावेजी रूप देने में मदद मिलेगी। साथ ही, भविष्य में इन पौधों के औषधीय गुणों पर और वैज्ञानिक अध्ययन करने का रास्ता भी खुल सकता है।
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