वैश्विक चावल उत्पादन में गिरावट और मांग में उछाल के अनुमानों को देखते हुए भारत चावल निर्यात बाजार में अपनी पकड़ को मजबूत कर सकता है। इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देव गर्ग कहते हैं कि अल नीनो, अमेरिका-ईरान युद्ध से जुड़ी ईंधन और उर्वरक चुनौतियों के बाद भी दुनिया को सप्लाई करने के लिए भारत के पास पर्याप्त चावल का भंडार मौजूद है। उन्होंने यह बात वैश्विक चावल उत्पादन में 9 प्रतिशत गिरावट और मांग में 14 प्रतिशत बढ़त का हवाला देते हुए कही है।
भारत बना सबसे बड़ा चावल उत्पादक और निर्यातक
देव गर्ग के अनुसार, बीते साल भारत का चावल उत्पादन लगभग 15.1 करोड़ टन रहा, जिससे भारत चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे बड़ा धान उत्पादक बन गया। इस दौरान 2.2 करोड़ मीट्रीक टन के साथ सबसे बड़े निर्यातक का खिताब भी भारत के नाम गया।उन्होंने बताया कि दुनिया की 35 प्रतिशत से ज्यादा आबादी के धान एक अहम फसल है और 50 प्रतिसथ से ज्यादा लोग चावल का रोजाना उपभोग करते हैं।
अल नीनो की मार के बावजूद चावल का अधिशेष बढ़ेगा
देव गर्ग का कहना है कि वर्तमान में भारत के बफर स्टॉक में लगभग 270 लाख मीट्रिक टन चावल अधिशेष है। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि भारत के कुल चावल निर्यात को पूरा करने के बाद 50 लाख मीट्रिक टन चावल बच जाएगा। दूसरी ओर कम बारिश की वजह से भारत के चावल उत्पादन को झटका लग सकता है। देव गर्ग के अनुसार, अल नीनो की वजह से भारत में चावल उत्पादन का अनुमान 15.6 करोड़ मीट्रिक टन से बदलकर 14.6 से 14.7 करोड़ मीट्रिक टन रह सकता है। इस गिरावट के बाद भी देव गर्न ने इस साल चावल का अधिशेष स्टॉक 4 करोड़ मीट्रिक के पार जाने की बात कही है। यह आंकड़ा भारत के सालाना चावल निर्यात से करीब दोगुना है।
प्रमुख उत्पादक देश दबाव में, भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए सुनहरा अवसर
वैश्विक बाजार में कई प्रमुख उत्पादक देश इस समय दबाव का सामना कर रहे हैं। देव गर्ग ने बताया कि वियतनाम ने भारत से अधिक चावल आयात करना शुरू कर दिया है, जबकि थाईलैंड और पाकिस्तान की स्थिति भी तनावपूर्ण है। उन्होंने इसे भारतीय कृषि क्षेत्र, किसानों और निर्यातकों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने का एक बहुत अच्छा और सुनहरा अवसर करार दिया।
उन्होंने कहा कि दुनिया भर के 60 से अधिक देश अपनी घरेलू जरूरतों के लिए भारतीय चावल पर निर्भर हैं। ऐसे में भारत को इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपना निर्यात बढ़ाना चाहिए। 60 से अधिक देशों की निर्भरता को देखते हुए चावल को एक राष्ट्रीय रणनीतिक संपत्ति के रूप में माना जाना चाहिए।
समुद्री माल ढुलाई महंगी होने से वैश्विक थोक कीमतों में उछाल
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में ईंधन और उर्वरक की ऊंची लागत चिंता का विषय बनी हुई है। आईआरईएफ के अनुसार, समुद्री ईंधन की कीमतें पहले के 400-500 डॉलर से तेजी से बढ़कर 1,300-1,400 डॉलर तक पहुंच गई हैं। इससे समुद्र के रास्ते चावल की ढुलाई का खर्च काफी बढ़ गया है, जिसका असर आयातक देशों के उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है।
देव गर्ग ने बताया कि पिछले चार महीनों में वैश्विक स्तर पर चावल की थोक कीमतों में 15 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। वैश्विक उत्पादन घटने और उत्पादन लागत बढ़ने से कीमतों पर आगे भी दबाव बने रहने की आशंका है। इससे आयातक देशों को खाद्य आयात पर अधिक खर्च करना पड़ेगा। हालांकि, इन चुनौतियों के बीच भी भारत में चावल की कोई कमी नहीं होगी और देश वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति को और अधिक मजबूत कर सकता है।