चालू वित्त वर्ष (2026-27) की पहली छमाही यानी शुरुआती 6 महीनों में ही केंद्र सरकार ने खाद की सब्सिडी पर 1.14 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर दिए हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तैयार खाद और घरेलू स्तर पर यूरिया बनाने में उपयोग होने वाले एलएनजी गैस की कीमतों में बढ़ोतरी से सब्सिडी खर्च में भी तेजी आई है।
बजट का 65% हिस्सा हुआ खर्च
आंकड़ों के अनुसार, 1.14 लाख करोड़ रुपये का यह खर्च 2026-27 के लिए तय किए गए कुल 1.76 लाख करोड़ रुपये के शुरुआती बजट अनुमान का लगभग 65 प्रतिशत है। हालांकि सरकार ने अपने बजट अनुमान को बढ़ाकर 1.84 लाख करोड़ रुपये करने का फैसला लिया है।
खाद्य बाजार से जुड़े जानकारों का कहना है कि चालू वित्त वर्ष में खाद सब्सिडी का कुल खर्च 2025-26 से 15 हजार से 20 हजार करोड़ रुपये ज्यादा रह सकता है। बता दें कि 2025-25 में खाद सब्सिडी का खर्च 2.17 लाख करोड़ रुपये था।
यूरिया की खपत और कीमत पर सब्सिडी
जानकारों के मुताबिक, देश में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली खाद यूरिया के आयात और घरेलू उत्पादन पर अब तक 87,316 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी जा चुकी है। उर्वरक विभाग के अनुसार, अगस्त महीने में यूरिया की वैश्विक कीमत में पिछले साल के मुकाबले 23% की गिरावट आई है। आपूर्ति के साधन बेहतर होने से यूरिया की लागत पिछले महीने घटकर 406 डॉलर प्रति टन रह गई, जो मई 2026 में 947 डॉलर प्रति टन के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी।
सरकार ने आपूर्ति में रुकावटों से बचने के लिए ओमान, मलेशिया, रूस, मिस्र, वियतनाम समेत कई अन्य देशों से यूरिया का आयात शुरू किया है। इतनी भारी लागत के बावजूद, किसानों के लिए 45 किलो यूरिया के बोरे की कीमत 266.50 रुपये ही है। यह कीमत मार्च 2018 से नहीं बदली गई है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बोरे की कीमत 4,000 रुपये से अधिक बैठती है।
डीएपी और अन्य खादों की स्थिति
सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, डीएपी (DAP), एमओपी और एनपीके जैसी अन्य खादों के आयात और घरेलू उत्पादन पर अब तक 26,857 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी जा चुकी है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त महीने में डीएपी की वैश्विक कीमत 8.4% बढ़कर 925 डॉलर प्रति टन हो गई, जो अप्रैल 2026 में 853 डॉलर प्रति टन थी। व्यापार सूत्रों ने बताया कि पश्चिम एशिया में चल रहे विवाद के कारण माल ढुलाई महंगी हुई है, जिससे डीएपी के दाम बढ़े हैं।
इसके अलावा, डीएपी और अन्य खाद बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (सल्फर) की लागत भी इस साल की शुरुआत से दोगुनी होकर लगभग 1,050 डॉलर प्रति टन हो गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आपूर्ति में आई रुकावट इसका प्रमुख कारण है। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कीमतों में इस उतार-चढ़ाव के बावजूद, सरकार ने किसानों के लिए 50 किलो डीएपी के बोरे की खुदरा कीमत 1,350 रुपये पर ही बरकरार रखी है।
विदेशों पर निर्भरता और भारत में खपत
भारत अपनी जरूरत का लगभग 70% खाद और कच्चा माल लाल सागर के रास्ते रूस, मोरक्को, अमेरिका, सऊदी अरब जैसे देशों से आयात करता है। आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत में विभिन्न प्रकार की खादों की सालाना खपत 7 करोड़ (70 मिलियन) टन से अधिक थी। इससे पहले वित्तीय वर्ष 2022-23 में जब रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण लाल सागर में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई थी, तब भी सरकार का खाद सब्सिडी बिल रिकॉर्ड 2.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।