भारत ने साल 2037-38 तक के लिए अनुमानित कोल्ड स्टोरेज क्षमता का 84 प्रतिशत हिस्सा तैयार कर लिया है, लेकिन इस क्षमता का तीन-चौथाई (लगभग 75%) हिस्सा केवल एक ही फसल- आलू के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके साथ ही, देश की कुल कोल्ड स्टोरेज क्षमता का आधे से ज्यादा हिस्सा सिर्फ दो राज्यों—उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में स्थित है।
यह खुलासा उद्योग मंडल फिक्की (FICCI) और 'ग्रांट थॉर्नटन भारत' की ताजा रिपोर्ट ‘इंडियाज कोल्ड चेन: फ्रॉम स्टोरेज टू अ चेन’ में हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, बीते दो दशकों के निवेश से देश में कोल्ड स्टोरेज का एक मजबूत आधार जरूर बना है, लेकिन अब इसे एक पूरी और जुड़ी हुई 'कोल्ड चेन' में बदलने की जरूरत है।
क्षमता में बढ़ोतरी, लेकिन असमान फैलाव
रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में 8,815 केंद्रों के जरिए कोल्ड स्टोरेज की कुल क्षमता 4.02 करोड़ टन (40.22 मिलियन टन) तक पहुंच गई है। यह 2037-38 के लिए अनुमानित 4.8 करोड़ टन की जरूरत का 84 प्रतिशत है।
हालांकि, इस क्षमता का अधिकांश हिस्सा आलू के भंडारण में लगा है और आधे से अधिक ढांचा सिर्फ उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल तक सीमित है। रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि फल-सब्जियों के बड़े उत्पादक इलाकों के पास अलग-अलग फसलों और विभिन्न तापमान वाली स्टोरेज सुविधाएं बनाई जाएं और उन्हें भरोसेमंद परिवहन नेटवर्क से जोड़ा जाए।
खेत से ढुलाई तक के साधनों की भारी कमी
रिपोर्ट के अनुसार, असली समस्या खेत से माल उठाने और उसे ठंडी गाड़ियों में सुरक्षित बाजार तक पहुंचाने में है: पैक-हाउस जरूरत का मात्र 0.4 प्रतिशत ही उपलब्ध हैं। रीफर गाड़ियां जरूरत का केवल 3.8 प्रतिशत हैं। राइपनिंग चैंबर जरूरत का महज 7.1 प्रतिशत ही बन पाए हैं।
इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान के तहत इन कमियों को पूरा करने के लिए 2037-38 तक करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये (लगभग 8,800 करोड़ रुपये प्रति वर्ष) के निवेश की जरूरत होगी।
सालाना 1.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान
बुनियादी ढांचे की कमी की वजह से देश को बड़ा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। रिपोर्ट के मुताबिक, बागवानी, डेयरी, मीट, पोल्ट्री और मछली पालन में हर साल 1.7 करोड़ से 4.7 करोड़ टन खाना बर्बाद हो जाता है। केवल 54 फसलों में कटाई के बाद होने वाले नुकसान का मूल्य ही सालाना लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये आंका गया है।
जानकारों के अनुसार, भारत में कोल्ड स्टोरेज की कमी नहीं है, बल्कि पूरे तालमेल और ढुलाई सुविधाओं की कमी है। उन्होंने बताया कि देश में हर साल 1.39 करोड़ से 4.34 करोड़ टन फल और सब्जियां बर्बाद हो जाती हैं। इनमें से ज्यादातर नुकसान खेत से पहले कोल्ड स्टोरेज तक पहुंचने से पहले और रास्ते में परिवहन के दौरान ही हो जाता है।
जानकारों के अनुसार, एक मजबूत कोल्ड चेन सिर्फ स्टोरेज तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह खेत से लेकर उपभोक्ता की थाली और निर्यात के लिए बंदरगाहों तक तापमान बनाए रखने की पूरी व्यवस्था है।
रिपोर्ट ने कई सुझाव दिए हैं, जैसे खेत के स्तर पर फसल को तुरंत ठंडा करने और छोटे पैक-हाउस बनाने के लिए आर्थिक मदद दी जाए। इसके अलावा एक राष्ट्रीय मानक बने, जिसके तहत माल की पूरी यात्रा के दौरान तापमान का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाए ताकि लापरवाही की पहचान हो सके। वहीं, स्टोरेज में कई तरह की फसलें रखने, पूरे साल इस्तेमाल के समझौते करने और व्यापारियों व निर्यातकों से पक्की खरीद के जरिए इन संपत्तियों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जाए। रिपोर्ट का कहना है कि इन कदमों से फसलों की बर्बादी रुकेगी, किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम मिलेगा और भारत के खाद्य व कृषि निर्यात को मजबूती मिलेगी।